सेवक नेतृत्व के आदि प्रवर्तक हैं भगवान कृष्ण

लोकतंत्र के महापर्व में जोश से नहीं, होश से काम करने का समय

भारत लोकतंत्र का महापर्व मना रहा है। हम सबके सामने अपने-अपने स्थान से देश का नेतृत्व चुनने का समय है। ऐसे में जोश के स्थान पर होश से नेता चुनने का समय है।

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स कहते हैं, “जैसे-जैसे हम अगली शताब्दी की ओर देखते हैं, नेता वे होंगे जो दूसरों को सशक्त बनाएंगे।”

एक सफल नेता बनना समय लेने वाली कठिन परीक्षा है और आप कभी नहीं कह सकते कि आपने इसमें महारत हासिल कर ली है। यह जीवनभर सीखने की यात्रा है, क्योंकि अपनी टीम से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए हमेशा नए कौशल हासिल करने होते हैं और अलग-अलग नेतृत्व शैलियों को अपनाना होता है।

छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोबिंद सिंह, महात्मा गांधी, सरदार पटेल तथा सुभाष चंद्र बोस के सफल और सार्थक नेतृत्व का इतिहास साक्षी है। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी ने स्वयं को प्रधानमंत्री न कहकर “प्रधान सेवक” कहकर इस विषय को और अधिक व्यापक बनाया।

सेवक नेतृत्व, यद्यपि कोई नई अवधारणा नहीं है, एक नेतृत्व पद्धति है जिसे तेजी से एक आदर्श नेतृत्व शैली के रूप में देखा जा रहा है। “सर्वेंट लीडरशिप” शब्द का प्रयोग पहली बार 1970 में रॉबर्ट के. ग्रीनलीफ द्वारा किया गया था। अपने निबंध “द सर्वेंट ऐज़ अ लीडर” में उन्होंने सेवक नेतृत्व के बुनियादी सिद्धांतों को प्रस्तुत किया।

पारंपरिक नेतृत्व मॉडल में प्राथमिक ध्यान अक्सर कंपनी या संगठन की वृद्धि और सफलता पर होता है। इस मॉडल में नेता आम तौर पर ऊपर से नीचे के दृष्टिकोण को अपनाते हैं तथा ऐसे निर्णय लेते हैं जिनके बारे में उनका मानना होता है कि वे संगठन के लक्ष्यों को सर्वोत्तम रूप से पूरा करेंगे। इसके विपरीत, सेवक नेतृत्व उन लोगों पर ध्यान केंद्रित करता है जो संगठन का निर्माण करते हैं। एक सेवक नेता अपनी टीम के सदस्यों की आवश्यकताओं, विकास और कल्याण को प्राथमिकता देता है।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं, “नेतृत्व प्रभारी होने के बारे में नहीं है, बल्कि नेतृत्व आपके प्रभार में मौजूद लोगों की देखभाल करने के बारे में है।”

अमेरिकी मनोचिकित्सक तथा ‘द रोड लेस ट्रैवेल्ड’ के लेखक एम. स्कॉट पेक कहते हैं, “सेवक नेतृत्व केवल एक अवधारणा नहीं है, बल्कि एक सच्चाई है। कोई भी महान नेता, जिससे मेरा तात्पर्य किसी समूह के नैतिक नेता से भी है, स्वयं को उस समूह का सेवक मानेगा और उसी के अनुसार कार्य करेगा।”

भगवान कृष्ण सेवक नेतृत्व के आदि प्रवर्तक हैं, ऐसा मैं मानता हूँ। चाहे महाभारत के युद्ध में सारथी की भूमिका निभाना हो या युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में पत्तल उठाने और साफ करने की भूमिका, उन्होंने सेवक नेतृत्व का साक्षात एवं अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

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