भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा है दीपावली का त्योहार

 

भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा है दीपावली का त्योहार

दीपावली से एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर-वध, दीपावली के दिन श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन तथा दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा—ये तीनों पर्व भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।

भारतीय त्योहारों के साथ अनेक राक्षसों और असुरों के वध की कथाएँ जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि में माँ दुर्गा महिषासुर का वध करती हैं, दशहरे पर भगवान श्रीराम रावण का संहार करते हैं, जबकि दीपावली पर्व के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर-वध का स्मरण किया जाता है। इसी घटना की स्मृति में दीपावली से एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।

नरकासुर-वध का यह पर्व विशेष रूप से भारत के पश्चिमी तटीय राज्यों, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक तथा गोवा में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। गोवा में इस अवसर पर नरकासुर के विशाल पुतलों का दहन किया जाता है, जो अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नरकासुर कोई साधारण असुर नहीं था। उसे भगवान विष्णु के वराह अवतार तथा भूदेवी का पुत्र माना गया है। अत्यधिक शक्ति प्राप्त होने के बाद उसने देवताओं, ऋषियों और संतों को अत्यंत कष्ट पहुँचाया तथा महिलाओं पर भी अनेक अत्याचार किए। उसने लगभग 16 हजार राजकुमारियों एवं स्त्रियों को बंदी बनाकर अपने कारागार में कैद कर लिया था।

कथा के अनुसार, हिरण्याक्ष नामक असुर पृथ्वी (भूदेवी) को समुद्र के गर्भ में ले गया था। तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया और भूदेवी को उसकी पकड़ से मुक्त कराकर पुनः पृथ्वी पर स्थापित किया।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि वराह और भूदेवी के दिव्य संयोग से नरकासुर का जन्म हुआ। कहा जाता है कि जब भगवान वराह भूदेवी को समुद्र से ऊपर ला रहे थे, तब उनके स्पर्श से पर्वतों, घाटियों तथा पृथ्वी की विविध प्राकृतिक संरचनाओं की उत्पत्ति हुई। इसी दिव्य प्रसंग से नरकासुर के जन्म का भी उल्लेख मिलता है।

भारतीय परंपरा में असुरों से संबंधित कथाओं का एक प्रतीकात्मक अर्थ भी माना गया है। असुरों के गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या थी, जिसके द्वारा वे मृत असुरों को पुनर्जीवित कर देते थे। कुछ विद्वान इसे कृषि-चक्र का प्रतीक मानते हैं। जिस प्रकार फसल कटने के बाद अगले वर्ष पुनः उग आती है, उसी प्रकार असुरों का पुनर्जीवन भी प्रकृति के अनवरत चक्र का द्योतक माना गया है। संभवतः इसी कारण प्राचीन भारतीय मनीषियों ने अन्न और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना व्यक्त करने के लिए इन कथाओं का सांकेतिक प्रयोग किया।

कृष्ण-लीला में नरकासुर की कथा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। नरकासुर को ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसका वध किसी सामान्य देवता द्वारा संभव नहीं था। उसके अत्याचारों से पीड़ित देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से रक्षा की प्रार्थना की। धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का संहार करने का निश्चय किया।

गरुड़ पर आरूढ़ होकर भगवान श्रीकृष्ण युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करते हैं। नरकासुर भी अत्यंत पराक्रमी था और युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार था। उसे एक ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु तभी संभव होगी, जब उसकी अपनी माता उसके विनाश का कारण बने।

भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर के बीच भीषण युद्ध हुआ। हरिवंश तथा दक्षिण भारत की अनेक परंपराओं में वर्णित इस कथा के अनुसार युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा भी उनके साथ गरुड़ पर सवार होकर युद्धभूमि में पहुँचीं। आंध्र प्रदेश की परंपराओं में यह प्रसंग विशेष रूप से लोकप्रिय है। वहाँ वृंदावन की राधा-कृष्ण लीलाओं की अपेक्षा द्वारका के श्रीकृष्ण, रुक्मिणी और सत्यभामा से जुड़े प्रसंगों को अधिक महत्व दिया जाता है।

युद्ध के दौरान नरकासुर का एक प्रहार सत्यभामा को लगा। इससे वे अत्यंत क्रोधित हो उठीं। उन्होंने उसी अस्त्र से प्रत्युत्तर दिया और नरकासुर का वध कर दिया। इस प्रकार सत्यभामा ने देवी दुर्गा के समान अधर्म के विनाश की भूमिका निभाई। कई परंपराओं में सत्यभामा को भूदेवी का अवतार माना गया है। इस दृष्टि से नरकासुर का अपनी ही माता के माध्यम से वध होना उसके वरदान की भी सार्थक परिणति माना जाता है।

माता और पुत्र के इस संघर्ष की कथा मानवता को यह संदेश देती है कि जिस पृथ्वी से हमारा पालन-पोषण होता है, उस पर स्वामित्व का अहंकार नहीं, बल्कि संरक्षण और कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। यही इस कथा का गूढ़ आध्यात्मिक और पर्यावरणीय संदेश भी है।

इस घटना की स्मृति में दक्षिण भारत और महाराष्ट्र के अनेक क्षेत्रों में आज भी एक विशेष परंपरा निभाई जाती है। जिस प्रकार अंततः नरकासुर का विनाश हुआ, उसी के प्रतीक के रूप में लोग स्नान के अंत में एक कड़वे फल (जिसे कई स्थानों पर करिट या करेत कहा जाता है) को पैरों से कुचलते हैं। स्नान से पूर्व शरीर पर सिंदूर मिश्रित सुगंधित तेल का अभ्यंग किया जाता है। यह तेल शरीर की थकान दूर करने के साथ-साथ युद्ध में हुए रक्तपात की प्रतीकात्मक स्मृति भी कराता है। कई स्थानों पर पत्नियाँ अपने पतियों का अभ्यंग स्नान कराती हैं। लोकमान्यता है कि नरकासुर के साथ युद्ध भगवान श्रीकृष्ण ने किया था, किंतु उसका वध सत्यभामा के हाथों हुआ। इसी कारण इस परंपरा में स्त्री-शक्ति के सम्मान का भी संदेश निहित माना जाता है।

नरकासुर के वध के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण ने उसके कारागार में बंद लगभग 16 हजार राजकुमारियों एवं कन्याओं को मुक्त कराया। कैद से मुक्त होने के बाद वे सभी श्रीकृष्ण के चरणों में पहुँचीं और निवेदन किया— “अब समाज हमें कौन स्वीकार करेगा? आप ही हमारा आश्रय बनें।” भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें सम्मानपूर्वक स्वीकार करते हुए आश्वासन दिया कि वे उनके जीवन की रक्षा, सम्मान और पालन-पोषण का दायित्व निभाएँगे। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने उन सभी से विवाह कर उन्हें सामाजिक सम्मान प्रदान किया।

मान्यता है कि नरकासुर के वध के पश्चात कार्तिक अमावस्या की रात्रि में लोगों ने अपने घरों में दीप प्रज्वलित कर इस विजय का उत्सव मनाया। तभी से नरक चतुर्दशी और दीपावली का पर्व मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। एक अन्य मान्यता के अनुसार नरकासुर के अंत के साथ अनेक पुण्यात्माओं को भी बंधन से मुक्ति प्राप्त हुई थी।

नरकासुर की कथा कामाख्या देवी से भी जुड़ी हुई है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार नरकासुर का राज्य प्राग्ज्योतिषपुर था, जिसे वर्तमान का असम माना जाता है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र को कामरूप कहा जाता था। इसके नामकरण के संबंध में एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा प्रचलित है।

कथा के अनुसार, एक समय भगवान शिव की समाधि भंग करने के लिए देवताओं ने कामदेव का सहारा लिया। कामदेव ने अपने पुष्पबाणों से भगवान शिव की समाधि भंग कर दी। समाधि भंग होते ही भगवान शिव ने क्रोध में अपना तृतीय नेत्र खोल दिया और कामदेव भस्म हो गए।

अपने पति की इस अवस्था को देखकर उनकी पत्नी रति अत्यंत दुःखी हुईं और भगवान शिव से कामदेव को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। रति की करुण विनती से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन प्रदान किया, किंतु उनका पूर्व रूप, सौंदर्य और तेज नष्ट हो चुका था।

अपने सौंदर्य और शक्तियों के लुप्त हो जाने से व्यथित कामदेव ने पुनः भगवान शिव की आराधना की। तब भगवान शिव ने उन्हें नीलांचल पर्वत पर स्थित उस पवित्र स्थान पर देवी सती के शक्ति-पीठ के लिए एक भव्य मंदिर के निर्माण का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा करने पर उनका पूर्व तेज और सौंदर्य पुनः प्राप्त हो जाएगा।

कामदेव ने देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की सहायता से उस दिव्य मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर पूर्ण होते ही उन्हें अपना पूर्व रूप, तेज और सौंदर्य पुनः प्राप्त हो गया। तभी से यह क्षेत्र कामरूप के नाम से विख्यात हुआ।

कामाख्या मंदिर के निकट आज भी अधूरी सीढ़ियाँ दिखाई देती हैं, जिनसे संबंधित एक अन्य पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि माँ कामाख्या के अनुपम सौंदर्य पर मोहित होकर नरकासुर ने उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। देवी ने उससे बचने के लिए एक शर्त रखी कि यदि वह एक ही रात में नीलांचल पर्वत से मंदिर तक सीढ़ियों का निर्माण कर देगा, तभी वे उससे विवाह करेंगी।

नरकासुर ने यह चुनौती स्वीकार कर पूरी शक्ति से निर्माण कार्य आरंभ कर दिया। जब देवी को लगा कि वह वास्तव में अपना कार्य पूरा कर सकता है, तब उन्होंने एक योजना बनाई। उन्होंने रात समाप्त होने से पहले ही एक मुर्गे से बाँग दिलवा दी। मुर्गे की बाँग सुनकर नरकासुर को लगा कि प्रातःकाल हो चुका है और वह शर्त पूरी करने में असफल रहा है। बाद में जब उसे वास्तविकता का पता चला, तो क्रोध में उसने उस मुर्गे का वध कर दिया। जिस स्थान पर यह घटना हुई, उसे आज भी कुकुराकाटा (कुकुराकता) के नाम से जाना जाता है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन भी दीपावली के दिन ही हुआ था। दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा अथवा अन्नकूट महोत्सव भी भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। जब देवराज इंद्र के प्रकोप से ब्रज में मूसलधार वर्षा होने लगी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए सात दिनों तक अपनी कनिष्ठिका (सबसे छोटी उँगली) पर गोवर्धन पर्वत धारण किया। समस्त ब्रजवासी, गौधन और गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुरक्षित रहे। सातवें दिन वर्षा समाप्त होने पर भगवान ने गोवर्धन पर्वत को पुनः अपने स्थान पर स्थापित किया और प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा तथा अन्नकूट उत्सव मनाने की प्रेरणा दी। तभी से यह पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

संत कबीरदास इस प्रसंग को स्मरण करते हुए कहते हैं—

गोवर्धन कृष्ण जी उठाया, द्रोणागिरि हनुमंत।
शेषनाग सब सृष्टि उठाए, इनमें कौन भगवंत॥

कबीर का आशय है कि केवल अद्भुत कार्य कर देना ही किसी को भगवान नहीं बना देता; वास्तविक दिव्यता उसके उद्देश्य, करुणा, धर्म और लोककल्याण में निहित होती है।

 

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