गीता जयंती पर एक मिनट, एक साथ गीता पाठ का आह्वान।

कल सायंकाल विज्ञान भवन में आयोजित एक अद्वितीय कार्यक्रम “गीता जीवन गीत” सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम जीओ गीता द्वारा पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के सान्निध्य में आयोजित किया गया। इस भव्य, प्रेरणादायी एवं ऐतिहासिक कार्यक्रम में गीता मनीषी पूज्य स्वामी ज्ञानानन्द जी, पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य स्वामी परमात्मानन्द जी, डॉ. सुभाष चंद्रा, के.के. खंडेलवाल, कार्तिकेय शर्मा, सुरेश चव्हाणके, रमेश जुनेजा सहित उद्योग, शिक्षा, न्याय, मीडिया एवं सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उपस्थित रहे।

विश्व हिन्दू परिषद के कार्याध्यक्ष आलोक कुमार जी, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रमेश मोदी जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संपर्क प्रमुख श्रीकृष्ण सिंघल जी, माननीय प्रांत संघचालक पवन जिंदल जी तथा देशभर से आए लगभग 1350 से अधिक चयनित प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम में सहभागिता कर पूज्य संतों एवं विद्वानों के मार्गदर्शन का लाभ प्राप्त किया।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी ने इस अवसर पर आह्वान किया कि 23 दिसंबर 2023 को गीता जयंती के अवसर पर “एक मिनट, एक साथ, गीता पाठ” का आयोजन देश के सभी शिक्षण संस्थानों, कार्यालयों, जेलों, घरों तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर किया जाए। उपस्थित सभी लोगों ने इस संकल्प को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि मानव जीवन और विश्व की लगभग सभी समस्याओं का समाधान श्रीमद्भगवद्गीता में निहित है।

कार्यक्रम का स्वागत भाषण महासचिव प्रदीप मित्तल ने प्रस्तुत किया।

डॉ. मारकंडे आहूजा ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान सर्वोच्च है। गीता मनीषी के अंतरमन में गीता के श्लोक वीणा की मधुर झंकार की भाँति निरंतर गूँजते रहते हैं। उनके कथा-प्रवचनों तथा घर-घर तक पहुँचने वाले जीवनोपयोगी संदेशों में गीता का प्रकाश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आज शायद ही कोई ऐसा स्थान बचा हो जहाँ जीओ गीता का प्रभाव न पहुँचा हो। भारतभूमि तो उनके सत्संग और स्पर्श से धन्य हो गई है।

पूज्य स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने कहा कि गीता समस्त प्रकार की समस्याओं का समाधान देने वाली और सभी दुःखों का निवारण करने वाली कामधेनु के समान है। उन्होंने संत विनोबा भावे का स्मरण करते हुए कहा— “हर कष्ट और हर दुःख के लिए ‘गीताई’ की शरण में जाओ।” महात्मा गांधी भी कहा करते थे— “जब मुझे समस्याएँ घेर लेती हैं, तब मैं गीता माता की गोद में चला जाता हूँ, जहाँ मुझे हर समस्या का समाधान मिल जाता है।” उन्होंने कहा कि गीता केवल हिन्दुओं की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की माता है, जो अपनी शरण में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का मार्गदर्शन करती है।

पूज्य स्वामी परमात्मानन्द जी ने कहा कि गीता धर्म और अध्यात्म को समझाने वाला अमूल्य काव्य है। यदि समस्त शास्त्रों का सार एक स्थान पर उपलब्ध है, तो वह श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता रूपी ज्ञान-गंगोत्री में स्नान करके अज्ञानी ज्ञान प्राप्त करता है और पापी अपने पाप एवं संताप से मुक्त होकर जीवन-सागर को पार कर जाता है।

पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी ने राष्ट्र-निर्माण के कार्य में तन-मन से जुटने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि किसी भी समस्या का समाधान न केवल वाम (Left) में है और न ही दक्षिण (Right) में, बल्कि समाधान स्वयं उसी समस्या के भीतर छिपा होता है। आवश्यकता है कि हम साहसपूर्वक संघर्ष करें और विजय प्राप्त करें।

उन्होंने कहा कि गीता को “माता” कहा गया है, क्योंकि जिस प्रकार माता अपने बच्चों को प्रेमपूर्वक संस्कारित कर उन्हें महानता के पथ पर अग्रसर करती है, उसी प्रकार गीता भी अपने अनुयायियों को शांति, विवेक और जीवन का सही मार्ग प्रदान करती है। यह मनुष्य को सदाचार का पाठ पढ़ाती है तथा नर से नारायण बनने की प्रेरणा देती है। गीता का निरंतर अध्ययन और मनन मनुष्य को ऐसे आध्यात्मिक लोक में पहुँचा देता है, जहाँ उसे दिव्य ज्ञान, आत्मिक शांति और अनंत आनंद की अनुभूति होती है।

इसी भाव को शास्त्रों में कहा गया है—

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥

अर्थात् जब स्वयं भगवान पद्मनाभ के श्रीमुख से निकली हुई श्रीमद्भगवद्गीता उपलब्ध है, तब अन्य शास्त्रों के विस्तार की क्या आवश्यकता?

गीता का जितना अधिक स्वाध्याय किया जाता है, उतने ही जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाले नए-नए सूत्र प्राप्त होते हैं। मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए जितने भी जीवन-मूल्य आवश्यक हैं, वे सभी गीता में समाहित हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने उपनिषद् रूपी गौओं से ज्ञानरूपी अमृत का दोहन कर मानवता को गीतामृत प्रदान किया है—

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥

भगवान श्रीकृष्ण और गीता, ज्ञान और उसके प्रदाता—दो अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो रूप हैं। इसलिए गीता किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की धरोहर है। यह धर्म का मार्ग प्रशस्त करती है, मनुष्य को सही चिंतन प्रदान करती है और श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को श्रीमद्भगवद्गीता को केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारकर जीना चाहिए।

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