संयमित हो प्रतिक्रिया

बोलना और प्रतिक्रिया करना जरूरी है, लेकिन संयम और सभ्यता का दामन नहीं छूटना चाहिए।
आजाद रहिए विचारों से, बंधे रहिए संस्कारों से।

न्यूटन के गति-विषयक तृतीय नियम के अनुसार, क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया बराबर तथा विपरीत दिशा में होती है। जैसे तैरते समय मनुष्य पानी को पीछे धकेलता है (क्रिया), परिणामस्वरूप जल मनुष्य को आगे की ओर धकेलता है (प्रतिक्रिया)। इसे क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम भी कहते हैं।

बंदूक से गोली छोड़ने पर गोली क्रिया बल के कारण आगे बढ़ती है, परंतु वही गोली बंदूक पर विपरीत दिशा में उतना ही प्रतिक्रिया बल लगाती है। अतः बंदूक पीछे की ओर हटती है और उसे चलाने वाले को भी झटका लगता है।

रोजमर्रा के जीवन में अपने प्रत्युत्तर और प्रतिक्रियाओं पर ध्यान दें और यह नोट करें कि हम उनमें धैर्य का उपयोग करते हैं या जल्दबाजी और उतावलापन दिखाते हैं।
हम जब कोई सोशल मीडिया पोस्ट डालते हैं, तो तुरंत यह देखने की इच्छा होती है कि कितने लाइक्स मिले, कितनी सराहना हुई। लोगों की प्रतिक्रिया ही हमें खुशी या दुख देती है।

यदि हम आत्मनिरीक्षण करें, तो पाएंगे कि हमारा जीवन धीरे-धीरे पूरी तरह प्रतिक्रियात्मक बन जाता है।

गीता के अठारहवें अध्याय के 13वें और 14वें श्लोक में इस विषय का विस्तार से वर्णन किया गया है—

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥13॥

हे अर्जुन! सांख्य दर्शन के अनुसार, समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए पाँच कारण बताए गए हैं। इन्हें समझो।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥14॥

शरीर, कर्ता (आत्मा), विभिन्न इन्द्रियाँ, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ और दैव (ईश्वर)— ये पाँच कर्म के कारण हैं।

यहाँ ‘अधिष्ठान’ का अर्थ है शरीर, क्योंकि कर्म तभी संभव है जब आत्मा शरीर में स्थित हो।
‘कर्ता’ आत्मा है, जो स्वयं कर्म नहीं करती, बल्कि मन, बुद्धि और शरीर को प्रेरित करती है।
इन्द्रियाँ कर्म करने के उपकरण हैं, जिनकी सहायता से कार्य सम्पन्न होते हैं।

सभी साधनों के होने के बाद भी यदि प्रयास न किया जाए, तो कोई कर्म नहीं हो सकता। चाणक्य ने कहा है—
“बिना उचित प्रयास के सौभाग्य भी दुर्भाग्य में बदल सकता है।”

दैव या ईश्वर साक्षी रूप में शरीर में स्थित रहते हैं और पूर्व कर्मों के अनुसार मनुष्य को योग्यताएँ प्रदान करते हैं।

एक प्रेरक प्रसंग—

श्रीकृष्ण भी महाभारत का युद्ध नहीं रोक सके। इस बात पर महामुनि उत्तंक को बहुत क्रोध आया।
जब श्रीकृष्ण उनके आश्रम पहुँचे, तो मुनि ने कहा—
“आप इतने समर्थ होते हुए भी युद्ध नहीं रोक सके, क्या आपको शाप देना उचित नहीं होगा?”

भगवान कृष्ण मुस्कुराए और बोले—
“यदि किसी को समझाने के बाद भी वह न माने, तो उसमें समझाने वाले का क्या दोष?”

मुनि का क्रोध शांत नहीं हुआ। तब श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया और कहा—
“यदि आपको वर चाहिए, तो माँग लीजिए।”

मुनि ने कहा— “इस मरुस्थल को हरा-भरा कर दीजिए।”
कृष्ण ने कहा— “तथास्तु।”

कुछ समय बाद मुनि मरुस्थल में भटक गए और प्यास से व्याकुल हो उठे। तभी एक चांडाल जल लेकर आया।
मुनि ने उसे अपमानित कर भगा दिया।

तभी श्रीकृष्ण प्रकट हुए और बोले—
“वह चांडाल नहीं, इंद्र थे, जो तुम्हें अमृत देने आए थे। तुमने अहंकार में उसे ठुकरा दिया।”

मुनि को अपनी भूल का एहसास हुआ।

संदेश:
महापुरुष केवल मार्ग दिखा सकते हैं, चलना हमें ही पड़ता है।
यदि हम ज्ञान को व्यवहार में नहीं लाते, तो उसका कोई लाभ नहीं।

महामुनि उत्तंक जैसे तपस्वी भी बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया करने के कारण अमृत से वंचित रह गए।

अंतिम सीख:
प्रतिक्रिया करते समय धैर्य, संयम और सजगता अत्यंत आवश्यक है।

बोली बता देती है इंसान कैसा है,
और बहस बता देती है ज्ञान कैसा है।

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