अर्जुन के चित्त की दशा हम सबके चित्त की दशा है।

द्वंद्वात्मक स्थिति से उबारने का शास्त्र है गीता

यदि मन एकाग्र हो, तो संकल्प संगठित और शक्तिशाली बन जाता है। किंतु जब मन दुविधा और द्वंद्व में फँस जाता है, संशय से घिर जाता है, तब संकल्प दुर्बल पड़ जाता है। हम सभी प्रतिदिन ऐसे प्रश्नों से जूझते हैं—क्या करूँ, क्या न करूँ? क्या उचित है, क्या अनुचित? धन कमाऊँ या संस्कार अर्जित करूँ? फ़िल्म देखूँ या पढ़ाई करूँ? घर का भोजन करूँ या बाहर खाऊँ? जीवन की ऐसी अनेक द्वंद्वात्मक स्थितियाँ हमारे सामने आती रहती हैं।

महाभारत में भी अर्जुन ठीक ऐसी ही स्थिति में खड़े हैं। वे निर्णय और अनिर्णय के बीच त्रिशंकु की भाँति लटके हुए हैं। वास्तव में यह केवल अर्जुन की नहीं, प्रत्येक मनुष्य की स्थिति है।

दुनिया के अनेक ग्रंथों में अद्भुत सत्य निहित हैं, किंतु गीता इसलिए विशिष्ट है कि वह केवल धर्मशास्त्र नहीं, बल्कि गहन मनोविज्ञान का भी ग्रंथ है। उसमें केवल यह घोषणा नहीं है कि ईश्वर है या आत्मा है; न ही वह मात्र दार्शनिक तर्कों का संग्रह है। गीता मनुष्य के मन, उसकी दुविधाओं, उसके संघर्षों और उसके समाधान का विज्ञान प्रस्तुत करती है। इसी कारण इसे मानव सभ्यता के प्रथम मनोवैज्ञानिक ग्रंथों में गिना जा सकता है। इसलिए गीता का मूल्य अद्वितीय है; वह अमूल्य और दिव्य है।

इस दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण मनोविज्ञान के आद्य प्रवर्तक प्रतीत होते हैं। वे ऐसे प्रथम शिक्षक हैं, जिन्होंने दुविधाग्रस्त चित्त, संघर्षरत मन और खंडित संकल्प को पुनः अखंड बनाने का प्रयास किया। उन्होंने केवल मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) ही नहीं किया, बल्कि मनोसंश्लेषण (Psychosynthesis) का भी मार्ग दिखाया। वे केवल मन के विखंडन का विश्लेषण नहीं करते, बल्कि यह भी बताते हैं कि मन पुनः एकाग्र, संतुलित और अखंड कैसे बने। इसीलिए गीता व्यक्तित्व (Personality) नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की वास्तविकता (Individuality) के विकास का शास्त्र है।

आज पूरी दुनिया पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के पीछे भाग रही है, जबकि पर्सनैलिटी केवल एक मुखौटा है। श्रीकृष्ण ने हजारों वर्ष पहले मुखौटे नहीं, बल्कि मनुष्य की वास्तविक सत्ता की बात कही थी।

अर्जुन के चित्त की दशा हम सबके चित्त की दशा है। अंतर केवल इतना है कि हमारे जीवन के संकट धीरे-धीरे आते हैं, इसलिए हम उनसे समझौता करते रहते हैं। अर्जुन का संकट अत्यंत तीव्र, सघन और नाटकीय था; इसलिए उसके सामने परिवर्तन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा था।

इसी संदर्भ में एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक प्रयोग का उल्लेख किया जाता है। एक मनोवैज्ञानिक ने उबलते हुए पानी से भरी बाल्टी में एक मेंढक डाल दिया। मेंढक तत्काल छलाँग लगाकर बाहर निकल आया। फिर उसी मेंढक को सामान्य तापमान वाले पानी में रखा गया और पानी को धीरे-धीरे गर्म किया गया। मेंढक तापमान के साथ स्वयं को अनुकूलित करता गया। अंततः जब पानी उबलने लगा, तब तक वह इतना अभ्यस्त हो चुका था कि छलाँग भी नहीं लगा सका और उसी में मर गया।

हमारा जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हम धीरे-धीरे बढ़ते संकटों के साथ समझौता करते जाते हैं। मृत्यु निकट आती रहती है, समय निकलता रहता है और हम अनुकूलन करते रहते हैं। परिणामस्वरूप जीवन में क्रांति नहीं आ पाती।

अर्जुन की स्थिति इससे भिन्न थी। वे सीधे उबलते हुए जल में खड़े थे। परिस्थिति इतनी विकट थी कि उन्हें कुछ न कुछ निर्णय लेना ही था। या तो वे युद्ध से भाग जाते, जैसा कि बहुत लोग जीवन के संघर्षों से भाग जाते हैं, अथवा सत्य का सामना करते।

ऐसे ही निर्णायक क्षण में उन्हें श्रीकृष्ण मिले। कृष्ण ने कहा—“रुको, भागो मत।” क्योंकि जो जीवन के संघर्षों से भागता है, वह परमात्मा तक नहीं पहुँच सकता। जो जीवन का ही साक्षात्कार नहीं कर सकता, वह परम सत्य का साक्षात्कार कैसे करेगा? जीवन ही उस विराट सत्य तक पहुँचने की तैयारी है। प्रत्येक क्षण, प्रत्येक संघर्ष उसी दिशा में एक कदम है।

अर्जुन जीवन के एक कठिन प्रसंग से ही विचलित हो गए थे। यदि कृष्ण उन्हें भाग जाने की अनुमति दे देते, तो संभव था कि वे उसी क्षण वन की ओर चल पड़ते। किंतु यह पलायन स्थायी समाधान नहीं होता। कुछ समय बाद वही अर्जुन, वही स्वभाव, वही संघर्ष पुनः उनके सामने उपस्थित हो जाता। क्योंकि मनुष्य संसार से तो भाग सकता है, अपने आप से नहीं।

यदि अर्जुन वन में भी चले जाते, तो उनका स्वभाव उनका पीछा नहीं छोड़ता। अवसर मिलने पर वे पुनः धनुष-बाण बना लेते, शिकार करने लगते। समस्या बाहर नहीं, भीतर थी। इसलिए उसका समाधान भी भीतर ही संभव था।

इसी कारण गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं—

“संन्यास संसार से भागने का नाम नहीं है; संसार को पार कर जाने का नाम है। संन्यास संसार का विरोध नहीं, बल्कि संसार की संपूर्ण समझ, साधना और संघर्ष का फल है।”

अर्जुन वस्तुतः पलायन की मनःस्थिति में पहुँच चुके थे। संपूर्ण भगवद्गीता उनके इसी मानसिक जड़त्व को दूर करने का प्रयास है। श्रीकृष्ण उन्हें पुनः संकल्पवान, आत्मवान और स्थितप्रज्ञ बनाना चाहते हैं। वे उन्हें विचारहीनता की ओर नहीं, बल्कि विचार से आगे की निर्विचार अवस्था की ओर ले जाते हैं। वे उन्हें पशुता से मनुष्यता, मनुष्यता से निजता और अंततः निजता से भगवत्ता की ओर अग्रसर करते हैं।

यही कारण है कि गीता केवल युद्धभूमि का संवाद नहीं, बल्कि मानव-मन के द्वंद्व को समाप्त कर उसे अखंड बनाने का शाश्वत विज्ञान है।

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