लंदन के मौसम जैसी पल-पल बदलती चुनावी गारंटियाँ, संशय, भ्रम और अज्ञान से मुक्ति का मार्ग है गीता

एक जीवित चेतना का मूल गुण असंमोह, अर्थात् संशय और भ्रम से मुक्त होना है (गीता 10.4)। किंतु आज के परिवेश में संदेह करना लगभग अपरिहार्य हो गया है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति किसी बात या किसी व्यक्ति के प्रति आश्वस्त न हो, तो यह अस्वाभाविक नहीं है। ईमानदारी की कमी, ज्ञान का अभाव और स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के कारण आज समाज में केवल आधुनिक नेताओं पर ही नहीं, बल्कि धर्म और उसके प्रतिनिधियों पर भी संदेह बढ़ा है।

भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में स्पष्ट कहते हैं कि मनुष्य को संशय से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय के साथ कर्म करना चाहिए। किंतु आज स्थिति यह है कि नेताओं के प्रत्येक कथन, कार्य और वादे पर जनता संदेह करती है, और इसके पर्याप्त कारण भी हैं। कथनी और करनी, वादों और वास्तविकता के बीच इतनी गहरी खाई बन चुकी है कि लोगों का केवल संदेह ही नहीं, बल्कि विश्वास भी समाप्त होता जा रहा है।

चुनावी मौसम आते ही लगभग हर राजनीतिक दल और नेता अपनी-अपनी “गारंटी” देने लगता है, परंतु जनता अब उन्हें सहजता से स्वीकार नहीं करती। प्रत्येक पाँच वर्ष बाद देश और प्रदेश की तस्वीर बदल देने, विकास के नए युग की शुरुआत करने और सितारे ज़मीन पर उतार लाने जैसे बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। किंतु सत्ता प्राप्त होते ही अधिकांश चुनावी वादे भुला दिए जाते हैं। राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र अनेक बार केवल कागज़ का दस्तावेज़ बनकर रह जाते हैं। जनता इस वास्तविकता को समझती है, परंतु उसके सामने विकल्प सीमित दिखाई देते हैं।

यदि किसी नेता से चुनावी वादों के बारे में प्रश्न किया जाए, तो वह बड़ी सहजता से बहाने गिना देता है—कभी पर्याप्त बहुमत न होने का तर्क, तो कभी परिस्थितियों का हवाला। फिर अगला चुनाव आते ही वादों की नई पोटली खोल दी जाती है। दुर्भाग्य से जनता भी कई बार अल्प स्मृति का परिचय देती है।

वास्तव में मतदाताओं को भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए। चुनावी वादों को पूरा करवाने के लिए जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाना आवश्यक है। साथ ही चुनावों में अव्यावहारिक और मुफ्त की घोषणाओं पर भी प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए। धर्म और जाति तो चुनावी मुद्दे बन जाते हैं, किंतु आर्थिक सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मूल विषय पीछे छूट जाते हैं। चुनावी वादों और सामाजिक-आर्थिक न्याय के संवैधानिक लक्ष्यों के बीच अक्सर स्पष्ट असंगति दिखाई देती है।

वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा किए गए अनेक वादे आज भी अधूरे हैं। रोजगार का वादा लगभग हर दल करता है, किंतु जब उसके क्रियान्वयन के बारे में पूछा जाता है, तो उत्तर मिलता है कि “रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए गए हैं।”

प्रश्न यह है कि संदेह उत्पन्न कैसे होता है? गीता के अनुसार ज्ञान के अभाव में संशय जन्म लेता है। आज सूचना और तकनीक का युग है। प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में इतनी शक्ति है कि वह तथ्यों की जांच कर सकता है। आवश्यकता केवल इस शक्ति का सही और समयोचित उपयोग करने की है।

एक परिपक्व मतदाता वही है जो राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा-पत्र अपने पास सुरक्षित रखे और पाँच वर्ष बाद नेताओं से उनके प्रत्येक वादे का हिसाब माँगे। लोकतंत्र तभी सशक्त बनता है जब मतदाता जागरूक और उत्तरदायी होता है।

महाभारत में अर्जुन भी संशय से ग्रस्त थे। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का दिव्य ज्ञान प्रदान किया। भगवान कहते हैं—

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।। (गीता 4.40)

अर्थात् अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशयग्रस्त व्यक्ति का पतन होता है। संशययुक्त मनुष्य न इस लोक में सुख पाता है और न परलोक में।

आगे भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।। (गीता 4.42)

अर्थात् हृदय में अज्ञान से उत्पन्न हुए संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काटकर योग में स्थित हो जाओ और अपने कर्तव्य के पालन के लिए उठ खड़े हो।

भारतीय संविधान ने हमें सूचना का अधिकार (RTI) दिया है। इसके माध्यम से नागरिक सरकारों और जनप्रतिनिधियों के कार्यों की वास्तविकता जान सकते हैं तथा तथ्यों के आधार पर अपने संशयों का समाधान कर सकते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं—

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।। (गीता 7.1)

अर्थात् हे पार्थ! मेरा आश्रय लेकर योग का अभ्यास करो। तब तुम बिना किसी संशय के मुझे पूर्णतः जान सकोगे।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं कि सत्य की प्राप्ति तब होती है जब मनुष्य झिझक छोड़कर विवेकपूर्वक सत्य की खोज करता है। किसी भी बात को आँख मूँदकर स्वीकार करना उचित नहीं है। प्रत्येक विषय की सावधानीपूर्वक जाँच करनी चाहिए, चाहे वह धार्मिक विचार हो या चुनावी वादा।

भगवान श्रीकृष्ण से दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद अर्जुन का संशय समाप्त हो गया। उन्होंने कहा—

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।। (गीता 18.73)

अर्थात् हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। मेरी स्मृति लौट आई है। अब मैं संशय से मुक्त हूँ और आपके आदेशानुसार कार्य करने के लिए तैयार हूँ।

अर्जुन अपने नेतृत्व—भगवान श्रीकृष्ण—में श्रद्धा और विश्वास रखकर संशय से मुक्त हुए। आज हमारे सामने भी प्रश्न है कि क्या हम ऐसा नेतृत्व विकसित कर पाए हैं जो स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे और जनता के विश्वास पर खरा उतरे?

लोकतंत्र की मजबूती के लिए केवल नेताओं को ही नहीं, बल्कि चुनाव आयोग और जनता—दोनों को सक्रिय होना होगा। राजनीतिक दलों को अपने घोषणा-पत्रों में किए गए वादों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाने के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था पर भी विचार होना चाहिए। साथ ही जनता को भी अल्प स्मृति से बाहर निकलकर प्रत्येक चुनाव में पिछले वादों और उनके क्रियान्वयन का मूल्यांकन करना चाहिए।

आखिरकार, चुनावी वादों के आधार पर ही नेता पाँच वर्षों के लिए सत्ता प्राप्त करते हैं। इसलिए वादे केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के प्रति एक नैतिक और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व भी हैं। मुफ्त बिजली, पानी, मकान या अन्य लोकलुभावन घोषणाएँ तभी सार्थक हैं जब वे व्यवहारिक हों और समयबद्ध रूप से पूरी की जाएँ; अन्यथा वे केवल चुनावी जुमले बनकर रह जाती हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top