सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।। (6.21)
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।। (6.22)
गीता के 18वें अध्याय के 43वें श्लोक में भगवान कहते हैं—
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।। (18.43)
अर्थात्— वीरता, तेज, धैर्य, कौशल, युद्ध से न भागना, दानशीलता और नेतृत्व क्षमता— ये क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण हैं।
पहले दान को क्षत्रिय का स्वाभाविक गुण बताया गया है, फिर दान के तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है—
सात्त्विक दान
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।। (17.20)
अर्थात्— जो दान बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित समय, स्थान और सुपात्र को दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहलाता है।
सामर्थ्य के अनुसार दान देना मानव का कर्तव्य माना गया है।
भविष्य पुराण में कहा गया है—
“दानमेव कलौ युगे” अर्थात् कलियुग में दान ही शुद्धि का प्रमुख साधन है।
रामचरितमानस में भी कहा गया है—
धर्म के चार प्रमुख स्तंभ हैं, और कलियुग में उनमें से एक प्रमुख है— दान।
दान करने से—
- मोह कम होता है
- सेवा भाव बढ़ता है
- हृदय विशाल होता है
- करुणा की भावना विकसित होती है
अधिकांश धार्मिक परंपराएँ अपनी आय का एक भाग (लगभग 10%) दान में देने का निर्देश देती हैं।
स्कंद पुराण में उल्लेख है—
“न्यायोपार्जित वित्तस्य दशमांशेन धीमतः…”
अर्थात्— उचित साधनों से अर्जित धन का दसवां भाग दान में देना चाहिए।
राजसिक दान
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।। (17.21)
अर्थात्— जो दान किसी फल की इच्छा से या अनिच्छा से दिया जाए, वह राजसिक दान कहलाता है।
दान के स्तर—
- बिना मांगे देना — श्रेष्ठ
- मांगने पर प्रसन्नता से देना — अच्छा
- अनिच्छा से या पछतावे के साथ देना — निम्न
तामसिक दान
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।। (17.22)
अर्थात्— जो दान अनुचित समय, स्थान या कुपात्र को, बिना सम्मान के दिया जाए, वह तामसिक दान है।
ऐसे दान से कोई शुभ फल प्राप्त नहीं होता।
उदाहरण के लिए— यदि धन किसी व्यसनी व्यक्ति को दिया जाए, तो वह उसका दुरुपयोग कर सकता है, और उसका पाप आंशिक रूप से दानदाता पर भी आता है।
कर्ण की दानवीरता
महाभारत का एक प्रमुख पात्र कर्ण दानवीर के रूप में प्रसिद्ध है।
भगवान श्रीकृष्ण भी उसे महान दानी मानते थे।
युद्ध में घायल होने के बाद भी जब श्रीकृष्ण ब्राह्मण वेश में उससे दान मांगने आए, तब कर्ण ने अपना सोने का दांत तोड़कर दान में दे दिया।
इससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उसे वरदान देने को कहा। कर्ण ने केवल यही इच्छा व्यक्त की कि—
“आप ही मेरा अंतिम संस्कार करें और मेरे कुल का कल्याण हो।”
कर्ण की इस निष्ठा और दानशीलता ने उसे अमर बना दिया।
अंतिम संदेश
दान केवल देने का कार्य नहीं, बल्कि भावना का विषय है।
सही समय, सही स्थान और सही व्यक्ति को दिया गया दान ही सच्चा दान है।
कद ऊँचा तो कर लिया, ऊँचे रखो विचार;
दान-धर्म जो ना किया, जीवन है बेकार।
