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अपनी प्रकृति से उत्पन्न कर्तव्यों का परित्याग न करें: गीता

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥ (गीता 18.48) अर्थात् किसी भी व्यक्ति को अपनी प्रकृति से उत्पन्न

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आसुरी सम्पदा हमारी पहचान खो देती है : गीता

गीता के 16वें अध्याय के चौथे श्लोक में भगवान् कहते हैं— दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥ 16.4॥

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लंदन के मौसम जैसी पल-पल बदलती चुनावी गारंटियाँ, संशय, भ्रम और अज्ञान से मुक्ति का मार्ग है गीता

एक जीवित चेतना का मूल गुण असंमोह, अर्थात् संशय और भ्रम से मुक्त होना है (गीता 10.4)। किंतु आज के

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क्रोध प्रबंधन एवं गीता

क्रोध प्रबंधन (Anger Management) एक प्रकार की परामर्श प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने स्वास्थ्य, कार्य, व्यवहार तथा व्यक्तिगत

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