मातृ-आश्वासन प्रदान करते हैं कृष्ण।

एक माँ अपने नवजात, असहाय शिशु को त्यागने के बारे में कभी नहीं सोचती, क्योंकि वह पूर्णतः उसी पर निर्भर होता है। इसी प्रकार आत्मा की सर्वोच्च एवं शाश्वत माता परमेश्वर हैं। भगवद्गीता में भगवान उन आत्माओं को मातृ-सुलभ आश्वासन प्रदान करते हैं, जो विशेष रूप से उनके प्रति समर्पित रहती हैं।

गीता (9.22) में भगवान कहते हैं—

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

यहाँ प्रयुक्त शब्द “योगक्षेमं वहाम्यहम्” का अर्थ है—”मैं स्वयं अपने भक्तों के योग और क्षेम का भार उठाता हूँ।” अर्थात् मैं व्यक्तिगत रूप से उनके पालन-पोषण, संरक्षण और कल्याण की जिम्मेदारी लेता हूँ, ठीक वैसे ही जैसे एक गृहस्थ अपने परिवार का पालन-पोषण करता है।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं कि इस श्लोक में परमेश्वर दो महान वचन देते हैं। पहला है योग—वे अपने भक्तों को वह आध्यात्मिक संपदा प्रदान करते हैं जो उनके पास नहीं है। दूसरा है क्षेम—वे उनके पास विद्यमान आध्यात्मिक संपदा की रक्षा करते हैं। किंतु इसके लिए एक अनिवार्य शर्त है—अनन्य समर्पण।

इसे पुनः माँ और शिशु के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक नवजात शिशु पूर्णतः अपनी माँ पर निर्भर रहता है। माँ उसके भोजन, सुरक्षा और पालन-पोषण का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व स्वयं उठाती है। परन्तु जैसे-जैसे वही बालक बड़ा होकर अपनी जिम्मेदारियाँ स्वयं निभाने लगता है, माँ भी धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियाँ कम करती जाती है।

ईश्वर का नियम भी कुछ ऐसा ही है। जब हम अपनी स्वतंत्र इच्छा से कार्य करते हुए स्वयं को ही सब कुछ करने वाला मानते हैं और केवल अपनी शक्ति एवं बुद्धि पर निर्भर रहते हैं, तब भगवान केवल हमारे कर्मों को देखते हैं और उनके अनुरूप फल प्रदान करते हैं। जब हमारा समर्पण आंशिक होता है और हम आंशिक रूप से भौतिक साधनों पर निर्भर रहते हैं, तब भगवान की कृपा भी उसी अनुपात में प्राप्त होती है। किन्तु जब हम सम्पूर्ण रूप से स्वयं को उनके चरणों में समर्पित कर देते हैं, तब भगवान हमारे जीवन का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व अपने हाथों में ले लेते हैं। वे हमारे पास जो है उसकी रक्षा करते हैं और जिसकी कमी है, उसे स्वयं पूर्ण करते हैं।

इसी संदर्भ में दक्षिण भारत की एक प्रसिद्ध सत्यकथा का उल्लेख किया जाता है।

अर्जुनाचार्य और उनकी पत्नी अत्यंत सरल, विनम्र एवं भगवान के अनन्य भक्त थे। वे एक छोटी-सी झोपड़ी में रहते थे। प्रतिदिन प्रातःकाल अध्ययन और लेखन के पश्चात अर्जुनाचार्य भिक्षा के लिए गाँव जाते थे। उनका नियम था कि वे केवल तीन घरों में ही भिक्षा माँगेंगे और उतनी ही भिक्षा स्वीकार करेंगे, जिससे पति-पत्नी का निर्वाह हो सके। शेष समय वे भगवद्गीता पर भाष्य लिखने तथा उसके अध्ययन-मनन में बिताते थे।

एक दिन वे अपने लेखन में इतने तल्लीन हो गए कि भिक्षा लेने गाँव जाना ही भूल गए। जब दोपहर बाद उन्हें ध्यान आया और वे गाँव पहुँचे, तब तक अधिकांश घरों में भोजन समाप्त हो चुका था। इसलिए उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा।

घर लौटकर वे पुनः भगवद्गीता के अध्ययन में बैठ गए। जब वे नवम अध्याय के 22वें श्लोक पर पहुँचे—

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

तो वे अंतिम शब्द “वहाम्यहम्” पर विचार करने लगे। उन्हें लगा कि भगवान कैसे कह सकते हैं—”मैं स्वयं भार उठाता हूँ?” उनके मन में संदेह उत्पन्न हो गया। क्रोधवश उन्होंने “योगक्षेमं वहाम्यहम्” वाले शब्दों पर अपनी लेखनी से खरोंच लगा दी और स्नान के लिए नदी पर चले गए।

उसी समय दो अत्यंत सुंदर बालक उनके घर पहुँचे। उनके सिर पर चावल, फल, सब्जियाँ, मक्खन और अन्य खाद्य सामग्री से भरी टोकरियाँ थीं। उन्होंने सारी सामग्री अर्जुनाचार्य की पत्नी को सौंपते हुए कहा, “गुरुदेव ने हमें यह सब आपके लिए पहुँचाने को भेजा है।”

उनकी दिव्य आभा देखकर अर्जुनाचार्य की पत्नी चकित रह गई। जब वे लौटने लगे तो उसने देखा कि उनकी पीठ पर चोट के गहरे निशान थे। उसने करुणा से पूछा, “हे सुंदर बालकों! तुम्हें यह चोट किसने पहुँचाई?”

उन्होंने उत्तर दिया, “आपके पति हमसे बहुत काम करवाते हैं। यदि हम उनकी बात न मानें तो वे हमें मारते भी हैं।”

यह सुनकर वह स्तब्ध रह गई। उसे विश्वास तो नहीं हुआ, किन्तु उन बालकों पर दया आ गई। उसने प्रेमपूर्वक उनकी पीठ पर चंदन का लेप लगाया। इसके बाद दोनों बालक वहाँ से चले गए।

जब अर्जुनाचार्य घर लौटे तो उनकी पत्नी उनसे अत्यंत नाराज़ थी। वह उनसे बात तक नहीं करना चाहती थी।

अर्जुनाचार्य ने पूछा, “तुम मुझसे क्यों रुष्ट हो? क्या मैंने कोई गलती की है?”

पत्नी ने कहा, “आप छोटे-छोटे बच्चों को मारते हैं!”

जब उसने पूरी घटना सुनाई, तब अर्जुनाचार्य को तत्काल समझ में आ गया कि वे दोनों बालक स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और बलराम थे।

वे तुरंत उस स्थान पर पहुँचे जहाँ उनकी भगवद्गीता रखी थी। उन्होंने देखा कि जिन शब्दों पर उन्होंने खरोंच लगाई थी, वे सभी निशान अदृश्य हो चुके थे।

यह देखकर उनकी आँखों से आँसू बह निकले। वे भगवान के चरणों में मन ही मन गिर पड़े और बोले—

योगक्षेमं वहाम्यहम्—यह पूर्णतः सत्य है। हे प्रभु! आप अपने भक्तों का भार स्वयं उठाते हैं। मेरे संदेह के लिए मुझे क्षमा करें।”

उनकी पत्नी भी यह सोचकर अत्यंत दुःखी हुई कि प्रत्यक्ष दर्शन होने पर भी वह भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को पहचान न सकी। किन्तु अर्जुनाचार्य अत्यंत आनंदित थे कि उनकी पत्नी को भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन हुए।

उन्होंने अपनी पत्नी को सांत्वना देते हुए कहा, “आज मुझे यह अनुभव हो गया है कि भगवान श्रीकृष्ण और भगवद्गीता में कोई भेद नहीं है। मैंने गीता के शब्दों पर खरोंच लगाई थी, पर वास्तव में मैं भगवान के ही वचनों और उनके स्वरूप का अनादर कर रहा था। भगवान सदैव सत्य हैं। वे अपने भक्तों का व्यक्तिगत रूप से ध्यान रखते हैं। उनके पास जो है उसकी रक्षा करते हैं और जिसकी कमी होती है, उसे स्वयं पूर्ण करते हैं। यही ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ का वास्तविक अर्थ है।”

1 thought on “मातृ-आश्वासन प्रदान करते हैं कृष्ण।”

  1. Mamta Aggarwal

    जय श्री कृष्ण जी,

    अत्यंद सुंदर भाव गीता जी के योग के साथ आपने जो मातृत्व का भाव जोड़ा- सच में अदभुद आपका लिखा हुआ हर शब्द हमेशा ऊर्जावान, सुखद , और सहज भाव से समझने योग्य होता है,, आपके लेखनी कमाल की है,,, हमें आप पर गर्व है !! आप गुरु कृपा से ये सुंदर सेवा प्रदान करते रहें,,, जिससे कि हम जैसे अज्ञान जीवों को गीता प्रकाश मिलता रहे

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