गीता के 16वें अध्याय के दूसरे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।” (16.2)
अर्थात् सभी प्राणियों पर दया, लोभ का अभाव, कोमलता, लज्जा और चंचलता का त्याग—ये सभी दैवी गुण हैं।
‘अलोलुप्त्वम्’ अर्थात् लोभ से मुक्त होना। लोभ वह प्रवृत्ति है जिसमें मनुष्य अपनी आवश्यकताओं से कहीं अधिक संग्रह करने की इच्छा करता है। इसी के वशीभूत होकर लोग अपार धन-संपत्ति एकत्रित करते रहते हैं, जबकि वे भली-भाँति जानते हैं कि मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छूट जाएगा।
लोभ के कारण हमारी बुद्धि और विवेक दोनों मलिन होने लगते हैं। परिणामस्वरूप हम जीवन में उचित निर्णय लेने से चूक जाते हैं।
इस संदर्भ में एक प्रसिद्ध कथा है।
एक अत्यंत धनी महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया। चित्र तैयार होने पर वह उसे लेने आई। चित्र देखकर वह अत्यंत प्रसन्न हुई और चित्रकार से बोली, “बताइए, आपको पुरस्कार में क्या दूँ?”
चित्रकार गरीब था। उसने सोचा—सौ डॉलर माँगूँ, दो सौ माँगूँ या पाँच सौ? फिर मन में संकोच आया कि कहीं वह इतना भी न दे। अंततः उसने निश्चय किया कि निर्णय उसी महिला पर छोड़ देना चाहिए। उसने विनम्रता से कहा, “जो आपकी इच्छा।”
महिला के हाथ में एक कीमती पर्स था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “तो यह पर्स ही तुम रख लो।”
चित्रकार सोचने लगा कि पर्स का वह करेगा क्या? चाहे वह कितना भी सुंदर और महँगा क्यों न हो, उसके काम का तो धन ही है। उसने कहा, “नहीं-नहीं, पर्स का मैं क्या करूँगा? यदि संभव हो तो मुझे केवल सौ डॉलर दे दीजिए।”
महिला ने कहा, “जैसी तुम्हारी इच्छा।”
उसने पर्स खोला। उसमें एक लाख डॉलर थे। उसने उनमें से केवल सौ डॉलर निकाले, चित्रकार को दिए और पर्स लेकर चली गई।
कहा जाता है कि बाद में चित्रकार बहुत पछताया। वह बार-बार यही सोचता रहा कि यदि उसने पूरा पर्स स्वीकार कर लिया होता, तो उसका जीवन बदल जाता।
वास्तव में अधिकांश मनुष्यों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। परमात्मा ने हमें जो अमूल्य आध्यात्मिक संपदा प्रदान की है, वह हमारे भीतर सुरक्षित है, किंतु हम बाहर छोटी-छोटी इच्छाओं और तुच्छ उपलब्धियों के लिए ही हाथ फैलाए रहते हैं। जो हमें प्राप्त है, वह हमारी कल्पना से भी कहीं अधिक मूल्यवान है; परंतु इच्छाओं की भीड़ में हमें उसका बोध ही नहीं हो पाता।
गीता उसी बंद पर्स को खोलने की कुंजी है, जिसे भगवान ने स्वयं हमारे हाथों में सौंपा है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से प्रकट हुई श्रीमद्भगवद्गीता का माहात्म्य शब्दों में व्यक्त करना किसी के लिए संभव नहीं है। यह परम रहस्यमयी, परम क्रांतिकारी और मानव के सर्वोच्च उत्थान का ग्रंथ है।
यह ग्रंथ हमारे भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों—मोह, माया, ईर्ष्या, राग, द्वेष, लोभ और अहंकार—को दूर कर दैवी गुणों से जीवन को भर देता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसमें समस्त वेदों का सार प्रस्तुत किया है।
जो व्यक्ति प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक गीता का अध्ययन करता है, उसके अंतःकरण में निरंतर नए-नए शुभ भावों का जागरण होता है और धीरे-धीरे उसका व्यक्तित्व देवतुल्य बनने लगता है।
महर्षि वेदव्यास ने कहा है—
“गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।”
अर्थात् जिस गीता का प्राकट्य स्वयं पद्मनाभ भगवान श्रीविष्णु के मुखारविंद से हुआ है, उसे भली-भाँति पढ़कर, उसके अर्थ और भाव को अपने अंतःकरण में धारण करना ही मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य है; अन्य शास्त्रों के विस्तार की आवश्यकता नहीं रह जाती।
श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे अनेक जीवनोपयोगी और प्रेरणादायक विचार हैं, जिन्हें अपनाने वाला व्यक्ति जीवन में कभी पराजित नहीं होता। आज के समय में, जब सुविधाएँ निरंतर बढ़ रही हैं किंतु क्षमताएँ घटती जा रही हैं, गीता मनुष्य को अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचानने और उन्हें अनंत संभावनाओं में विकसित करने की प्रेरणा देती है। यही गीता का वास्तविक संदेश है।
