गीता के दूसरे अध्याय के 15वें श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ (गीता 2.15)
अर्थात् जो धीर पुरुष सुख-दुःख में समभाव बनाए रखते हैं, वे अमृतत्व को प्राप्त होते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण जिस अमृतत्व की बात कर रहे हैं, वह केवल परलोक का अमृत नहीं है, बल्कि इस लोक का भी अमृत है। उनका संदेश है कि जीवन में सुख और दुःख आते-जाते रहेंगे, परन्तु जो व्यक्ति सुख-दुःख, मान-अपमान तथा अनुकूलता-प्रतिकूलता में समता, धैर्य और मन की दृढ़ता बनाए रखता है, वही वास्तव में अमृतत्व का अधिकारी बनता है।
हम अनेक लोगों के बारे में कहते हैं कि वे मरकर भी अमर हैं। यही बात इस श्लोक का व्यावहारिक अर्थ समझाती है। आज भी हम अनेक महापुरुषों का स्मरण उनके पृथ्वी लोक से विदा होने के बाद करते हैं, क्योंकि उन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने संयम, धैर्य और सहनशक्ति को बनाए रखा।
आज जब हम हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को याद करते हैं, तो यह भी देखना चाहिए कि उन्होंने किन विषम परिस्थितियों और प्रतिकूलताओं में अपने खेल का अभ्यास किया। नंगे पाँव दिन में सोलह-सोलह घंटे अभ्यास करना, हॉकी स्टिक के स्थान पर पेड़ की लकड़ी से बनाई हुई स्टिक का उपयोग करना, नस्लभेद का सामना करना तथा पराधीन भारत का वातावरण—इन सब कठिनाइयों के बीच भी वे अविचलित रहे। यही कारण है कि आज वे विश्व के अमर खिलाड़ियों में गिने जाते हैं।
महाराणा प्रताप घास की रोटियाँ खाकर भी अपने धैर्य से विचलित नहीं हुए और अमृतत्व के प्रतीक बन गए। अमर शहीद भगत सिंह ने जेल में महीनों तक भूख हड़ताल कर जेल-सुधार का मार्ग प्रशस्त किया। उन्हें यदि कोई भूख सताती थी, तो वह केवल देश की आज़ादी की भूख थी।
गुरु गोविन्द सिंह जी ने पुत्र रहते हुए अपने पिता गुरु तेगबहादुर जी को धर्म की रक्षा के लिए अमर बलिदान हेतु प्रेरित किया और जब स्वयं पिता बने, तब अपने चारों पुत्रों की शहादत पर भी धैर्य और संकल्प का परिचय दिया।
भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कारागार में जन्मे। जन्म लेते ही माता से बिछुड़ गए और उनका पालन-पोषण यशोदा माता ने किया। बाल्यकाल में कंस ने उन्हें मारने के अनेक प्रयास किए। आगे चलकर उन्हें मथुरा छोड़कर द्वारका जाना पड़ा। परन्तु उन्होंने कभी अपनी मुस्कान, माधुर्य और धैर्य का त्याग नहीं किया तथा मानवता को भगवद्गीता जैसा अमर प्रेरणा-ग्रंथ प्रदान किया।
इसी प्रकार, यदि प्रभु श्रीराम वनवास स्वीकार न करते, अनेक कष्टों का धैर्यपूर्वक सामना न करते और अपनी मर्यादा तथा दैवीय गुणों को अक्षुण्ण न रखते, तो वे केवल राजा दशरथ के पुत्र राम के रूप में ही स्मरण किए जाते। माता सीता के हरण के समय भी उन्होंने परिस्थितियों पर संयम बनाए रखा। लक्ष्मण के प्रति उन्होंने क्रोध नहीं किया; यह उनके धैर्य और मर्यादा का अनुपम उदाहरण है।
विषम परिस्थितियाँ, कठिनाइयाँ, अपमान और दुःख प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण का संदेश स्पष्ट है—परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, पर हमारी मनःस्थिति नहीं बदलनी चाहिए।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं कि मनःस्थिति ही मनुष्य को अमृततुल्य बनाती है। हमारे भीतर की सकारात्मक ऊर्जा, हमारे अंतःकरण की दृढ़ता और आत्मबल ही हमें बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होने से बचाते हैं तथा हमें प्रभुभाव से जोड़ते हैं।
आज चारों ओर स्किल अर्थात् कौशल-विकास की चर्चा होती है, परन्तु मेरा मानना है कि स्किल के साथ-साथ हमें ‘विल’ (Will) अर्थात् दृढ़ इच्छाशक्ति के विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए। शायद इसी कारण मैं भगवद्गीता को जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ मानता हूँ, क्योंकि यह ‘विल’ के विकास का शास्त्र है।

आप पहले ही भागवत गीता प्रचार करने का शुभ कार्य कर रहे हैं, और अब वेबसाइट बना कर भी इस कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया है उसके लिए आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं जय श्री कृष्णा
Greetings to you for the good initiative to route the preachings through your website. This would help in furtherance of learning for a better,balanced and thoughtful holistic life .
विषम परिस्थितियों हमें दृढ़ बनने का अवसर देती हैं
बहुत सुंदर