राम अनुकरणीय हैं, तो कृष्ण चिंतनीय; परंतु दोनों ही वंदनीय हैं।

22 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हो रही है। इस विषय का स्मरण मात्र ही मन को आनंदित, आंदोलित ही नहीं, बल्कि उद्वेलित भी कर देता है। यूँ कहें कि मन में श्रद्धा और उत्साह की हिलोरें उठने लगती हैं।

मेरे मन की बातें प्रायः मन में ही रह जाती हैं, क्योंकि मेरे मन को कोई जान न सका, और जो कुछ जान भी गया, वह उसे मान न सका। खैर, जब यह विषय सामने आया तो मैंने सोचा कि अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार अपने कुछ विचार आपसे साझा करूँ।

रामजन्मभूमि आंदोलन के समय एक नारा प्रचलित था— “अयोध्या तो झाँकी है, काशी-मथुरा बाकी है।” निश्चित ही अब समय करवट ले रहा है और परिस्थितियाँ अनुकूल होती प्रतीत हो रही हैं। ऐसा अवसर सदियों के संघर्ष, समर्पण, त्याग और बलिदान के बाद प्राप्त होता है। इसलिए कहना चाहूँगा—

“जब तक काशी और मथुरा की सांस्कृतिक अस्मिता पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित न हो जाए, तब तक समय की बर्बादी न हो।”

जब मेरी बेटी विद्यालय में पढ़ती थी, तब परीक्षा के दिनों में उसकी अध्ययन-मेज़ पर पुस्तकों के साथ भगवान की मूर्तियाँ भी सजी रहती थीं। एक दिन घर में अयोध्या और मथुरा की चर्चा चल रही थी। बाल-सुलभ जिज्ञासा से उसने प्रश्न किया— “क्या दोनों स्थानों के भगवान अलग-अलग हैं?”

उस समय मेरे पास न इतना आध्यात्मिक अनुभव था, न इतना गहन चिंतन और न ही व्यस्त दिनचर्या के बीच इतना समय कि उस प्रश्न का विस्तार से उत्तर दे पाता। आज वही मेरी बेटी दिल्ली की एक प्रतिष्ठित एवं व्यस्त स्त्री-रोग विशेषज्ञ है और निरंतर समय के अभाव में रहती है। उसके पास प्रश्न पूछने का समय नहीं है, पर मैं उसके उन प्रश्नों के उत्तर आज भी लिखता रहता हूँ, ताकि आने वाली पीढ़ी को उनका सहज और तर्कपूर्ण समाधान मिल सके।

आज इस विशेषांक के लिए लक्ष्मी नारायण जी का फोन आया। संयोगवश मैं भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण पर ही लिख रहा था, इसलिए वही विचार सुधी पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ। उस समय तो मैंने अपनी बेटी को केवल इतना ही कहा था कि राम और कृष्ण दोनों एक ही हैं, किंतु आज उसी उत्तर को थोड़ा और विस्तार देने का प्रयास कर रहा हूँ।

यदि राम ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राम हैं, तो उनके बीच अंतर बताने की अपेक्षा उनकी समानताओं को समझना अधिक उचित होगा। भारतीय जनमानस के सर्वोच्च आदर्श भगवान राम भी हैं और भगवान श्रीकृष्ण भी। दोनों ही भारतीय इतिहास, संस्कृति और धर्म-परंपरा के ऐसे महापुरुष हैं, जिनसे प्रत्येक देश और प्रत्येक काल का व्यक्ति प्रेरणा प्राप्त करता है—राम से मर्यादा की और कृष्ण से असीम जीवन-दृष्टि की।

जीवन राम की मर्यादा जैसा होना चाहिए, किंतु धर्म और न्याय की रक्षा के लिए समय आने पर कृष्ण जैसा विवेक, साहस और नीति-कौशल भी आवश्यक हो जाता है। मानव-मन स्वभावतः भेद और द्वंद्व में जीता है। उलझना और दूसरों को उलझाए रखना उसका स्वभाव है।

कहा जाता है कि भगवान राम बारह और भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं से संपन्न थे। श्रीकृष्ण में जो अतिरिक्त कलाएँ थीं, वे उस युग की आवश्यकताओं के अनुरूप थीं। अन्यथा श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय के 31वें श्लोक में स्वयं श्रीकृष्ण क्यों कहते—

“पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।”

अर्थात् “मैं पवित्र करने वालों में पवन हूँ और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ।”

भगवान राम का जीवन मर्यादाओं का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। यद्यपि सामान्यतः यह माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने समय और परिस्थिति के अनुसार कई बार परंपरागत मर्यादाओं से भिन्न आचरण किया, परंतु उनका प्रत्येक कार्य धर्म की स्थापना और लोककल्याण के उद्देश्य से प्रेरित था।

समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए मर्यादा आवश्यक है। इसी कारण भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। राम का जीवन एक आदर्श है, जबकि श्रीकृष्ण का जीवन एक लीला, एक उत्सव और एक गहन रहस्य है। आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रत्येक लीला के पीछे छिपे धर्म और लोककल्याण के उद्देश्य को समझें। ऐसा करने पर श्रीकृष्ण का प्रत्येक कार्य भी उतना ही मर्यादित प्रतीत होगा जितना भगवान राम का।

पुत्र के रूप में वनवास, भाई के रूप में पादुकाओं का त्याग और पति के रूप में सीता-वियोग—भगवान राम के जीवन में दुःखों का कोई ओर-छोर नहीं था। फिर भी उन्होंने कभी धर्म और मर्यादा का त्याग नहीं किया। वे सत्य के मार्ग पर अडिग रहे और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्रत्येक सुख का त्याग करते चले गए। वही शस्त्रधारी राम अंततः युद्धभूमि में अपना सम्मान और विजय दोनों प्राप्त करते हैं।

दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत व्यावहारिक और दूरदर्शी राजनेता के रूप में दिखाई देते हैं। वे परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेते हैं। जरासंध से संघर्ष के समय रणभूमि छोड़ने के कारण उन्हें रणछोड़ भी कहा गया, किंतु वह पलायन नहीं, बल्कि व्यापक धर्म-रक्षा की रणनीति थी। वे जानते थे कि कब युद्ध करना है और कब समय की प्रतीक्षा करनी है। यही एक कुशल नेतृत्व की पहचान है।

इसके विपरीत भगवान राम राजनेता नहीं, बल्कि आदर्श राजा और धर्मनिष्ठ पुरुष हैं। इसलिए उनके लिए समाज की मर्यादा और धर्मसम्मत आचरण सर्वोपरि है। दोनों के मार्ग भिन्न दिखाई देते हैं, किंतु उनका लक्ष्य एक ही है—धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश।

कृष्ण अध्याय दो के 38वें श्लोक में स्वयं कहते हैं—

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।। (2.38)

अर्थात् सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा जय-पराजय को समान समझकर, उनमें राग-द्वेष न रखते हुए अपने कर्तव्यरूपी युद्ध के लिए प्रयत्न कर। इस प्रकार कर्म करते हुए तू पाप का भागी नहीं होगा। यह अत्यंत प्रासंगिक उपदेश है।

राम का जीवन बचपन से ही वनवासियों, ऋषियों और आदिवासियों के बीच रहकर धर्म-कर्म के कार्यों का केंद्र रहा। उन्होंने ऋषियों की रक्षा के लिए असुरों का वध किया तथा वनवासियों को शिक्षित एवं संगठित किया। दूसरी ओर, कृष्ण का सामना बचपन से ही राजाओं से होता रहा और वे राजनीति के केंद्र में रहे।

राम महलों में पैदा हुए, पले और बाद में वनवास किया; जबकि कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ, पालन-पोषण गोकुल में हुआ और बाद में वे महलों में पहुँचे। बंदीगृह में जन्मे कृष्ण को शैशव से ही षड्यंत्रों और विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। राम ने तपस्वी, वनवासी और त्यागमय जीवन जीकर धर्म की रक्षा का कार्य प्रारंभ किया। अर्थात् भिन्न-भिन्न काल, युग और समय की आवश्यकताओं के अनुसार दोनों ने अपने चरित्र को ढालकर लोगों के समक्ष हर परिस्थिति में जीने की कला का उदाहरण प्रस्तुत किया।

भगवान श्रीकृष्ण और उनके कुल का प्रमुख कार्य गोपालन था। श्रीकृष्ण ने इस क्षेत्र को व्यवस्थित कर उसका विस्तार किया, इसलिए उन्हें श्वेत क्रांति का अग्रदूत कहा जा सकता है। वहीं भगवान राम ने चौदह वर्षों के वनवास के दौरान वनभूमि में कृषि का विस्तार किया, पर्णकुटी में रहना सिखाया तथा वनवासियों की भूख का समाधान किया। इस दृष्टि से उन्हें हरित क्रांति का प्रेरणास्रोत कहा जा सकता है।

राम की कर्मभूमि पूर्वी और दक्षिण भारत रही, जबकि कृष्ण की कर्मभूमि उत्तर और पश्चिम भारत रही। पूर्वी और दक्षिणी भारत का मुख्य भोजन चावल है, जबकि उत्तर और पश्चिम भारत में दुग्ध उत्पाद प्रमुख हैं। कृष्ण ने गौपालन के माध्यम से नई अर्थव्यवस्था का विस्तार किया, वहीं राम ने कृषि और वन-संपदा को अर्थव्यवस्था का आधार बनाया। आधार चाहे जो भी रहा हो, दोनों के मन में लोककल्याण और आर्थिक समृद्धि की भावना समान रूप से विद्यमान थी।

सर्वशक्तिमान हनुमान, अंगद, लक्ष्मण, सुग्रीव और जाम्बवान जैसे महापुरुष भगवान राम के परम भक्त थे। प्रभु श्रीराम की भक्ति तो स्वयं भगवान शिव भी करते हैं। दूसरी ओर, भगवान श्रीकृष्ण को भगवान के रूप में स्वीकार करने में अर्जुन और बलराम को भी समय लगा। श्रीकृष्ण तो अपने भक्तों के भी भक्त थे। भक्ति के सभी मार्ग अंततः श्रीराम की ओर ही ले जाते हैं।

महाभारत के युद्ध में भगवान हनुमान ने भी श्रीकृष्ण का सहयोग किया, क्योंकि श्रीकृष्ण और श्रीराम एक ही परम तत्व के दो स्वरूप हैं। इसीलिए महाभारत के युद्ध में हनुमान उसी रथ की ध्वजा पर विराजमान थे, जिसके सारथी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे। इसका उल्लेख गीता के प्रथम अध्याय के 20वें श्लोक में मिलता है—

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।।

अर्थात् उस समय हनुमान-चिह्न वाली ध्वजा से सुशोभित रथ पर बैठे पाण्डुपुत्र अर्जुन ने युद्ध के लिए धनुष उठाया। हे राजन्! आपके पुत्रों को युद्ध-व्यूह में खड़ा देखकर उन्होंने श्रीकृष्ण से यह वचन कहा।

भगवान राम अपने मित्रों को बिना माँगे ही उनकी अभिलाषित वस्तु प्रदान कर देते हैं। उन्होंने सुग्रीव और विभीषण को क्रमशः बालि और रावण का राज्य दिलाया। इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को वैभव प्रदान किया तथा लोककल्याण के लिए कालिय नाग का मर्दन किया और गोवर्धन पर्वत धारण किया।

भगवान राम और श्रीकृष्ण की युद्ध-नीतियों में अंतर अवश्य दिखाई देता है। कहा जा सकता है कि राम ने अपने सम्मान और धर्म की रक्षा के लिए युद्ध किया, जबकि श्रीकृष्ण ने स्वयं के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए महाभारत का मार्ग प्रशस्त किया।

भगवान राम को रावण और उसके सहयोगियों के छल, मायावी शक्तियों तथा समुद्र पार करने जैसी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण के पास अपनी सेना होते हुए भी उन्होंने उसे कौरवों को दे दिया और स्वयं पाण्डवों की ओर से बिना अस्त्र-शस्त्र उठाए युद्ध का संचालन किया।

भगवान राम ने वन और अन्य स्थानों पर एक-एक करके असुरों का संहार किया, जबकि श्रीकृष्ण ने अनेक दुष्टों का अंत परिस्थितियों के अनुरूप किया।

एक कंस पापी संहारे, एक दुष्ट रावण मारे।
दोनों अधीन दुःखहर्ता, दोनों बल के धाम।।

भगवान राम का चरित्र सर्वथा अनुकरणीय है। भगवान कृष्ण का चरित्र चिंतन का विषय है, किंतु दोनों ही वंदनीय हैं।

राम का जन्म त्रेतायुग में चैत्र शुक्ल नवमी को दोपहर के समय हुआ, जबकि कृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में हुआ। जहाँ राम के जन्म के समय चारों ओर प्रकाश था, वहीं कृष्ण के जन्म के समय घनघोर अंधकार था। राम का जन्म राजमहल में हुआ, जबकि कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ।

राम श्यामवर्ण थे और कृष्ण घनश्याम वर्ण के। किंतु तात्त्विक दृष्टि से दोनों एक ही सत्य के दो रूप हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम सिक्के का केवल एक पक्ष देखते हैं या संपूर्ण सिक्का।

गीता कहती है—

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः। (12.4)

और रामायण कहती है—

परहित बस जिनके मन माहीं, तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।

इसी प्रकार—

माखन ब्रज में एक चुरावे, एक बेर भीलनी के खावे।
प्रेम-भाव से भरे अनोखे, दोनों के हैं काम।।
जग में सुंदर हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम।।

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