तनाव प्रबन्धन की अचूक दवा है गीता
श्रीमद्भगवद्गीता जीवन जीने की कला का एक सर्वांगपूर्ण ग्रंथ है, जो मनःसंस्थान के सम्पूर्ण तंत्रों की व्याख्या करती है। वर्तमान […]
श्रीमद्भगवद्गीता जीवन जीने की कला का एक सर्वांगपूर्ण ग्रंथ है, जो मनःसंस्थान के सम्पूर्ण तंत्रों की व्याख्या करती है। वर्तमान […]
14वें अध्याय के 26वें श्लोक में भगवान कहते हैं— मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ अर्थात् जो लोग विशुद्ध
मानव जीवन में सोच, विचार, चिंतन, मनन, व्यवहार, एहसास और चरित्र के बड़े मायने हैं। जीवन में क्षमा को परम
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।। (6.21) यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो
बोलना और प्रतिक्रिया करना जरूरी है, लेकिन संयम और सभ्यता का दामन नहीं छूटना चाहिए।आजाद रहिए विचारों से, बंधे रहिए
कर्म के प्रति निष्ठा ही मनुष्य को महान बनाती है।निष्ठा यानी खुद पर इतना करे इंसान ऐतबार,गैरमुमकिन को भी मुमकिन
ईर्ष्या वह आंतरिक अग्नि है, जो भीतर ही भीतर दूसरों की उन्नति देखकर हमें भस्म करती है।दूसरों की भलाई या
गीता का 12वाँ अध्याय ‘भक्ति योग’ कहलाता है। भगवान भक्त के गुणों की चर्चा करते हुए 14वें श्लोक में पाँच
एक बार एक व्यक्ति सिर पर सामान की गठरी रखे रेलगाड़ी में चढ़ा।रेल चल पड़ी, लेकिन वह व्यक्ति गठरी सिर
आज हम नेतृत्व को केवल एक राष्ट्र, निगम या बड़ी संस्था का संचालन करने तक सीमित नहीं समझते, बल्कि इसे