मुश्किलों में मुस्कुराना सीखें भगवान श्रीकृष्ण से
गीता के द्वितीय अध्याय के नौवें श्लोक में संजय कहते हैं—
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥ (गीता 2.9)
अर्थ:
हे राजन्! निद्रा को जीतने वाले परंतप अर्जुन ने अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण से यह कहकर कि— “हे गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा।” — मौन धारण कर लिया।
इसके उपरांत संजय कहते हैं—
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥ (गीता 2.10)
अर्थ:
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओं के मध्य शोक से व्याकुल अर्जुन से भगवान हृषीकेश मानो मुस्कराते हुए ये वचन कहने लगे।
अर्जुन उस समय गहरे संशय और अनिर्णय की स्थिति में था। एक ओर वह स्वयं स्वीकार करता है कि उसका मन मोह और अज्ञान से आच्छादित है तथा वह श्रीकृष्ण से ज्ञान की याचना करता है, वहीं दूसरी ओर वह दृढ़ स्वर में घोषणा भी कर देता है— “मैं युद्ध नहीं करूँगा।”
यह मनुष्य के मनोविज्ञान का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण है। जब व्यक्ति भीतर से अस्थिर और अनिश्चित होता है, तब वह बाहर से सबसे अधिक दृढ़ दिखाई देने का प्रयास करता है। अक्सर जितना बड़ा दावा होता है, भीतर उतनी ही गहरी शंका छिपी होती है।
कोई व्यक्ति बार-बार कहे— “मैं दृढ़ निश्चयी हूँ”—तो संभव है कि उसके भीतर निश्चय का अभाव हो। यदि कोई बार-बार कहे— “मुझे ईश्वर पर पूर्ण विश्वास है”—तो यह भी संभव है कि भीतर कहीं न कहीं संदेह विद्यमान हो। इसी प्रकार जो व्यक्ति निरंतर कहता रहे— “मैं केवल सत्य ही बोलता हूँ,” उसके भीतर असत्य का भय भी छिपा हो सकता है।
मनुष्य प्रायः अपने भीतर के डांवाडोल मन को बाहरी दृढ़ वक्तव्यों से ढकने का प्रयास करता है। अर्जुन भी उसी मनःस्थिति में है। वह श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन भी चाहता है और साथ ही अपना अंतिम निर्णय भी स्वयं सुना देता है कि वह युद्ध नहीं करेगा। यदि निर्णय हो ही चुका था, तो फिर श्रीकृष्ण से प्रश्न करने की आवश्यकता क्या थी?
यहीं गीता का एक अत्यंत रोचक प्रसंग सामने आता है। संजय कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण “प्रहसन्निव”—अर्थात् मुस्कराते हुए—अर्जुन से बोले। प्रश्न उठता है कि इस विकट परिस्थिति में मुस्कुराने का कारण क्या था?
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के आत्म-प्रवंचना (Self-deception) पर मुस्कुरा रहे थे। वे देख रहे थे कि जो व्यक्ति भीतर से पूर्णतः अनिश्चित है, वही बाहर से अंतिम निर्णय की घोषणा कर रहा है। अर्जुन स्वयं अपने मन के अंतर्विरोधों से जूझ रहा था। एक ओर वह ज्ञान चाहता है, दूसरी ओर बिना ज्ञान प्राप्त किए ही निष्कर्ष सुना देता है। यही उसके व्यक्तित्व का द्वंद्व था।
श्रीकृष्ण की मुस्कान उपहास नहीं, बल्कि करुणा और गहन मनोवैज्ञानिक समझ का प्रतीक है। वे जानते थे कि अर्जुन का यह निर्णय उसके वास्तविक स्वरूप का नहीं, बल्कि उसके क्षणिक मोह और विषाद का परिणाम है। इसलिए वे उसे डाँटते नहीं, बल्कि मुस्कराकर ज्ञान का अमृत प्रदान करना आरंभ करते हैं।
यही प्रसंग हमें जीवन का एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मन यदि संतुलित और प्रसन्न रहे तो सही निर्णय लेना संभव हो जाता है। श्रीकृष्ण हमें सिखाते हैं कि संकट के समय घबराना नहीं, बल्कि धैर्य, विवेक और मुस्कान के साथ उसका सामना करना चाहिए।
इसी भावना को ये पंक्तियाँ सुंदर ढंग से व्यक्त करती हैं—
मुश्किलों में न घबराना चाहिए,
ऐसे समय स्वयं को आज़माना चाहिए।
सीख लें बाँसुरी की ज़िंदगी से—
लाख ग़म हों सीने में, फिर भी मुस्कुराना चाहिए।
