भगवान का दिव्य प्रसाद है भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता, जिसे आदर और सम्मान के साथ गीतोपनिषद् भी कहा जाता है, भारतीय धर्म, दर्शन और अध्यात्म का अनूठा सार है। जो लोग वेद, दर्शन और उपनिषदों का अध्ययन नहीं कर सकते, उनके लिए भगवद्गीता एक अतुलनीय और प्रामाणिक मार्गदर्शक है। जीवन के उस मोड़ पर, जब व्यक्ति स्वयं को द्वंद्वों तथा चुनौतियों से घिरा हुआ पाता है और कर्तव्य-अकर्तव्य के असमंजस में फँस जाता है, तब भगवद्गीता उसका हाथ थामकर उसे मार्गदर्शन प्रदान करती है।

इस एक ही ग्रंथ में धर्म, कर्म, योग, जीवन, जगत, प्रकृति, पुरुष तथा इनके गहन रहस्यों का अद्भुत समावेश है। यह एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसमें ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का अद्भुत समन्वय मिलता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी स्वरूप भगवद्गीता का सबसे बड़ा संदेश यह है कि चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए, परमात्मा के प्रति हमारा विश्वास कभी डगमगाना नहीं चाहिए। दुःख अथवा चुनौतियों के समय जितना हम परमात्मा की कृपा का आश्रय लें, सुख के समय उससे भी अधिक उनकी कृपा के प्रति कृतज्ञ रहें।

परमात्मा की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता को भूलकर हम कर्मफल की व्यवस्था को अपने वश में करना चाहते हैं। ऐसा अहंकार केवल सामान्य लोगों को ही नहीं, बल्कि महापुरुषों तक को पतन की ओर ले जाता है।

भगवद्गीता की लगभग आधी शिक्षा, ऊर्जा और प्रेरणा इसी भ्रम का निवारण करने में लगी है। भगवान श्रीकृष्ण ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग के समन्वय से जिन प्रमुख तथ्यों को स्पष्ट करते हैं, वे हैं— अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय, कर्तव्य का बोध, आत्मा की नित्यता, शरीर की परिवर्तनशीलता, कर्म के प्रति दृढ़ता, कर्मफल के प्रति अनासक्ति तथा परमात्मा के प्रति अनन्य आस्था।

महापुरुषों ने विभिन्न ढंगों से की है गीता की व्याख्या

गीता के संदेश को जनसामान्य के लिए बोधगम्य बनाने हेतु आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, भास्कराचार्य, वल्लभाचार्य, मध्वाचार्य, स्वामी रामतीर्थ, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, विनोबा भावे तथा डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महान विद्वानों ने इसकी टीकाएँ और व्याख्याएँ लिखीं। इन भाष्यों ने गीता को आधुनिक संदर्भों में भी अत्यंत प्रासंगिक बनाए रखा है।

इन व्याख्याओं से गीता के अध्येताओं को नई प्रेरणा, नई दिशा और नई जीवन-दृष्टि प्राप्त होती है, चाहे वे वैज्ञानिक हों, मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञ, संन्यासी, दार्शनिक, शिक्षक अथवा विद्यार्थी। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद द्वारा रचित गीता प्रेरणा गीता की अत्यंत सरल, सटीक, सुबोध, व्यावहारिक तथा वैज्ञानिक व्याख्या है।

मुश्किलों से पार लगाने का महामंत्र

आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद भी मनुष्य के लिए सद्ज्ञान, सिद्धांतों और आदर्शों के अनुरूप जीवन जीना सदैव सरल नहीं होता। संसार और समाज की परिस्थितियों के कारण अनेक बार सत्य से समझौता करने का दबाव उत्पन्न हो जाता है। सबसे बड़ी चुनौतियाँ प्रायः उन्हीं लोगों के कारण सामने आती हैं जिन्हें हम अपना मानते हैं। ऐसे समय में कर्तव्य-पथ पर अडिग रहना कभी-कभी अत्यंत कठिन प्रतीत होता है।

भगवद्गीता इसी झिझक और असमंजस से बाहर निकलने का उपदेश देती है। यह केवल उपदेशात्मक ग्रंथ नहीं है, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक जीवन-दर्शन प्रस्तुत करती है। इसमें केवल सलाह ही नहीं, बल्कि तर्क, विवेक और शाश्वत मूल्यों के आधार पर सत्य का पालन करने की प्रेरणा दी गई है।

श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में केवल निराश और हतोत्साहित अर्जुन को ही धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित नहीं किया, बल्कि समस्त मानवजाति को अपने कर्तव्यों का बोध कराते हुए उन्हें बिना संशय उनका पालन करने का आह्वान किया है।

यही श्रीमद्भगवद्गीता की महान विशेषता है।

सत्य से साक्षात्कार कराती है गीता

गीता हमें केवल उपदेश या मार्गदर्शन ही नहीं देती, बल्कि जीवन के उन गहन सत्यों से भी परिचित कराती है, जिन्हें जान लेने पर भ्रम, असत्य और अंधविश्वास स्वतः दूर हो जाते हैं। गीता का उद्देश्य हमारे व्यक्तित्व पर आरोपित मिथ्या धारणाओं और भ्रमों से हमें सजग करना है। इसके बाद आगे का मार्ग स्वयं स्पष्ट होने लगता है।

समस्या यह है कि हम अपने वास्तविक अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते, क्योंकि हमारे व्यक्तित्व पर आरोपित असत्य केवल इस जन्म के नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतरों से चले आ रहे हैं। इसलिए उनके निराकरण के लिए केवल दर्पण दिखा देना पर्याप्त नहीं होता; सत्य को अनेक दृष्टिकोणों से समझाना पड़ता है।

योगी अरविंद का अनुभव था—

“गीता के वचनों में सत्य की झलक इतनी स्पष्ट दिखाई देती है कि एक बार उसके संपर्क में आने वाला व्यक्ति सहज ही उसका प्रशंसक बन जाता है।”

सभी आध्यात्मिक परम्पराओं में है सम्मान एवं स्वीकार्यता

भगवद्गीता भारत की सभी धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक परम्पराओं में समान रूप से स्वीकार्य है। सांख्य, योग और वेदान्त के अनेक गूढ़ रहस्य इसके श्लोकों में समाहित हैं। साथ ही, न्याय, वैशेषिक और मीमांसा के सिद्धान्तों की व्याख्या भी इसमें सहज रूप से उपलब्ध हो जाती है। यह वेदों से लेकर दर्शनों, उपनिषदों और पुराणों तक के सार को अपने भीतर समेटे हुए है। न इसका किसी मत से विरोध है और न ही किसी सिद्धान्त से वैमनस्य। अपने तार्किक सिद्धान्तों और व्यावहारिक उपदेशों के कारण गीता भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में सम्मान और मान्यता प्राप्त कर चुकी है।

सन् 1785 में चार्ल्स विल्किन्स द्वारा गीता का पहला अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ। इसके बाद सन् 1982 तक गीता के 75 भाषाओं में लगभग 2,000 से अधिक अनुवाद प्रकाशित हो चुके थे। यही इसकी विश्वव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। भारतीय दर्शन और अध्यात्म से विश्व को परिचित कराने वाले इस महान ग्रन्थ का अध्ययन एवं अध्यापन आज ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड और कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले जैसे विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में भी किया जाता है।

गीता युवावस्था में न पढ़ पाने का आइंस्टाइन को था अफसोस

कलेवर की दृष्टि से गीता केवल 700 श्लोकों का ग्रन्थ है, किन्तु अपने विचारों की व्यापकता और प्रभाव की दृष्टि से यह किसी महाकाव्य से कम नहीं है। इसके प्रभाव का वर्णन अल्बर्ट आइंस्टाइन से बेहतर शायद ही कोई कर सके। उन्हें इस बात का अफसोस था कि वे अपने युवाकाल में इस महान ग्रन्थ से परिचित नहीं हो सके; यदि ऐसा होता तो उनके जीवन की दिशा कुछ और होती।

उनका प्रसिद्ध कथन है—

“जब मैं भगवद्गीता पढ़ता हूँ, तो इसके अतिरिक्त सब कुछ मुझे बहुत उथला प्रतीत होता है।”

गीता से गांधी को मिलती थी कठिन परिस्थितियों में मुस्कुराने की शक्ति

गीता एक नित्य और सनातन संदेश है, जिसकी प्रासंगिकता इतिहास के असंख्य उतार-चढ़ावों के बाद भी आज तक अक्षुण्ण बनी हुई है। जब भी कोई कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक या व्यावसायिक उलझनों में फँसता है, तब महात्मा गांधी की भाँति उसे भी गीता से ही मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

महात्मा गांधी कहा करते थे—

“जब कभी संदेह मुझे घेर लेते हैं और निराशा मेरे सामने आ खड़ी होती है, तब मैं गीता में आशा की एक किरण खोजता हूँ। उसमें मुझे ऐसा कोई न कोई श्लोक अवश्य मिल जाता है, जो मुझे सांत्वना देता है। तब मैं कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराने लगता हूँ।”

विदेशी लेखकों और विचारकों की रचनाएँ भी गीता से प्रेरित हैं

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग की यह अवधारणा कि मनुष्य की जड़ें आध्यात्मिक जगत में हैं, भगवद्गीता में वर्णित ऊर्ध्वमूल अश्वत्थ वृक्ष (उल्टे वृक्ष) की परिकल्पना से अत्यंत साम्य रखती है।

विश्वविख्यात साहित्यकार रुडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्ध कविता “If” को भी अनेक विद्वान गीता के विचारों से प्रेरित मानते हैं।

विश्वप्रसिद्ध संगीत समूह द बीटल्स (The Beatles) का गीत “I Me Mine” गीता के संदेश की झलक प्रस्तुत करता है। इस समूह के प्रसिद्ध गिटारवादक जॉर्ज हैरिसन नियमित रूप से भगवद्गीता का अध्ययन करते थे। उनकी इच्छा के अनुसार उनके निधन के बाद उनकी अस्थियों का विसर्जन हरिद्वार में किया गया।

हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म “The Legend of Bagger Vance” की कथा में भी अर्जुन और श्रीकृष्ण के संबंध की झलक दिखाई देती है। फिल्म में एक गोल्फ खिलाड़ी निराश होकर बैठ जाता है, तब उसका कैडी उसे उसी प्रकार प्रेरित करता है, जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन का मार्गदर्शन किया था।

विलियम शेक्सपियर के नाटक “As You Like It” के अनेक संवादों में भी गीता के विचारों की समानता दिखाई देती है। प्रसिद्ध संगीतकार और नाटककार फिलिप ग्लास का ओपेरा “Satyagraha” महात्मा गांधी और गीता की शिक्षाओं पर आधारित है।

प्रसिद्ध लेखक और पॉडकास्टर फिलिप गोल्डबर्ग ने विश्व की लगभग 300 महान हस्तियों के जीवन का अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि उनमें से अधिकांश किसी-न-किसी रूप में भगवद्गीता से प्रभावित और प्रेरित थे।

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