सभी प्राणियों में समानता सिखाती है गीता
समानता एक बहुआयामी अवधारणा है, जो पूरे इतिहास में गहन बहस और विश्लेषण का विषय रही है। यह एक मौलिक सिद्धांत है, जो निष्पक्षता, न्याय और समान अवसर की धारणा पर बल देता है। समानता का अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को, उनकी जाति, लिंग, आयु, धर्म अथवा सामाजिक-आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना, समान अधिकार, अवसर और संसाधनों तक पहुँच प्राप्त हो।
समानता के विषय में अनेक सैद्धांतिक दृष्टिकोण हैं, जिनमें प्रत्येक इस जटिल अवधारणा के किसी न किसी पक्ष को स्पष्ट करता है। उदाहरण के लिए, समतावाद (Egalitarianism) संसाधनों और अवसरों के समान वितरण की वकालत करता है, जबकि योग्यता-तंत्र (Meritocracy) अवसर की समानता पर बल देता है, जहाँ संसाधनों का वितरण व्यक्ति की योग्यता और प्रयास के आधार पर किया जाता है। ये विभिन्न दृष्टिकोण यह दर्शाते हैं कि समानता कोई एकरूपी अवधारणा नहीं, बल्कि एक ऐसा आदर्श है जिसे अनेक कोणों से समझा जा सकता है।
अब आइए, भगवद्गीता में प्रतिपादित समानता के सिद्धांत पर विचार करें। तेरहवें अध्याय के 28वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ (13.28)
अर्थात् जो व्यक्ति नश्वर शरीरों में समान रूप से स्थित अविनाशी परमेश्वर का दर्शन करता है, वही वास्तव में देखने वाला है।
यहाँ श्रीकृष्ण ने “यः पश्यति स पश्यति” अर्थात् “वही वास्तव में देखता है जो इस प्रकार देखता है”—इस भाव का प्रयोग किया है। उनका आशय केवल आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा समान रूप से विराजमान हैं।
इसी सत्य को रामचरितमानस में भी कहा गया है—
राम ब्रह्म चिन्मय अबिनासी।
सर्व रहित सब उर पुर बासी॥
अर्थात् परमब्रह्म श्रीराम अविनाशी हैं, सब सीमाओं से परे हैं और सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं।
परमात्मा प्रत्येक जीवात्मा के साथ रहते हैं, क्योंकि जीव जन्म और मृत्यु के चक्र में एक शरीर से दूसरे शरीर की यात्रा करता रहता है। इसी कारण परमात्मा प्रत्येक जीवन-यात्रा के साक्षी और मार्गदर्शक बने रहते हैं।
आगे तेरहवें अध्याय के 29वें श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि सभी प्राणियों में भगवान की उपस्थिति का अनुभव साधक के जीवन में किस प्रकार परिवर्तन लाता है—
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥ (13.29)
अर्थात् जो व्यक्ति सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित ईश्वर का दर्शन करता है, वह अपने मन के द्वारा स्वयं को पतित नहीं करता और अंततः परम गति को प्राप्त करता है।
जब मनुष्य सभी जीवों में परमात्मा का दर्शन करने लगता है, तब उसके व्यवहार में स्वाभाविक परिवर्तन आ जाता है। वह दूसरों के साथ संबंधों में व्यक्तिगत लाभ या सुख की अपेक्षा नहीं रखता। वह न किसी के सद्गुणों से अत्यधिक आसक्त होता है और न ही किसी के द्वारा हुई हानि के कारण द्वेष पालता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर का अंश मानकर सम्मान, करुणा और सेवा का भाव रखता है।
जिस व्यक्ति को अपने भीतर और समस्त प्राणियों में भगवान की उपस्थिति का अनुभव हो जाता है, वह दुव्यर्वहार, छल, कपट, अपमान, भेदभाव और अहंकार जैसे दोषों से स्वतः दूर हो जाता है। उसके लिए राष्ट्र, जाति, लिंग, वर्ण, पद, प्रतिष्ठा, रंग, धन-दौलत अथवा सामाजिक स्थिति के आधार पर किया जाने वाला भेद निरर्थक हो जाता है। वह समदृष्टि के साथ सभी में ईश्वर का दर्शन करता है और अंततः परम लक्ष्य की प्राप्ति करता है।
यद्यपि आधुनिक समाज ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी वास्तविक समानता की स्थापना आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। भेदभाव, पूर्वाग्रह तथा सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ आज भी समाज में गहराई से विद्यमान हैं। ये बाधाएँ सामाजिक संरचनाओं और मान्यताओं में इतनी गहराई से समाई हुई हैं कि इन्हें समाप्त करना सरल नहीं है।
इसके अतिरिक्त, जाति, लिंग, वर्ग, नस्ल तथा अन्य सामाजिक पहचानों का परस्पर प्रभाव समानता की स्थापना को और अधिक जटिल बना देता है। इक्कीसवीं सदी में समानता की चर्चा ने नए आयाम भी ग्रहण किए हैं। आज डिजिटल समानता, अर्थात् सूचना और तकनीक तक समान पहुँच, एक महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है। इसी प्रकार पर्यावरणीय समानता—स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और स्वस्थ पर्यावरण तक समान अधिकार—भी जलवायु परिवर्तन के इस युग में अत्यंत प्रासंगिक हो गई है।
स्पष्ट है कि समानता की स्थापना के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं; इसके लिए दृष्टिकोण का परिवर्तन आवश्यक है। यही परिवर्तन भगवद्गीता प्रदान करती है। गीता मनुष्य को यह शिक्षा देती है कि प्रत्येक प्राणी में उसी परमात्मा का निवास है। जब यह अनुभूति जीवन का आधार बन जाती है, तब भेदभाव, अन्याय और अहंकार स्वतः समाप्त होने लगते हैं।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं—
“हालाँकि समानता की ओर का मार्ग अनेक चुनौतियों से भरा हुआ है, फिर भी गीता का संदेश न्याय, निष्पक्षता और मानवीय गरिमा पर आधारित समाज के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।”
इसी भाव को भगवान श्रीकृष्ण छठे अध्याय के 30वें श्लोक में और अधिक स्पष्ट करते हैं—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ (6.30)
अर्थात् जो मुझे सभी प्राणियों में देखता है और सभी प्राणियों को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह भी मुझसे कभी विलग नहीं होता।
यही गीता का समता-दर्शन है—सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा का दर्शन करना। जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब मानवता, करुणा, न्याय और समानता केवल आदर्श नहीं रह जाते, बल्कि जीवन का स्वाभाविक आचरण बन जाते हैं।
