हाल ही में पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए। चुनावी सभाओं और भाषणों में हमने देखा कि लगभग हर राजनीतिक दल मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अपनी-अपनी गारंटियाँ दे रहा था। कोई मुफ्त राशन की गारंटी दे रहा था, कोई मुफ्त बिजली-पानी की, कोई मुफ्त इलाज की, कोई रसोई गैस की, तो कोई आवास की गारंटी। ऐसी अनेक घोषणाएँ चुनावी मंचों पर सुनाई दीं।
मुझे नहीं पता कि इन गारंटियों का चुनाव परिणामों पर कितना प्रभाव पड़ा, परंतु इतना अवश्य लगता है कि केवल ऐसी घोषणाएँ किसी राष्ट्र के स्थायी विकास का आधार नहीं बन सकतीं। ये चुनावी मौसम में दी जाने वाली अस्थायी बैसाखियाँ हैं। यदि जीवन में किसी गारंटी पर भरोसा करना है, तो वह केवल परमात्मा की गारंटी है; और यदि किसी सहारे को स्वीकार करना है, तो वह केवल योगेश्वर श्रीकृष्ण का।
भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता के नवम अध्याय के 22वें श्लोक में कहते हैं—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (9.22)
अर्थात् जो भक्त अनन्य भाव से निरंतर मेरा चिंतन और उपासना करते हैं, उनके योग और क्षेम का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ। उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति भी मैं करता हूँ और जो उनके पास है उसकी रक्षा भी करता हूँ।
यह भगवान की शाश्वत गारंटी है। जैसे एक माँ अपने ऊपर पूर्णतः आश्रित नवजात शिशु की देखभाल से कभी विमुख नहीं होती, वैसे ही भगवान अपने अनन्य भक्तों का संरक्षण करते हैं। इस दिव्य गारंटी की केवल एक ही शर्त है—अनन्य शरणागति।
इसी प्रकार भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय के 78वें श्लोक में संजय कहते हैं—
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ (18.78)
अर्थात् जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ निश्चित रूप से श्री (समृद्धि), विजय, विभूति (उन्नति) और अटल नीति विद्यमान रहती है।
यदि इस श्लोक को व्यवहारिक जीवन में समझें, तो जहाँ एक योग्य मार्गदर्शक हो और एक समर्पित शिष्य हो, वहाँ चार दिव्य उपलब्धियाँ अवश्य आती हैं—
श्री — समृद्धि।
विजय — सफलता।
भूति — उन्नति और ऐश्वर्य।
ध्रुवा नीति — स्थायी नैतिकता और धर्मपूर्ण आचरण।
ये चारों गारंटियाँ चुनावी वादे नहीं हैं, बल्कि भगवान की शाश्वत गारंटियाँ हैं। ये सभी के लिए उपलब्ध हैं—बिना किसी चुनावी मौसम के, बिना किसी राजनीतिक वादे के और सबसे बड़ी बात, बिना किसी स्वार्थ के।
अब प्रश्न उठता है कि इन गारंटियों को प्राप्त कैसे किया जाए?
इसके लिए हमें गीता के प्रथम श्लोक की ओर लौटना होगा, जहाँ धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं—
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ (1.1)
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी इस श्लोक के प्रथम दो शब्दों—धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे—का अत्यंत सुंदर अर्थ बताते हैं। उनके अनुसार इसका संदेश है—
“जिस क्षेत्र में भी कार्य करो, वहाँ धर्म को सर्वोपरि रखकर कार्य करो।”
और “मामकाः पाण्डवाश्च” का संकेत है कि ‘मेरा-तेरा’ के संकीर्ण भाव का त्याग कर समष्टि के हित में कार्य किया जाए।
यदि मनुष्य अपने कार्यक्षेत्र में धर्म को आधार बनाए और अहंकार तथा स्वार्थ से ऊपर उठकर कर्म करे, तो भगवान की ये शाश्वत गारंटियाँ स्वतः उसके जीवन में प्रकट होने लगती हैं।
इन्हीं तीन श्लोकों—(1.1), (9.22) और (18.78)—के गहन संदेश को ध्यान में रखते हुए “एक साथ, एक समय, एक मिनट गीता पाठ” जैसे वैश्विक अभियान के लिए इन्हें विशेष रूप से चुना गया है। इन तीन श्लोकों का नियमित पाठ मनुष्य को सम्पूर्ण भगवद्गीता का अध्ययन करने की प्रेरणा देता है।
आइए, हम सब इस वैश्विक अभियान का हिस्सा बनें, गीता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाएँ और प्रभु-कृपा के पात्र बनें। भगवान स्वयं कहते हैं—
जो मेरे संदेश को जग में फैलाएगा,
जो मेरी वाणी औरों तक पहुँचाएगा।
वही मुझे सबसे प्रिय होगा,
धरती पर वह मेरे लिए आकाश का सितारा होगा।
आइए, भगवान के प्रिय बनने का यह अवसर न चूकें और गीता में निहित इन शाश्वत गारंटियों का लाभ उठाएँ।
