‘थ्री इडियट्स’ और भगवद्गीता का संदेश
‘थ्री इडियट्स’ दो दोस्तों—माधवन और शरमन जोशी—की अपने खोए हुए मित्र की तलाश की कहानी है। इस यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन की अनेक भूली-बिसरी यादें ताज़ा हो जाती हैं। उन्हें हर हाल में एक शादी रोकनी होती है और एक अंतिम संस्कार में भी शामिल होना पड़ता है। जैसे-जैसे उनकी यात्रा आगे बढ़ती है, उन्हें अपने सबसे प्रिय मित्र रैंचो (आमिर खान) की याद आती है—एक मुक्त विचारक, अदम्य ऊर्जा से भरा हुआ युवा, जो अपने अनूठे विचारों और व्यवहार से लोगों के मन को छू लेता है तथा अपने मित्रों का जीवन बदल देता है।
उन्हें अपने हॉस्टल के दिन, रैंचो और पिया (करीना कपूर) के बीच का प्रेम और तकरार, तथा कॉलेज के कठोर और दमनकारी प्राचार्य प्रोफेसर वीरू सहस्त्रबुद्धे के साथ हुए संघर्ष याद आते हैं। फिर एक दिन रैंचो बिना किसी को बताए अचानक गायब हो जाता है। आखिर वह कहाँ गया? वह कौन था? कहाँ से आया था? और बिना कुछ बताए क्यों चला गया?
जब पूरी दुनिया उन्हें ‘इडियट’ कहती थी, तब उसी मित्र ने उन्हें अलग ढंग से सोचना सिखाया था। उसने उन्हें अपने भीतर छिपी प्रतिभा और गुणों को पहचानना सिखाया, अपने मन की सुनना सिखाया और जीवन जीने का सही अर्थ समझाया। उनके माता-पिता उन्हें उनकी इच्छा और प्रतिभा की परवाह किए बिना जबरन इंजीनियर बनाना चाहते थे, जबकि रैंचो उन्हें उनके स्वभाव के अनुरूप कार्य करने की प्रेरणा देता है।
फिर शुरू होती है उस ‘इडियट’ की खोज—जो वास्तव में अपने भीतर की खोज बन जाती है। यह यात्रा उन्हें हिमालय की सुंदर वादियों तक ले जाती है, जहाँ उन्हें अपने मित्र की वास्तविक कहानी और अपने अनेक प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं।
अधिकांश लोग मानते हैं कि थ्री इडियट्स केवल एक मनोरंजक कॉमेडी फिल्म है, जो कहीं रोमांचक है तो कहीं हँसी से भरपूर। परंतु मेरा मानना है कि यह मूलतः एक आध्यात्मिक फिल्म है। सतह पर यह मनोरंजन है, किंतु भीतर से यह मनुष्य को स्वयं की खोज करने, अपनी वास्तविक पहचान समझने और अपने स्वधर्म को पहचानने की प्रेरणा देती है।
मैंने इस फिल्म को अनेक बार देखा है और प्रत्येक बार मुझे भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय का 47वाँ श्लोक स्मरण हो आता है—
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ (18.47)
अर्थात्—अपने स्वधर्म का पालन यदि त्रुटिपूर्ण ढंग से भी किया जाए, तो वह दूसरे के धर्म को उत्कृष्ट रूप से निभाने से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म करने वाला मनुष्य पाप का भागी नहीं बनता।
जब मनुष्य अपने स्वधर्म अर्थात् अपने स्वभावानुकूल कर्तव्य का पालन करता है, तब उसे दो प्रकार से लाभ प्राप्त होते हैं। पहला, वह कार्य उसकी प्रकृति के अनुकूल होता है। जैसे पक्षी के लिए आकाश में उड़ना और मछली के लिए जल में तैरना स्वाभाविक है, वैसे ही स्वधर्म मनुष्य के व्यक्तित्व के अनुरूप होता है। दूसरा, ऐसा कार्य सहज होता है। उसे करने में अनावश्यक संघर्ष नहीं करना पड़ता, जिससे मन की ऊर्जा ईश्वर-चिंतन और भक्ति में सहज रूप से लग सकती है।
इसके विपरीत यदि मनुष्य अपने स्वभाव के विपरीत केवल दूसरों की नकल करते हुए कार्य करता है, तो वह अपने व्यक्तित्व की जन्मजात प्रवृत्तियों से संघर्ष करता है। परिणामस्वरूप न तो उसे कार्य में संतोष मिलता है और न ही जीवन में शांति।
अर्जुन की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। उनका क्षत्रिय स्वभाव उन्हें युद्ध और शासन के कार्यों की ओर प्रेरित करता था। परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना उनके लिए अनिवार्य हो गया। यदि वे युद्धभूमि छोड़कर वन में तपस्या करने चले जाते, तो उससे भी उन्हें आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता। संभव था कि वे वन में भी अपने नेतृत्व और संगठन क्षमता के कारण लोगों को संगठित कर उनका नेतृत्व करने लगते। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने स्वधर्म का पालन करते हुए कर्मफल भगवान को समर्पित करने का उपदेश दिया।
जब साधक आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर लेता है, तब उसका स्वधर्म केवल शरीर या व्यवसाय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आत्मा का धर्म बन जाता है—जो कि भगवान की भक्ति है। उस अवस्था में यदि कोई व्यक्ति सांसारिक कर्तव्यों का त्याग कर पूर्ण रूप से भक्ति में समर्पित हो जाए, तो वह भी उसके स्वभाव के अनुरूप स्वधर्म ही होता है।
इसी संदर्भ में गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं कि चाहे हम माता-पिता हों या शिक्षक, हमें बच्चों को उनकी छिपी हुई प्रतिभा, स्वभाव, गुण और दिव्यता के आधार पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। तभी समाज ‘विस्थापन’ की उस गंभीर समस्या से मुक्त हो सकेगा, जिसमें व्यक्ति वहाँ कार्य कर रहा होता है जहाँ उसे नहीं होना चाहिए।
मेरा मानना है कि आज भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में केवल बेरोज़गारी या महँगाई ही नहीं, बल्कि प्रतिभा का यह विस्थापन भी है। जब व्यक्ति अपने स्वभाव के विपरीत जीवन जीने के लिए विवश होता है, तब वह स्वयं भी दुखी रहता है और समाज भी उसकी वास्तविक क्षमता से वंचित रह जाता है। यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण गीता में बार-बार स्वधर्म पर इतना बल देते हैं।
