श्रीमद्भगवद्गीता जीवन जीने की कला का एक सर्वांगपूर्ण ग्रंथ है, जो मनःसंस्थान के सम्पूर्ण तंत्रों की व्याख्या करती है। वर्तमान समय में गीता की महत्ता और अधिक बढ़ गई है तथा सम्पूर्ण विश्व गीता में मानव की समस्याओं के समाधान खोजने में लगा है। आज का मानव तनाव और आंतरिक द्वंद्वों से उद्विग्न एवं अशांत है। यही अंतर्द्वंद्व उसके समग्र मानसिक स्वास्थ्य की अपूर्णता का कारण बनता है। अंतःकरण की उत्कृष्टता ही व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का वास्तविक मापदंड है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में लगभग 13,000 स्कूली बच्चों ने आत्महत्या की और यह संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है। अकेले कोटा जैसे स्थान में, जहाँ बच्चे पढ़ाई की तैयारी करने जाते हैं, वर्ष 2022 में 15 छात्रों ने आत्महत्या की।
गीता की समग्र मनोचिकित्सा पद्धति मूलतः त्रिगुणात्मक — सत्त्व, रज और तम — पर आधारित है। इस सिद्धांत के अनुसार शरीर, मन और आत्मा — ये तीनों आयाम आपस में गुँथे हुए हैं। यदि कोई रोग उत्पन्न होता है, तो वह इन तीनों स्तरों पर व्यक्ति को प्रभावित करता है तथा उसका निदान और उपचार भी इसी के अनुरूप होना चाहिए।
गीता की कर्म, ज्ञान और भक्ति की पद्धतियाँ व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों — स्थूल, सूक्ष्म और कारण — का उपचार करती हैं। गीता दुविधाग्रस्त चित्त, संतापग्रस्त मन तथा खंडित संकल्प को पुनः अखंड करने के लिए, अज्ञान से ज्ञान की ओर अग्रसर करने के लिए तथा पुरुषार्थ से परमार्थ की ओर ले जाने का मार्ग बताती है।
आज भौतिकता का बोलबाला है और विडम्बनाएँ मनुष्य को उलझा रही हैं। जहाँ एक ओर सुख-सुविधाओं का अंबार है, वहीं दूसरी ओर इन संसाधनों के सही उपयोग एवं उपभोग की जीवनदृष्टि के अभाव से संकट उत्पन्न हो रहा है। भौतिक विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं का आपसी सामंजस्य एवं संतुलन बिखरता जा रहा है।
ऊँची महत्वाकांक्षाएँ, गलाकाट प्रतियोगिता, सुख-भोग की तृष्णा, अस्त-व्यस्त जीवनशैली तथा जीवन के किसी सार्थक एवं उच्चतर ध्येय का अभाव — ये सब मिलकर तन और मन की आंतरिक एवं बाह्य स्थिति को कमजोर बना रहे हैं। जीवन की बढ़ती जटिलताएँ और परिस्थितियों का दबाव आज तनाव की विकट समस्या के रूप में सामने आ रहा है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द के अनुसार, तनाव के उपचार के प्रयास में थका-हारा आधुनिक विज्ञान अध्यात्म की प्राचीन विद्या में सार्थक सूत्रों और तकनीकों की तलाश कर रहा है। वे अक्सर कहते हैं — “उपदेश नहीं, उपचार है गीता।”
उनका कहना है कि गीता के कृष्ण अनेक मनोवैज्ञानिक सूत्रों का प्रतिपादन करते हैं, जिन्हें अपनाकर तनाव से मुक्ति पाई जा सकती है। गीता में आसनाभ्यास, प्राणायाम, अभ्यास एवं वैराग्य, नासिकाग्र ध्यान, समभाव, यथायोग्य आहार-विहार तथा यज्ञमय कर्म के साथ-साथ सबसे महत्वपूर्ण है — स्वधर्म की खोज।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। 3.35।।
अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन, चाहे वह गुणहीन ही क्यों न हो, दूसरे के श्रेष्ठ प्रतीत होने वाले धर्म से कहीं बेहतर है। अपने स्वधर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी है, जबकि परधर्म भय उत्पन्न करने वाला है।
अर्थात् कर्मों से घिरे होने पर भी अपने स्वयं के कर्तव्य को पहचानना, अपने अस्तित्व की गहराइयों में झाँकना तथा अपनी संभावनाओं पर विचार करना आवश्यक है। यदि जीवन का स्वधर्म (कर्तव्य) खो जाए, तो जीवन अर्थहीन प्रतीत होने लगता है।
महर्षि अरविन्द ने कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति दिव्यता एवं अद्वितीयता लेकर जन्म लेता है। हर व्यक्ति की प्रकृति अनूठी है, उसका स्वर अपना है, संगीत अपना है, सुगंध अपनी है और जीवन जीने का ढंग भी अपना है। हमें बच्चों पर अपनी इच्छाएँ थोपने के बजाय उनके स्वर, संगीत और सुगंध को पहचानकर विकसित करना चाहिए।
स्वधर्म के पालन से द्वंद्वों का शमन होता है, जिसके परिणामस्वरूप तनाव जैसी समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। गीता की तनाव-उपचार पद्धति समग्र है, क्योंकि इस उपचार पद्धति में अन्य प्रबंधन प्रणालियों की भाँति अपूर्णता का अभाव है।
