कर्म के प्रति निष्ठा ही मनुष्य को महान बनाती है।
निष्ठा यानी खुद पर इतना करे इंसान ऐतबार,
गैरमुमकिन को भी मुमकिन करने का जज़्बा रहे बेकरार।
गीता के 9वें अध्याय के तीसरे श्लोक में भगवान कहते हैंः
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।
अर्थात्— हे शत्रु विजेता! जो लोग इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे प्राप्त नहीं कर सकते। वे जन्म-मृत्यु के मार्ग पर बार-बार इस संसार में लौटते रहते हैं।
ज्ञान चाहे कितना भी अद्भुत और मार्ग कितना ही परिणाममूलक क्यों न हो, यदि कोई उसका अनुसरण करने से मना कर देता है, तो वह उसके लिए अनुपयोगी हो जाता है।
भक्ति रसामृत सिंधु में उल्लेख है—
“आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगो भजनक्रिया”
अर्थात् भगवान की अनुभूति करने का पहला कदम श्रद्धा है। इसके बाद मनुष्य सत्संग में भाग लेता है, जो उसे भक्ति के अभ्यास की ओर ले जाता है।
प्रायः लोग कहते हैं कि वे केवल उसी में विश्वास करते हैं जिसकी प्रत्यक्ष अनुभूति हो। चूँकि भगवान की तत्काल अनुभूति नहीं होती, इसलिए वे उस पर विश्वास नहीं करते।
किन्तु वास्तव में हम संसार में अनेक ऐसी चीज़ों पर विश्वास करते हैं जिनकी प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं होती।
एक न्यायाधीश कई वर्ष पूर्व घटित घटना पर निर्णय देता है। यदि वह केवल प्रत्यक्ष अनुभव पर ही विश्वास करे, तो पूरी न्याय व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाएगी।
इसलिए जीवन के हर कदम पर विश्वास आवश्यक है— हम केवल आँखों देखी बातों पर नहीं, बल्कि विश्वास पर चलते हैं।
कहते हैं, एक बार एक राजा ने एक साधु से कहा—
“मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि मैं उसे देख नहीं सकता।”
साधु ने राजा से एक गाय मँगवाई और उसका दूध दुहने को कहा। फिर पूछा—
“क्या इस दूध में मक्खन है?”
राजा ने कहा— “हाँ, मुझे पूरा विश्वास है।”
साधु ने पूछा— “जब तुमने मक्खन देखा नहीं, तो विश्वास कैसे?”
राजा ने उत्तर दिया— “मक्खन दूध में व्याप्त है, पर उसे देखने के लिए प्रक्रिया करनी होती है।”
तब साधु ने कहा—
“जैसे दूध में मक्खन है, वैसे ही भगवान सर्वत्र हैं। यदि हम तुरंत उन्हें अनुभव नहीं कर पाते, तो इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान नहीं हैं। उनकी अनुभूति की भी एक प्रक्रिया है।”
इसी प्रकार, भगवान में विश्वास स्वतः नहीं आता। हमें अपनी स्वतंत्र इच्छा से विश्वास करने का निर्णय लेना पड़ता है।
कौरव सभा में जब दुःशासन ने द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया, तब भगवान ने उसकी रक्षा की। सभी ने यह चमत्कार देखा, फिर भी कौरवों ने श्रीकृष्ण पर निष्ठा नहीं रखी।
श्रीकृष्ण कहते हैं— जो आध्यात्मिक पथ में विश्वास नहीं रखते, वे दिव्य ज्ञान से वंचित रहते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं।
श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ कुंती से कहा—
“मैं पांडवों के पक्ष में इसलिए नहीं हूँ कि वे मेरे संबंधी हैं, बल्कि इसलिए हूँ क्योंकि धर्म उनके पक्ष में है। मेरी निष्ठा धर्म के प्रति है।”
महाभारत युद्ध से पहले, कृष्ण ने कर्ण को बताया कि वह कुंती का ज्येष्ठ पुत्र है। फिर भी कर्ण ने मित्र दुर्योधन के प्रति अपनी निष्ठा नहीं छोड़ी।
इंद्रदेव ब्राह्मण रूप में उससे कवच-कुंडल माँगने आए। कर्ण को पहले से ज्ञात होने पर भी उसने दान कर दिया। बदले में उसे एक शक्तिशाली अस्त्र मिला।
युद्ध के दौरान, जब घटोत्कच कौरव सेना को नष्ट कर रहा था, तब कर्ण ने वह अस्त्र अर्जुन के लिए बचाने के बजाय मित्र की रक्षा हेतु घटोत्कच पर चला दिया।
स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं—
कर्ण को पता था कि जहाँ धर्म है, वहीं कृष्ण हैं और जहाँ कृष्ण हैं, वहीं विजय है। फिर भी उसने अपनी निष्ठा नहीं छोड़ी।
