मानव से महामानव बनाती है क्षमा — गीता

मानव जीवन में सोच, विचार, चिंतन, मनन, व्यवहार, एहसास और चरित्र के बड़े मायने हैं। जीवन में क्षमा को परम धर्म माना गया है। माफी माँगना या क्षमा करना बेहद सहजता, सादगी एवं नम्रता को प्रदर्शित करने वाले शब्द हैं। मनुष्य को जीवों में श्रेष्ठ माना गया है। मानव की श्रेष्ठता का कारण उसके अपने गुण तथा कर्म होते हैं, जिसके चलते वह महान कहलाता है। ये गुण स्वयं भगवान ने दिए हैं। ऐसा गीता के दसवें अध्याय के चौथे श्लोक में भगवान कहते हैं—

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।। 10.4।।

अर्थात् केवल मुझसे ही मनुष्यों में विभिन्न प्रकार के गुण उत्पन्न होते हैं, जैसे बुद्धि, ज्ञान, विचार की स्पष्टता, क्षमा, सच्चाई, इंद्रियों और मन पर नियंत्रण।

मैं समझता हूँ कि सम्भवतः ईश्वर ने मानव को जब बनाया होगा, तब अन्य गुणों के साथ एक चीज अवश्य बनाई होगी — वह है गलती। अक्सर कहा जाता है कि मानव गलतियों का पुतला है, अर्थात हम मानव हैं इसलिए हमसे गलती या त्रुटि हो सकती है। मगर हममें अपनी गलती को परखने और समझने की बुद्धि और विवेक भी है। कई बार अनजाने में भी गलती हो जाती है, तो कभी लापरवाही में गलती कर दी जाती है। ऐसा अर्जुन 11वें अध्याय के 41वें और 42वें श्लोक में कहते हैं—

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥11.41॥

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥11.42॥

अर्थात् आपको अपना मित्र मानते हुए मैंने धृष्टतापूर्वक आपको “हे कृष्ण”, “हे यादव”, “हे प्रिय मित्र” कहकर संबोधित किया, क्योंकि मुझे आपकी महिमा का ज्ञान नहीं था। उपेक्षित भाव से और प्रेमवश होकर यदि उपहास करते हुए मैंने कई बार खेलते हुए, विश्राम करते हुए, बैठते हुए, खाते हुए, अकेले में या अन्य लोगों के समक्ष आपका कभी अनादर किया हो, तो उन सब अपराधों के लिए हे अचिन्त्य! मैं आपसे क्षमा याचना करता हूँ।

जैसे यहाँ अपनी गलती का एहसास होते ही अर्जुन क्षमा प्रार्थी हो जाते हैं, वैसे ही यदि साधारण मनुष्य अपनी गलती के बाद चिंतन करता है, तो पाता है कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था और उसे पश्चाताप होता है। एक बार की गई गलती को सुधारा तो नहीं जा सकता, मगर भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न हो, इसकी सीख ली जा सकती है।

एक श्रेष्ठ चरित्रवान इंसान की यही पहचान होती है कि वह गलती का एहसास होते ही क्षमा माँग लेता है अथवा किसी दूसरे से भूलवश गलती हो जाने पर उसे माफ भी कर देता है। एक मनुष्य होने के नाते हमें इस तथ्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि गलती एक मानव स्वभाव है, जो किसी अपने या पराए से कभी भी हो सकती है। यहाँ तक कि हम स्वयं भी बार-बार गलती कर सकते हैं। इसलिए किसी की गलती को दिल पर लेने की बजाय बड़ा दिल दिखाकर माफ कर देने में ही महानता है।

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद जब पांडव अपने शिविर में नहीं लौटे, तब इस बात का लाभ उठाकर द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में आग लगा दी। जिसके चलते पांडव कक्ष में बचे हुए वीर सोते हुए ही मृत्यु को प्राप्त हो गए और द्रौपदी के पाँचों पुत्र भी अश्वत्थामा द्वारा लगाई गई आग के कारण मारे गए। पाँचों पांडव पुत्रों के शव को देखकर अर्जुन ने द्रौपदी से कहा कि वे अश्वत्थामा को इसका दंड अवश्य देंगे और उसका कटा हुआ मस्तक उनके सामने लाएँगे।

द्रौपदी से इतना कहकर पांडव रथ में सवार होकर अश्वत्थामा को ढूँढ़ने के लिए निकल पड़े। कहा जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र होने के नाते अर्जुन ने अश्वत्थामा का वध नहीं किया, बल्कि रस्सियों से बाँधकर उसे द्रौपदी के सामने ले आए। अश्वत्थामा को देखकर भीम ने कहा कि इस दुष्ट को जीवित रहने का अधिकार नहीं है।

जब द्रौपदी के सामने अश्वत्थामा को लाया गया, तो वे चाहतीं तो उसे मृत्युदंड दे सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अश्वत्थामा को सामने देखकर द्रौपदी ने पांडवों से कहा कि आपने जिस गुरु से अस्त्रज्ञान प्राप्त किया है, यह उसी गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र है, इसलिए अश्वत्थामा को छोड़ दीजिए। द्रौपदी की यह बात सुनकर अर्जुन ने अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर उसे छोड़ दिया।

इस तरह द्रौपदी ने अश्वत्थामा को क्षमा कर दिया। ध्यान रहे कि अपने पाँच पुत्रों को खो देने के बाद भी द्रौपदी इतनी अधिक दयालु एवं क्षमावान थीं कि उन्होंने अपने पुत्रों की हत्या का बदला लेने के स्थान पर हत्यारे अश्वत्थामा को छोड़ देने का फैसला किया।

हमारी संस्कृति में ईश्वर को सभी पापों को मिटाने वाला तथा क्षमाकारी माना जाता है। क्षमा का गुण बड़प्पन को दर्शाता है। इस ईश्वरीय गुण को अपनाना हर मानव के लिए सम्भव नहीं होता। अगर हो सके तो छोटी-छोटी त्रुटियों के लिए लोगों को माफ करने की एक अच्छी आदत हमें विकसित करनी चाहिए। यह गुण हमारे चरित्र का उत्थान कर व्यक्ति को मानव से महामानव बना देता है।

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