आज के वातावरण में गीता का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है, जब हम अपने से श्रेष्ठ और उच्च पदों पर आसीन लोगों के अमर्यादित एवं भ्रष्ट आचरण, असंयमित वाणी तथा निम्न मानसिकता के उदाहरण प्रतिदिन देखते और सुनते हैं।
श्रीकृष्ण ने अपने जीवन और आचरण से सिखाया कि जीवन में चाहे कितनी भी चुनौतियाँ क्यों न आएँ, हमें सदैव प्रसन्न और मुस्कुराते रहना चाहिए। इससे न केवल दूसरे लोग प्रेरित होते हैं, बल्कि कठिन से कठिन समस्या का समाधान भी सहज हो जाता है।
श्रीकृष्ण ने सुदामा तथा अपने अन्य सखाओं के माध्यम से यह शिक्षा दी कि मित्रता एक ऐसा महान और सच्चा धर्म है, जो न जाति-पाँति देखता है, न धन-दौलत और न ही ऊँच-नीच। मित्र को उसकी कमियों सहित स्वीकार करना ही सच्ची मित्रता है। यही कारण है कि आज भी संसार श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता को आदर्श मानकर उसका उदाहरण देता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम का संदेश दिया। उनका प्रेम केवल स्त्री-पुरुष के पारस्परिक प्रेम तक सीमित नहीं था, जैसा कि आज प्रायः समझ लिया जाता है। उनका प्रेम सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति था। वे समस्त जगत को अपना परिवार मानने वाले प्रभु हैं। वास्तव में “वसुधैव कुटुम्बकम्” का व्यावहारिक संदेश भी उन्होंने अपने जीवन द्वारा ही दिया। यही वाक्य हाल ही में सम्पन्न जी-20 सम्मेलन का ध्येय वाक्य भी रहा।
गीता के तृतीय अध्याय के 21वें श्लोक में भगवान कहते हैं—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ 3.21॥
अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग भी उसी का अनुसरण करते हैं। वह जो मानक स्थापित करता है, समाज उसी के अनुसार चलने लगता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कभी गौ-चारण किया, तो कभी ग्वाल-बालों तथा पशु-पक्षियों के साथ प्रेमपूर्वक समय बिताया। उन्होंने सभी जीवों के प्रति करुणा और प्रेम का व्यवहार करके मानवता को प्रेरणा दी।
जब-जब कंस ने श्रीकृष्ण की हत्या के लिए असुरों को भेजा और उनके कारण गोकुलवासियों तथा ग्वाल-बालों को कष्ट उठाना पड़ा, तब-तब श्रीकृष्ण स्वयं आगे बढ़कर उनका सामना करते रहे। यह एक आदर्श नेतृत्वकर्ता का स्वरूप है। इससे हमें और आज के नेतृत्वकर्ताओं को यह शिक्षा मिलती है कि दूसरों के कल्याण के लिए स्वयं आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
भाई-बहन के अटूट स्नेह का उदाहरण भी भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के चीरहरण के समय उसकी लाज बचाकर प्रस्तुत किया। इससे बढ़कर कोई भाई अपनी बहन की रक्षा का उदाहरण शायद ही दे सकता है। महिलाओं के सम्मान और उनकी गरिमा की रक्षा का संदेश भी हमें भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से प्राप्त होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार त्रेतायुग में माता सीता अपनी माँग में सिंदूर धारण करती थीं। एक बार जब वे सिंदूर लगा रही थीं, तभी हनुमान जी वहाँ पहुँचे। उन्होंने जिज्ञासावश पूछा, “माता! आप अपनी माँग में सिंदूर क्यों लगाती हैं?”
माता सीता ने उत्तर दिया, “मैं अपने स्वामी श्रीराम की दीर्घायु और मंगल के लिए सिंदूर धारण करती हूँ।”
यह सुनकर हनुमान जी ने सोचा कि यदि थोड़े से सिंदूर से प्रभु श्रीराम की आयु और कल्याण होता है, तो मैं अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लूँ, जिससे मेरे आराध्य का और भी अधिक मंगल हो। ऐसा विचार कर उन्होंने अपने सम्पूर्ण शरीर पर सिंदूर लगा लिया। यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि महान व्यक्तियों के आचरण का प्रभाव उनके अनुयायियों पर कितना गहरा होता है।
किसी राज्य का राजा, शासन का प्रमुख, परिवार का पिता तथा विद्यालय का शिक्षक—ये सभी समाज के स्वाभाविक नेता माने जाते हैं। ऐसे प्रत्येक नेतृत्वकर्ता की अपने आश्रितों के प्रति अत्यंत बड़ी जिम्मेदारी होती है। उनके आचरण का प्रभाव अनेक लोगों के जीवन पर पड़ता है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं—
“बालकृष्ण, यशोदानन्दन, नन्दलाल, माखनचोर, वंशीधर, मधुसूदन, नटवर और अंततः योगीराज द्वारकाधीश श्रीकृष्ण—यह जीवन की ऐसी यात्रा है, जो प्रत्येक चरण पर हमें नई शिक्षा देती है।”
भगवान श्रीकृष्ण ने मोहग्रस्त अर्जुन को अपने श्रीमुख से भगवद्गीता का दिव्य उपदेश दिया। यह उपदेश आज भी मनुष्य को जीवन की उलझनों से बाहर निकालने में सक्षम है तथा उसे श्रेष्ठ, उत्तरदायी और आदर्श मानव बनने के लिए प्रेरित करता है। यही एक श्रेष्ठ पुरुष की वास्तविक पहचान है।
