दृढ़ तू संकल्प कर, निश्चय अपनी जीत कर

गीता का 12वाँ अध्याय ‘भक्ति योग’ कहलाता है। भगवान भक्त के गुणों की चर्चा करते हुए 14वें श्लोक में पाँच बातें कहते हैं, जिनको यदि हम अपने जीवन में अपना लें, तो न केवल हम भगवान के प्रिय हो सकते हैं, बल्कि ये पाँचों गुण हमारे जीवन को सफल और सार्थक बनाने में भी सहायक होते हैं।

पहली बात कहते हैं: सदैव संतोषी।
सुख-समृद्धि से हमें संतोष प्राप्त नहीं होता, बल्कि इसके विपरीत संतोष केवल अपनी कामनाओं पर अंकुश लगाने से मिलता है। इसके लिए दृढ़ निश्चय की आवश्यकता होती है। ऐसे व्यक्ति सांसारिक पदार्थों को अधिक समय तक सुख देने के साधन के रूप में नहीं देखते और इसलिए भगवद् कृपा से उन्हें जो मिलता है, उसी में संतुष्ट रहते हैं।

दूसरी बात कहते हैं: सततं योगी, अर्थात दृढ़ संकल्प से मेरी भक्ति में एकीकृत होना।
‘योग’ का अर्थ है जुड़ना। भक्त योगी होते हैं क्योंकि उनकी चेतना भगवान में लीन रहती है। यह तल्लीनता केवल यदा-कदा नहीं, बल्कि दृढ़तापूर्वक निरंतर बनी रहती है, क्योंकि वे भगवान के साथ अटूट संबंध स्थापित कर लेते हैं। यही तल्लीनता यदि हम अपने किसी भी कार्य के प्रति अपनाएँ, तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।

तीसरी बात कहते हैं: यतात्मा, अर्थात आत्मसंयमी।
भक्त भगवान की प्रेममयी भक्ति में अपना मन अनुरक्त करते हैं। इस प्रकार वे संसार से विरक्त हो जाते हैं और परिणामस्वरूप अपने मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। बिना दृढ़ निश्चय के यह संभव नहीं।

चौथी बात कहते हैं: दृढ़निश्चय, अर्थात दृढ़ संकल्प युक्त होना।
दृढ़ता का गुण स्थिर बुद्धि से प्राप्त होता है। संकल्प से बुद्धि इतनी मजबूत हो जाती है कि यदि पूरा संसार भी विपरीत मार्ग पर जाने का परामर्श दे, तब भी व्यक्ति अपने संकल्प से पीछे नहीं हटता।

पाँचवीं बात कही गई: मन और बुद्धि का समर्पण।
आत्मा जन्मजात भगवान की सेवक है। जैसे ही हम इस ज्ञान से प्रबुद्ध होते हैं, हम वास्तव में स्वयं को परमात्मा को समर्पित कर देते हैं। इस समर्पण में मन और बुद्धि का विशेष महत्व होता है। जब ये दृढ़ निश्चय के साथ भगवान को समर्पित हो जाते हैं, तब हमारे व्यक्तित्व के सभी अंग—शरीर, कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ, सांसारिक पदार्थ और आत्मा—स्वाभाविक रूप से भगवान की सेवा में लग जाते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिन भक्तों में ये गुण होते हैं, वे उन्हें अत्यंत प्रिय लगते हैं। ये सूत्र केवल प्रभु भक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे जीवन के प्रत्येक कार्य के लिए लाभदायक हैं। साधारण व्यक्ति भी इन्हीं गुणों से महापुरुष बन सकता है।

उदाहरण:
पौराणिक कथा के अनुसार, मार्कण्डेय ऋषि के पिता का नाम मृकण्डु ऋषि था। उन्हें कोई संतान नहीं थी। तब उन्होंने अपनी पत्नी के साथ भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और पूछा—तुम गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हो या गुणवान अल्पायु पुत्र, जिसकी आयु केवल 12 वर्ष होगी? मृकण्डु ऋषि ने गुणवान पुत्र की इच्छा व्यक्त की। शिव के वरदान से उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ।

जब मार्कण्डेय ऋषि 12 वर्ष के होने वाले थे, तब उन्हें अपनी अल्पायु का पता चला। तब उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी दृढ़ साधना से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया। उनकी तपस्या के आगे कालदेव यमराज भी नतमस्तक हो गए।

इसी प्रकार कठोपनिषद में बालक नचिकेता के दृढ़ निश्चय के आगे यमराज को आत्मा का रहस्य बताना पड़ा। पाँच वर्ष के बालक ध्रुव की कठोर तपस्या से भगवान नारायण प्रसन्न हुए और उसे ध्रुव पद (ध्रुव तारा) प्रदान किया।

इसी दृढ़ निश्चय से एकलव्य ने गुरु की निर्जीव प्रतिमा को सजीव मानकर धनुर्विद्या में महारत हासिल की।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी कहते हैं—
“जीत हौसलों से होती है, बातों से नहीं;
और लक्ष्य दृढ़ निश्चय से मिलता है, कमजोर इरादों से नहीं।”

गीता के कृष्ण का संदेश है—
“आसान नहीं है मंजिल पाना, आसान नहीं है सपनों को सच करना;
पर नामुमकिन भी नहीं है—बस दृढ़ निश्चय कर लेना।”

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