यथोचित समय, स्थान में सुपात्र को दिया गया दान सात्त्विक होता है।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।। (6.21) यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो […]
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।। (6.21) यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो […]
बोलना और प्रतिक्रिया करना जरूरी है, लेकिन संयम और सभ्यता का दामन नहीं छूटना चाहिए।आजाद रहिए विचारों से, बंधे रहिए
कर्म के प्रति निष्ठा ही मनुष्य को महान बनाती है।निष्ठा यानी खुद पर इतना करे इंसान ऐतबार,गैरमुमकिन को भी मुमकिन
ईर्ष्या वह आंतरिक अग्नि है, जो भीतर ही भीतर दूसरों की उन्नति देखकर हमें भस्म करती है।दूसरों की भलाई या
गीता का 12वाँ अध्याय ‘भक्ति योग’ कहलाता है। भगवान भक्त के गुणों की चर्चा करते हुए 14वें श्लोक में पाँच
एक बार एक व्यक्ति सिर पर सामान की गठरी रखे रेलगाड़ी में चढ़ा।रेल चल पड़ी, लेकिन वह व्यक्ति गठरी सिर
आज हम नेतृत्व को केवल एक राष्ट्र, निगम या बड़ी संस्था का संचालन करने तक सीमित नहीं समझते, बल्कि इसे
प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अनेक निर्णय लेने पड़ते हैं।ये निर्णय हमारे जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।
प्रायः देखने में आता है कि यदि थोड़ी-सी भी स्थिति प्रतिकूल हो जाए, तो लोग तुरंत भड़क उठते हैं और