ईर्ष्यालु को मुक्ति नहीं

ईर्ष्या वह आंतरिक अग्नि है, जो भीतर ही भीतर दूसरों की उन्नति देखकर हमें भस्म करती है।
दूसरों की भलाई या सुख देखकर मन में जो पीड़ा उत्पन्न होती है, उसे ईर्ष्या कहते हैं। यह एक मनोविकार है, जिसकी उत्पत्ति आलस्य, अहंकार, अभिमान और नैराश्य के संयोग से होती है। यह मनुष्य की हीनभावना से जुड़ी होती है।

अक्सर ईर्ष्या व्यक्तिगत होती है। इसमें मनुष्य दूसरे के प्रति बुराई, अपकर्म, पतन और त्रुटियों की कल्पना करने लगता है। स्पर्धा (प्रतिस्पर्धा) ईर्ष्या की पहली मानसिक अवस्था है। स्पर्धा वह तीव्र इच्छा है, जो हमें दूसरों से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

ईर्ष्या से ग्रस्त होकर मनुष्य धर्म, नीति और विवेक का मार्ग छोड़ देता है। दुर्योधन को इन्द्रप्रस्थ की समृद्धि देखकर जो जलन हुई, वही ईर्ष्या थी, जिसने उसे उसे छीनने के लिए प्रेरित किया। बंजर खाण्डवप्रस्थ को समृद्ध इन्द्रप्रस्थ बनते देखकर वह ईर्ष्या से भर उठा।

इसी प्रकार, जब गांधारी को कुंती के गर्भवती होने का पता चला, तो ईर्ष्यावश उसने अपने गर्भ पर प्रहार कर दिया, जिससे कौरवों का जन्म हुआ—यह कथा भी ईर्ष्या के दुष्परिणाम को दर्शाती है।

भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 4, श्लोक 22) में कहते हैं—

“यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥”

अर्थात जो व्यक्ति अपने आप प्राप्त होने वाले फल में संतुष्ट रहता है, ईर्ष्या और द्वेष से मुक्त रहता है, तथा सफलता और असफलता में समान भाव रखता है—वह कर्म करते हुए भी बंधन में नहीं पड़ता।

इतना ही नहीं, गीता के नौवें अध्याय के प्रथम श्लोक में भगवान कहते हैं—

“इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥”

अर्थात—हे अर्जुन! क्योंकि तुम मुझसे ईर्ष्या नहीं करते, इसलिए मैं तुम्हें यह परम गुप्त ज्ञान बताऊँगा, जिसे जानकर तुम समस्त अशुभ से मुक्त हो जाओगे।
अर्थ स्पष्ट है—मुक्ति पाने की एक महत्वपूर्ण शर्त है ईर्ष्या-रहित होना।

ध्यान रहे, ईर्ष्या का विकार जब अंतर्मन में बैठ जाता है, तो आसानी से नहीं जाता। इससे स्वार्थ और अहंकार बढ़ते हैं और मन में संघर्ष व द्वंद्व उत्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप निद्रानाश, घबराहट, प्रतिशोध की भावना, और दूसरों को हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति विकसित होने लगती है। यह मानसिक अशांति आगे चलकर शारीरिक रोगों का कारण भी बन सकती है।

ईर्ष्या कई भावनाओं का मिश्रण है—यह एक विचित्र पहेली भी है और एक दुखद कथा भी। यह प्रायः हमारे आसपास—समाज, पड़ोस, मित्रों और सहकर्मियों के बीच अधिक देखने को मिलती है।

उदाहरण के लिए—यदि किसी लेखक को विदेश में पुरस्कार मिलता है, तो हमें अधिक फर्क नहीं पड़ता; यदि वही पुरस्कार देश में किसी को मिले, तो थोड़ी जलन होती है; लेकिन यदि हमारे ही परिचित या सोशल मीडिया मित्र को मिले, तो ईर्ष्या अधिक तीव्र हो जाती है। यह स्पष्ट रूप से मन का विकार है।

ईर्ष्या का स्वभाव जलाना है—परंतु यह दूसरों को नहीं, बल्कि स्वयं को ही जलाती है। यह बुद्धि को मंद कर देती है और व्यक्ति को एकांगी सोच में बाँध देती है। वह दूसरों के गुण नहीं देख पाता, बल्कि उनके अवगुण खोजने में लगा रहता है और स्वयं दुखी रहता है।

इसलिए मनुष्य को ईर्ष्या से अवश्य बचना चाहिए। गीता इसका सरल उपाय बताती है—
सभी के प्रति प्रेमभाव रखें और दूसरों के गुणों को देखें।

स्वयं को यह समझाएँ कि जो हमें नहीं मिला, वह हमारे लिए बना ही नहीं था। सृष्टिकर्ता ने हमें उतना ही दिया है, जिसके हम अधिकारी हैं।

याद रखें—
“तुम अपना प्रकाश बनाए रखो, लोग अपनी जलन बनाए रखेंगे।”

जैसे लोहे को जंग नष्ट करती है, वैसे ही ईर्ष्या मनुष्य को भीतर से खोखला कर देती है।
ईर्ष्यालु व्यक्ति भले ही नष्ट हो जाए, पर ईर्ष्या का भाव समाप्त नहीं होता।

अंत में—
मूर्ख व्यक्ति ईर्ष्या में जलता है, जबकि बुद्धिमान ऐसे व्यक्ति पर करुणा करता है।

और एक सरल सत्य—
दूसरों की खुशी देखकर जिसे जलन होती है, समस्या उसकी दृष्टि में है—आपकी नहीं।

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