ममत्व को समझेंगे, तो गीता को समझना आसान हो जाएगा।

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समस्त हिंसा अपने और पराए के बीच खींची गई रेखा से पैदा होती है

जितना हिंसक मन होता है, उतना ही वह ममत्व से भरा होता है। हिंसा और ममत्व साथ-साथ चलते हैं। जहाँ ममत्व है, वहाँ विभाजन है; जहाँ विभाजन है, वहाँ संघर्ष है। अहिंसा तभी संभव है, जब मनुष्य ‘मैं’ और ‘मेरा’ की सीमाओं से ऊपर उठ जाए। वास्तव में जिसे अहिंसक होना है, उसे ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव का त्याग करना ही होगा।

जैसे ही मैं किसी वस्तु, व्यक्ति या संबंध के लिए कहता हूँ—“यह मेरा है”, उसी क्षण जो मेरा नहीं है, वह मुझसे अलग हो जाता है। जैसे ही मैं किसी को अपना मित्र कहता हूँ, उसी क्षण किसी दूसरे के लिए शत्रु बनने की संभावना भी जन्म ले लेती है। अपने और पराए के बीच जो रेखा खिंचती है, वही समस्त हिंसा का मूल कारण बनती है।

महाभारत के युद्धभूमि में अर्जुन का शरीर शिथिल हो गया। उसके हाथ काँपने लगे, मन भ्रमित हो गया। परंतु यह इसलिए नहीं था कि वह अचानक अहिंसा का उपासक बन गया था, या उसे हिंसा से घृणा होने लगी थी। उसके भीतर जो संकट उत्पन्न हुआ, उसका कारण हिंसा का ही एक गहरा आधार था—ममत्व

अर्जुन के सामने उसके अपने बंधु-बांधव, गुरु, संबंधी और प्रियजन खड़े थे। यदि वहाँ अपरिचित लोग होते, तो संभवतः वह बिना किसी मानसिक संघर्ष के युद्ध कर लेता। कठिनाई इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि सामने ‘अपने’ खड़े थे। यही ममत्व था, जिसने उसके मन को बाँध लिया।

यदि इस तथ्य को समझ लिया जाए, तो भगवद्गीता को समझना अत्यंत सरल हो जाता है। अनेक लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि अर्जुन अहिंसा की ओर झुक गया था और श्रीकृष्ण ने उसे हिंसा के लिए प्रेरित किया। परंतु यह धारणा गीता की मूल भावना को नहीं समझ पाती।

यदि अर्जुन वास्तव में अहिंसा की ओर अग्रसर होता, तो भगवान श्रीकृष्ण उसे कभी हिंसा के लिए प्रेरित नहीं करते। श्रीकृष्ण भली-भाँति जानते थे कि अर्जुन का संकट अहिंसा का नहीं, बल्कि ममत्व का संकट है। उसका मन हिंसा से नहीं, बल्कि ‘मेरे’ और ‘अपने’ के मोह से बँधा हुआ था।

अहिंसा केवल उसी मन में उत्पन्न होती है, जहाँ अपना-पराया समाप्त हो जाता है। अर्जुन का संकट इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि पहली बार उसे अपने भीतर छिपे ममत्व का साक्षात्कार हुआ।

संकट के क्षण मनुष्य को अपने मन की गहराइयों से परिचित कराते हैं। सामान्य परिस्थितियों में हम स्वयं को नहीं पहचान पाते, किंतु जब जीवन किसी निर्णायक मोड़ पर खड़ा होता है, तब हमारे भीतर छिपी वास्तविक वृत्तियाँ सामने आती हैं।

युद्ध का शंखनाद हो चुका था। उसी क्षण अर्जुन को लगा—“ये मेरे लोग हैं।” उसने यह नहीं कहा कि युद्ध अधर्म है या हिंसा अनुचित है। उसने कहा—

“अपने ही संबंधियों को मारने के विचार से मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मेरा शरीर काँप रहा है और मेरा मन भ्रमित हो रहा है।”

यही ममत्व है।

जिसने अपने जीवन का आधार ‘मेरे लोग’ बना लिया हो, उसके लिए उन्हीं के विरुद्ध खड़ा होना अत्यंत कठिन होता है। अर्जुन सोचने लगा—यदि दोनों ओर अपने ही लोग हैं, तो विजय का क्या अर्थ रह जाएगा? साम्राज्य किसके लिए होगा? सुख किसके साथ बाँटा जाएगा?

यह विषाद अहिंसा का नहीं, बल्कि ममत्व का था।

इसीलिए श्रीकृष्ण को अर्जुन के मोह को तोड़ने के लिए विस्तृत उपदेश देना पड़ा। एक अर्थ में कहा जा सकता है कि गीता का संवाद अर्जुन की इसी मानसिक स्थिति के कारण प्रकट हुआ। यदि अर्जुन केवल यह कह देता कि युद्ध व्यर्थ है क्योंकि हिंसा व्यर्थ है, तो संभवतः गीता का उपदेश उस रूप में सामने ही नहीं आता।

श्रीकृष्ण स्पष्ट देख रहे थे कि अर्जुन हिंसा से नहीं, बल्कि ममत्व से बँधा हुआ है। उसकी युद्ध से पीछे हटने की इच्छा भी उसी ममत्व से उत्पन्न हुई थी।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि ममत्व हिंसा का सबसे सूक्ष्म और गहरा रूप है। जहाँ ‘मेरा’ का आग्रह है, वहाँ स्वामित्व है; जहाँ स्वामित्व है, वहाँ अपेक्षा है; जहाँ अपेक्षा है, वहाँ संघर्ष अवश्य जन्म लेता है।

पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई या किसी भी संबंध में जब अधिकार और स्वामित्व का भाव बढ़ जाता है, तब प्रेम का स्थान संघर्ष ले लेता है। सच्ची मैत्री अधिकार से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और सम्मान से जन्म लेती है।

एक रोचक प्रसंग इस सत्य को सहज ढंग से समझाता है। एक व्यक्ति चाहता था कि उसकी पत्नी उसे प्रेम-पत्र लिखे। उसने जाते समय पत्नी से कहा—पत्र की शुरुआत “प्राणों से प्यारे” लिखना और अंत में “चरणों की दासी” लिखना। पत्नी ने अनजाने में उल्टा लिख दिया—ऊपर लिखा “चरणों के दास” और नीचे लिखा “प्राणों की प्यासी”। यह हास्यप्रद प्रसंग बताता है कि केवल शब्दों से प्रेम नहीं आता; जहाँ अधिकार और स्वामित्व का आग्रह है, वहाँ प्रेम धीरे-धीरे संघर्ष में बदल जाता है।

आज परिवारों और रिश्तों में बढ़ते तनाव का मूल कारण भी यही है—‘मेरा’ का आग्रह।

अर्जुन को उस क्षण यही भय सताने लगा कि यदि उसके अपने ही समाप्त हो जाएँगे, तो विजय, साम्राज्य और प्रतिष्ठा का क्या अर्थ रह जाएगा? यह विचार उसे अहिंसक नहीं बना रहा था, बल्कि उसके ममत्व का उद्घाटन कर रहा था।

यदि अहिंसा का आधार ‘मैं’ और ‘मेरा’ है, तो वह वास्तविक अहिंसा नहीं हो सकती।

स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं—

“‘मैं’ और ‘मेरा’ के आधार पर अहिंसा का फूल कभी नहीं खिल सकता। जब तक ममत्व बना रहेगा, तब तक अहिंसा का वास्तविक विकास संभव नहीं है।”

इसीलिए गीता हमें केवल युद्ध का नहीं, बल्कि ‘मैं’ और ‘मेरा’ से मुक्त होकर समत्व, निष्कामता और व्यापक करुणा के साथ जीने का मार्ग सिखाती है।

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