श्रीभगवानुवाच—
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ 16.1॥
कृष्ण कहते हैं— अन्तःकरण की शुद्धि। यही अन्तःकरण है जिसके साथ अनेक भ्रांतियाँ जुड़ी हुई हैं। समाज की पूरी धारणा अन्तःकरण पर निर्भर करती है। बचपन से ही हमें सिखा दिया जाता है कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं। इस बात को इतनी दृढ़ता से स्थापित किया जाता है, इतनी बार दोहराया जाता है कि वह संस्कारबद्ध धारणा बन जाती है, जिसे आज की भाषा में कंडीशनिंग (Conditioning) कहते हैं।
जीवन में जब भी हम इन धारणाओं के विपरीत जाने का प्रयास करते हैं, तो तुरंत अन्तःकरण विरोध में खड़ा हो जाता है। प्रत्येक समाज का अपना-अपना अन्तःकरण होता है। किन्तु यह वास्तविक अन्तःकरण नहीं है; यह सिखाया हुआ, संस्कारित और शिक्षित अन्तःकरण है। समाज ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए इसका उपयोग किया है। समाज की यह मान्यता रही है कि यदि व्यक्तियों को नियंत्रण में रखना है, तो उनके वास्तविक अन्तःकरण के जागने से पहले ही उनके भीतर अनेक धारणाएँ स्थापित कर दी जाएँ।
मनोविज्ञान के अनुसार, सात वर्ष की आयु तक हमारे मस्तिष्क का लगभग आधा विकास हो जाता है और यही हमारे जीवन का आधार बनता है। इसके बाद उन प्रारम्भिक धारणाओं के विपरीत जाना अत्यन्त कठिन हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करने का प्रयास करता है, तो वह दुविधा, संघर्ष और मानसिक कष्ट का अनुभव करता है।
इसी कारण अनेक तथाकथित धार्मिक सम्प्रदाय सात वर्ष की आयु से पहले ही बच्चों के मन में अपनी-अपनी धारणाएँ स्थापित करने के लिए उत्सुक रहते हैं। यदि ये धारणाएँ गहराई से बैठ जाएँ, तो वास्तविक अन्तःकरण की आवाज़ सुनाई ही नहीं पड़ती।
कृष्ण जब अन्तःकरण की शुद्धि की बात करते हैं, तो उनका आशय यही है कि समाज द्वारा आरोपित धारणाओं से जब तक मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक आपकी वास्तविक आत्मा बोल नहीं पाएगी। आपके भीतर का हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आस्तिक या नास्तिक बोल सकता है; किन्तु जो दैवी स्वर लेकर आप जन्मे हैं, वह प्रकट नहीं हो सकेगा। उसके प्रकटीकरण के लिए इन सभी आरोपित परतों का हटना आवश्यक है।
भगवान कृष्ण अर्जुन से ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि अर्जुन जो ज्ञान की बातें कर रहा है और जो प्रश्न पूछ रहा है, वे उसके शुद्ध अन्तःकरण की अभिव्यक्ति नहीं हैं; वे सामाजिक धारणाओं का परिणाम हैं। अर्जुन कह रहा है— “ये मेरे गुरु हैं। जिनके चरण मैंने छुए हैं, उनकी हत्या मैं कैसे करूँ?”
अर्जुन जिसे बुरा कह रहा है, कृष्ण उसे समझा रहे हैं कि यह तेरे वास्तविक अन्तःकरण की आवाज़ नहीं है। तुझे जो-जो बातें बचपन से बुरी बताई गई हैं, तू उन्हीं को बुरा मान रहा है। यह तेरी अपनी अनुभूति नहीं है, न तेरी अंतःप्रज्ञा है और न ही तेरा स्वानुभूत बोध। तेरे भीतर से समाज द्वारा आरोपित धारणाएँ बोल रही हैं। जब तक हम इन सामाजिक धारणाओं से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक शुद्ध अन्तःकरण का साक्षात्कार नहीं हो सकता।
अन्तःकरण की शुद्धि का अर्थ केवल एक अच्छे या भले व्यक्ति का अन्तःकरण नहीं है। इसका वास्तविक अभिप्राय है— ऐसा शुद्ध अन्तःकरण जिसमें किसी प्रकार का आरोपण न हो; जो खालिस हो, जैसा जन्म के समय था।
इसका यह अर्थ भी नहीं है कि शुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति समाज का विरोधी बन जाए, सभी मान्यताओं को तोड़ दे या उच्छृंखल हो जाए। शुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति अपने अन्तःकरण को उस स्थिति तक ले जाता है जहाँ वह दर्पण की भाँति निर्मल हो— वैसा ही जैसा वह जन्म के समय था, जब समाज ने उस पर कोई लेखन नहीं किया था; जब वह पूर्णतः रिक्त, निष्कलुष और शून्य था।
ऐसे शुद्ध अन्तःकरण के माध्यम से ही दैवी सम्पदा का साक्षात्कार किया जा सकता है। उसी के माध्यम से दिव्यता की खोज संभव है, क्योंकि उस निर्मल अन्तःकरण से जो स्वर उठते हैं, वे स्वयं दिव्यता के स्वर होते हैं।
