॥ गुरु वंदना ॥
गीता मनीषी
स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज
को समर्पित
जिनकी वाणी में गीता का अमृत निर्झर बहता है,
जिनके चिंतन से भारत का गौरव नित निखरता है।
जिनके विचारों ने जीवन को उद्देश्य और मान दिया है।
ऐसे गुरुवर को कोटिशः प्रणाम,
शत-शत अभिनन्दन किया है।
श्लोक नहीं, जीवन का व्यवहार सिखाया है,
कर्म में योग और प्रेम का सार समझाया है।
भटके मन को कर्तव्य का पथ दिखलाया है,
हर अर्जुन को कृष्ण का विश्वास दिलाया है।
जिनके शब्दों में
दर्शन की अथाह गहराई है,
विज्ञान की प्रखर तार्किकता है,
मनोविज्ञान की सूक्ष्म सच्चाई है।
जीवन की सहज सरलता है,
सेवा की निष्काम पवित्रता है,
और हर हृदय में जागृत होती
आत्मज्योति की दिव्य उज्ज्वलता है।
विद्वत्ता जहाँ विनम्रता का आभूषण बन जाती है,
तप जहाँ लोकसेवा की गंगा बन वह जाती है।
अध्यात्म और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय
जिनमें दिखता है।
ऐसा युगदृष्टा गुरु बिरलों को ही जग में मिलता है।
जब तक गीता का अमर संदेश रहेगा,
तब तक आपका तप, आपका यश विशेष रहेगा।
हर हृदय में कृष्ण-प्रेम का दीपक जलता रहेगा,
आपका ज्ञान युगों-युगों तक
पथ प्रदर्शक बनता रहेगा।
हम तो आपकी वाणी के विनम्र अनुयायी रहेंगे,
गीता के संदेश को जीवन-जीवन तक
पहुँचाते रहेंगे।
जब तक यह साँसें चलती रहेंगी,
बंसी तो मारकण्डे की बजती रहेगी;
ज्ञानानंद गुरुवर की गाथा सुनाती रहेगी।
जब तक धरा पर धर्म की ज्योति जलती रहेगी,
तब तक गीता की वाणी गूँजती रहेगी।
शिष्य बदलेंगे, युग बदलेंगे, समय बदल जाएगा,
पर गुरु का दिया प्रकाश अमर कहलाएगा।
बंसी तो मारकण्डे की बजती रहेगी,
ज्ञानानंद गुरुवर की गाथा सुनाती रहेगी।
कोटिशः प्रणाम
ऐसे गुरुवर को जो जीवन को दिशा,
समाज को दृष्टि और राष्ट्र को चेतना देते हैं।
बंसी तो मारकण्डे की बजती रहेगी,
ज्ञानानंद गुरुवर की गाथा सुनाती रहेगी।
