शांति और सद्भाव किसी भी देश की बुनियादी आवश्यकता हैं। देश के नागरिक तभी स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सकते हैं और वास्तविक समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं, जब समाज का वातावरण शांतिपूर्ण हो। हाल के वर्षों में मणिपुर और नूँह जैसी हिंसक घटनाओं ने मन को उद्वेलित और व्यथित किया। ऐसे समय में जब मैंने अपने प्रिय ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में वास्तविक शांति का मार्ग खोजने का प्रयास किया, तब अनुभव हुआ कि स्थायी शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मन की आंतरिक अवस्था से प्राप्त होती है।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥ (गीता 2.65)
अर्थात् भगवान की कृपा से मनुष्य के समस्त दुःखों का नाश होने लगता है। जब मन प्रसन्न और निर्मल हो जाता है, तब उसकी बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
भगवान स्वयं सत्-चित्-आनंद स्वरूप हैं। उनकी कृपा से मनुष्य को दिव्य ज्ञान, दिव्य प्रेम और दिव्य आनंद की प्राप्ति होती है। जब भगवद्कृपा से दिव्य प्रेमरस का अनुभव होता है, तब इंद्रिय-सुखों की तीव्र लालसा स्वतः शांत होने लगती है। जैसे-जैसे सांसारिक विषय-भोगों की आसक्ति समाप्त होती है, वैसे-वैसे मनुष्य दुःखों से ऊपर उठकर वास्तविक शांति का अनुभव करता है।
ऐसी आंतरिक संतुष्टि से बुद्धि दृढ़ निश्चय करती है कि समस्त सुखों का वास्तविक स्रोत केवल भगवान हैं। पहले बुद्धि इस सत्य को शास्त्रों के आधार पर स्वीकार करती है, किंतु भगवद्कृपा से जब इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है, तब सभी संदेह समाप्त हो जाते हैं और बुद्धि भगवान में स्थिर हो जाती है। यही कारण है कि कहा गया है—“भगवान को जानो और शांति प्राप्त करो।”
भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं—
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥ (गीता 2.66)
अर्थात् जिसका मन और इंद्रियाँ वश में नहीं हैं, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती। ऐसा व्यक्ति न तो भगवान का चिंतन कर सकता है और न ही उनकी कृपा प्राप्त कर सकता है। जिसके भीतर शांति नहीं है, वह सुख भी प्राप्त नहीं कर सकता।
दिव्य प्रेम का अनुभव किए बिना मनुष्य के लिए सांसारिक भोगों का त्याग करना अत्यंत कठिन होता है। वह उसी प्रकार विषय-भोगों के पीछे दौड़ता रहता है, जैसे मधुमक्खी फूल के मधुर रस के प्रति आकर्षित रहती है।
उपनिषदों में एक सुंदर कथा आती है। एक मधुमक्खी कमल के फूल का रसपान कर रही थी। सूर्यास्त होने लगा और कमल की पंखुड़ियाँ धीरे-धीरे बंद होने लगीं। किंतु मधुमक्खी ने सोचा, “अभी बहुत समय है, मैं थोड़ा और मधुरस पी लेती हूँ।” धीरे-धीरे कमल पूरी तरह बंद हो गया और वह उसके भीतर ही फँस गई।
मधुमक्खी ने फिर भी आशा नहीं छोड़ी। उसने सोचा, “रातभर यहीं रहूँगी और सुबह कमल खिलते ही बाहर निकल जाऊँगी।” उसी समय एक हाथी आया, उसने कमल की डंडी तोड़कर पूरा फूल निगल लिया। मधुमक्खी भी उसके साथ हाथी के पेट में पहुँच गई और शीघ्र ही उसका अंत हो गया।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी इस कथा के माध्यम से समझाते हैं कि मनुष्य भी इंद्रिय-सुखों में इतना आसक्त हो जाता है कि संतों और शास्त्रों की सीख पर ध्यान नहीं देता। अंततः काल उसे मृत्यु के रूप में अपने वश में कर लेता है। जो व्यक्ति इंद्रियों को निरंतर तृप्त करने में लगा रहता है, वह प्रकृति के तीनों गुणों के बंधनों में बँध जाता है।
भौतिक इच्छाएँ खुजली की भाँति हैं। उन्हें जितना अधिक खुजलाया जाता है, वे उतनी ही बढ़ती जाती हैं। इसी प्रकार इच्छाओं की पूर्ति का प्रयास उन्हें समाप्त नहीं करता, बल्कि और अधिक प्रबल बना देता है। अनेक लोग जब अपनी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाते, तो उनका असंतोष समाज में क्रोध, द्वेष और अंततः हिंसा के रूप में प्रकट होता है। ऐसे में न व्यक्ति स्वयं सुखी रह सकता है और न समाज में शांति स्थापित हो सकती है।
भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं—
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ (गीता 2.70)
जिस प्रकार असंख्य नदियों का जल निरंतर समुद्र में प्रवेश करता है, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा और स्थिरता नहीं छोड़ता, उसी प्रकार आत्मज्ञानी व्यक्ति भी इंद्रिय-विषयों के संपर्क में रहकर अथवा उनसे वंचित रहकर समान भाव बनाए रखता है। वही वास्तविक शांति प्राप्त करता है; इच्छाओं के पीछे भागने वाला कभी शांत नहीं हो सकता।
मेरा मानना है कि देश में स्थायी शांति और सद्भाव तभी स्थापित हो सकते हैं, जब प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को समझे और समाज के प्रति संवेदनशील बने। केवल सरकार के प्रयासों से भाईचारा और सामाजिक सौहार्द कायम नहीं रह सकता। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को अपने भीतर शांति, संयम और करुणा का विकास करना होगा।
भगवद्गीता का संदेश यही है कि विश्व शांति का मार्ग व्यक्ति की आंतरिक शांति से होकर गुजरता है। जब व्यक्ति का मन शांत होगा, तभी परिवार, समाज, राष्ट्र और अंततः पूरा विश्व शांति और सद्भाव की ओर अग्रसर होगा।
