वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में नेतृत्व और प्रबंधन को सीखने-सिखाने पर सर्वाधिक चिंतन एवं शोध हो रहे हैं। प्राचीन भारतीय वाङ्मय के अध्ययन से भी हमें इस संबंध में महत्वपूर्ण दिशा प्राप्त होती है। श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य को जीवन के विभिन्न प्रसंगों में उत्पन्न होने वाली निराशा और हताशा से उबारकर उचित मार्ग दिखाने वाला दिव्य ग्रंथ है। इसमें भक्ति योग, कर्मयोग और ज्ञानयोग का वर्णन होने के साथ-साथ श्रेष्ठ व्यक्ति बनकर प्रभावी नेतृत्व करने का मार्गदर्शन भी प्राप्त होता है।
गीता के तीसरे अध्याय के 11वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।। (3.11)
अर्थात्, तुम अपने कर्तव्यों और यज्ञमय कर्मों द्वारा देवताओं का पोषण करो और वे तुम्हारा पोषण करेंगे। इस प्रकार परस्पर सहयोग और संवर्धन के भाव से तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।
नेतृत्व की दृष्टि से गीता का यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि प्रभावी नेतृत्व करना है, तो समूह बनाकर कार्य करना होगा। जब हम दूसरों की चिंता करेंगे और दूसरे हमारी चिंता करेंगे, तभी परस्पर सामंजस्य और सहयोग के आधार पर सफलता प्राप्त होगी। हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि हममें से कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है, किंतु अनेक गुणों और विविध क्षमताओं से युक्त लोग मिलकर पूर्णता के साथ किसी भी महान लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।
इसी सत्य को स्पष्ट करने वाली एक प्रसिद्ध कथा है। जंगल में भीषण आग लगी थी। वहाँ एक अंधा और एक लंगड़ा व्यक्ति थे। अंधा चल सकता था, किंतु उसे दिखाई नहीं देता था; जबकि लंगड़ा देख सकता था, पर चल नहीं सकता था। आज मानव समाज की स्थिति भी कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है।
आज विज्ञान उन्नति के शिखर पर पहुँच चुका है, किंतु मानव बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। व्यक्ति-व्यक्ति, जाति-जाति, धर्म-धर्म और देश-देश के बीच परस्पर समन्वय की आवश्यकता तो है ही, उससे भी अधिक आवश्यकता विज्ञान और धर्म के संतुलित समन्वय की है। बाहरी सफलता और भीतरी शांति—इन दोनों का संतुलन ही मानवता की सुरक्षा का आधार है। यदि यह संतुलन नहीं बना, तो मानवता बड़े संकट की ओर बढ़ सकती है।
विज्ञान निरंतर आगे बढ़ रहा है, पर यदि उसके पास नैतिक दिशा न हो, तो वह ऐसे अंधे के समान है जिसके पास चलने की शक्ति तो है, किंतु यह ज्ञान नहीं कि वह किस दिशा में जा रहा है। यदि तीसरा विश्वयुद्ध हुआ, तो संभव है कि वह मानव सभ्यता का अंतिम युद्ध सिद्ध हो। दूसरी ओर, धर्म यदि केवल सिद्धांत बनकर रह जाए और व्यवहार में न उतरे, तो वह उस लंगड़े के समान है जिसे मार्ग तो दिखाई देता है, पर वह स्वयं चल नहीं सकता। इसलिए विज्ञान और धर्म, पूर्व और पश्चिम, तथा बाहरी और आंतरिक जीवन—इन सभी के बीच संतुलन और समन्वय अत्यंत आवश्यक है। यही मानवता के सुरक्षित भविष्य की कुंजी है।
कथा में आगे बताया गया है कि अंधे ने लंगड़े को अपने कंधे पर बैठा लिया। लंगड़ा मार्ग बताता गया और अंधा चलता गया। इस प्रकार दोनों सुरक्षित जंगल से बाहर निकल आए। यह कथा बताती है कि जब सामर्थ्य और बुद्धि का समन्वय होता है, तभी संकटों पर विजय प्राप्त होती है।
यदि बुद्धि और कौशल को एक-दूसरे का सहयोग न मिला होता, तो मनुष्य आज की विकसित और सभ्य अवस्था तक कभी नहीं पहुँच पाता। सहयोग का ही चमत्कार है कि आदिमानव, जो कभी भोजन के लिए एक-दूसरे से संघर्ष करता था, उसने परिवार बसाना, समाज बनाना और संगठित जीवन जीना सीखा। विज्ञान, कला, साहित्य, इतिहास और भूगोल की असंख्य उपलब्धियाँ किसी एक व्यक्ति के पुरुषार्थ का परिणाम नहीं हैं; वे सामूहिक प्रयास और परस्पर सहयोग की देन हैं।
मानव प्रगति और उन्नति का सबसे बड़ा रहस्य परस्पर सहयोग की भावना है। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि जिन व्यक्तियों में सहयोग की वृत्ति विकसित हो जाती है, उनमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना स्वतः जागृत हो जाती है। वे अनुभव करने लगते हैं कि संसार के सभी प्राणी एक ही विशाल परिवार के सदस्य हैं। जितना अधिक सहयोग, सद्भाव और मैत्री का विस्तार होगा, उतना ही लौकिक और पारलौकिक कल्याण संभव होगा।
इतिहास में जितने भी महान नेता, महापुरुष और मानवता के पथप्रदर्शक हुए हैं, उनकी सबसे बड़ी विशेषता मैत्रीभाव, करुणा और परस्पर सहयोग की भावना रही है। वे समस्त प्राणियों को आत्मीय दृष्टि से देखते थे और उनके दुःखों को दूर करने के लिए अपनी समस्त शक्ति समर्पित कर देते थे। यही नेतृत्व का सर्वोच्च आदर्श है और यही श्रीमद्भगवद्गीता का कालजयी संदेश भी है।
