भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय के 25वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।। (5.25)
अर्थात् जिन महापुरुषों के पाप नष्ट हो चुके हैं, जिनके सभी संशय समाप्त हो गए हैं, जिनका मन पूर्णतः संयमित है और जो समस्त प्राणियों के कल्याण में निरंतर लगे रहते हैं, वे ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् परमात्मा की प्राप्ति कर संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
इसी सत्य को समझाने वाली एक प्रसिद्ध कथा है।
एक दिन भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन वार्तालाप करते हुए महल से दूर निकल गए। मार्ग में उन्होंने एक निर्धन ब्राह्मण को भिक्षा माँगते हुए देखा। उसकी दयनीय अवस्था देखकर अर्जुन का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने उस ब्राह्मण को स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक थैली दे दी। ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न होकर अपने घर की ओर चल पड़ा।
रास्ते में जंगल से गुजरते समय एक चोर ने उसकी थैली लूट ली। ब्राह्मण अत्यंत दुःखी हो गया। अपने दुर्भाग्य को कोसते हुए वह अगले दिन पुनः भिक्षा माँगने उसी स्थान पर आ गया।
अगले दिन जब श्रीकृष्ण और अर्जुन वहाँ से गुजरे तो उन्होंने उसे फिर भिक्षा माँगते देखा। कारण पूछने पर ब्राह्मण ने पूरी घटना सुना दी। अर्जुन को उस पर फिर दया आ गई। इस बार उन्होंने उसे एक बहुमूल्य हीरा दे दिया।
ब्राह्मण घर पहुँचा और उस हीरे को सुरक्षित रखने के लिए एक पुराने घड़े में छिपा दिया, जिसका उपयोग घर में नहीं होता था।
अगली सुबह ब्राह्मण के जागने से पहले उसकी पत्नी नदी से पानी भरने गई। लौटते समय उसका घड़ा टूट गया। उसे याद आया कि घर में एक पुराना घड़ा रखा है। वह उसे लेकर पुनः नदी पर गई। जैसे ही उसने घड़ा पानी में डुबोया, उसके भीतर रखा हीरा निकलकर नदी में बह गया। उसे इसका कोई पता नहीं चला।
घर लौटने पर उसने देखा कि ब्राह्मण पूरे घर में कुछ खोज रहा है। जब ब्राह्मण ने अपनी पत्नी के हाथ में वही घड़ा देखा, तो वह समझ गया कि क्या हुआ होगा। वह अत्यंत निराश हो गया और अगले दिन फिर उसी स्थान पर भिक्षा माँगने पहुँच गया।
संयोगवश उसी समय श्रीकृष्ण और अर्जुन पुनः वहाँ से लौट रहे थे। उन्होंने ब्राह्मण को फिर भिक्षा माँगते देखा। उसकी पूरी कहानी सुनकर अर्जुन ने निराश होकर कहा, “प्रभु! लगता है इस व्यक्ति के भाग्य में सुख-समृद्धि है ही नहीं। अब मैं इसकी कोई सहायता नहीं कर सकता।”
श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने बिना कुछ कहे ब्राह्मण को केवल दो पैसे दिए।
ब्राह्मण उन दो पैसों को लेकर घर की ओर चल पड़ा। उसके जाने के बाद अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा, “प्रभु! जब मेरे दिए हुए स्वर्ण और हीरे से इसका कोई भला नहीं हुआ, तो आपके दिए दो पैसों से क्या होगा?”
श्रीकृष्ण मुस्कराकर बोले, “देखते हैं।”
रास्ते में ब्राह्मण ने एक मछुआरे को देखा, जिसने एक बड़ी मछली पकड़ रखी थी। मछली तड़प रही थी और छूटने का प्रयास कर रही थी। ब्राह्मण के मन में उसके प्रति करुणा जागी। उसने सोचा, “इन दो पैसों से मेरा तो कोई विशेष लाभ होने वाला नहीं है। क्यों न इससे इस मछली के प्राण बचा लिए जाएँ?”
उसने वे दो पैसे देकर मछली खरीद ली और उसे नदी में छोड़ने लगा। तभी उसने देखा कि मछली के मुँह में कोई कठोर वस्तु फँसी हुई है, जिसके कारण उसे साँस लेने में कठिनाई हो रही थी। उसने सावधानी से वह वस्तु बाहर निकाली। आश्चर्य! वह वही हीरा था जो अर्जुन ने उसे दिया था।
हीरा पाकर वह आनंद से चिल्लाने लगा, “मिल गया! मिल गया!”
उसी समय पास से वही चोर गुजर रहा था, जिसने उसकी स्वर्ण मुद्राएँ चुराई थीं। ब्राह्मण की आवाज सुनकर वह घबरा गया। उसे लगा कि ब्राह्मण ने उसे पहचान लिया है और अब उसे पकड़वा देगा। भयभीत होकर वह स्वयं ब्राह्मण के पास आया, उसके चरणों में गिर पड़ा और बोला, “भाई! मुझे क्षमा कर दो। ये लो तुम्हारी सारी स्वर्ण मुद्राएँ। बस मुझे दंड मत दिलवाना। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई।”
ब्राह्मण ने उसे क्षमा कर दिया, अपनी स्वर्ण मुद्राएँ वापस ले लीं और प्रसन्नतापूर्वक घर लौट गया।
अगले दिन वह सीधे अर्जुन के पास पहुँचा और पूरी घटना सुनाकर उनका धन्यवाद किया। उसके चले जाने के बाद अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “प्रभु! यह कैसा चमत्कार है? मेरे दिए स्वर्ण और हीरे उसकी सहायता नहीं कर सके, पर आपके दिए दो पैसों ने उसका जीवन बदल दिया। इसका रहस्य क्या है?”
श्रीकृष्ण बोले, “अर्जुन! यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि सृष्टि का शाश्वत नियम है। जब उसके पास स्वर्ण मुद्राएँ और हीरा था, तब वह केवल अपने हित और अपनी आवश्यकताओं के बारे में सोच रहा था। परंतु जब उसके पास केवल दो पैसे थे, तब भी उसने उन्हें एक असहाय प्राणी के प्राण बचाने में खर्च कर दिया। उसी क्षण उसने अपने सुख से पहले दूसरे प्राणी के कल्याण को महत्व दिया। तब उसके जीवन की जिम्मेदारी मैंने स्वयं ले ली।”
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं कि सत्य यही है—जब हम किसी दूसरे के दुःख से द्रवित होते हैं, किसी और की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता से पहले रखते हैं और उनके कष्ट दूर करने का प्रयास करते हैं, तब हम वास्तव में भगवान के कार्य में सहभागी बनते हैं। ऐसे व्यक्ति को अपने भविष्य की चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि उसके योग और क्षेम का भार स्वयं भगवान उठा लेते हैं।
