गीता के 16वें अध्याय के चौथे श्लोक में भगवान् कहते हैं—
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥ 16.4॥
अर्थात् हे पार्थ! दम्भ (पाखंड), दर्प (घमंड), अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान—ये सब आसुरी संपदा वाले मनुष्य के लक्षण हैं।
भगवान श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि दो प्रकार की संपदाएँ होती हैं—दैवी संपदा और आसुरी संपदा। दैवी संपदा मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाती है, जबकि आसुरी संपदा उसे बंधनों में जकड़ देती है। इसलिए भगवान अर्जुन से कहते हैं, “हे अर्जुन! शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी संपदा से युक्त हो।” इस संसार में मनुष्यों के स्वभाव भी मुख्यतः दो प्रकार के बताए गए हैं—एक देवतुल्य और दूसरा असुरतुल्य।
इस श्लोक का पहला शब्द है ‘दम्भः’, अर्थात् पाखंड (Hypocrisy)। पाखंड का अर्थ है—जो हम वास्तव में नहीं हैं, स्वयं को वैसा दिखाना। अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाकर एक कृत्रिम व्यक्तित्व प्रस्तुत करना।
वास्तव में हम सभी कभी-न-कभी मुखौटे पहनते हैं। परिस्थितियों के अनुसार अपने चेहरे बदल लेते हैं। सुबह से शाम तक अनेक भूमिकाएँ निभाते हुए हम अलग-अलग व्यक्तित्व का प्रदर्शन करते रहते हैं। धीरे-धीरे यह भी संभव है कि इन मुखौटों के बीच हम स्वयं ही भूल जाएँ कि हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है। यही सबसे बड़ा संकट है। यदि हम स्वयं से पूछें—“मैं कौन हूँ?”—तो स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता। क्या मेरा कोई वास्तविक अस्तित्व है, या मेरा जीवन केवल दिखावे का जाल बनकर रह गया है?
सुबह से शाम तक हम वही बनने का प्रयास करते रहते हैं, जो वास्तव में हम हैं ही नहीं। इसके विपरीत श्रीकृष्ण दैवी संपदा में सत्य, प्रामाणिकता (Authenticity) और वास्तविकता को स्थान देते हैं। मनुष्य जैसा है, वैसा ही स्वयं को स्वीकार करे, चाहे उसका परिणाम कुछ भी हो। वहीं आसुरी संपदा वाले व्यक्ति के अनेक चेहरे होते हैं।
हम रावण की कथा पढ़ते हैं, पर उसके दशानन होने का गहरा अर्थ प्रायः नहीं समझते। रावण के दस सिर उसके अनेक चेहरों और अनेक व्यक्तित्वों का प्रतीक हैं। इसके विपरीत श्रीराम का केवल एक ही चेहरा है। वे पूर्णतः प्रामाणिक हैं। उन्हें पहचानना सरल है, क्योंकि उनमें कोई छल या कपट नहीं है। रावण को पहचानना कठिन है, क्योंकि उसके अनेक रूप हैं। यहाँ दस का अर्थ केवल संख्या नहीं, बल्कि असंख्य मुखौटे है। उसका वास्तविक चेहरा कौन-सा है, यह समझना कठिन हो जाता है।
जब तक हमारे भीतर आसुरी प्रवृत्तियाँ रहती हैं, तब तक हमारे भी अनेक चेहरे होते हैं। हम भी एक प्रकार से दशानन बन जाते हैं। इससे हम केवल दूसरों को ही धोखा नहीं देते, बल्कि स्वयं भी भ्रमित हो जाते हैं। अंततः हम अपना वास्तविक स्वरूप ही भूल जाते हैं।
पाखंड का अर्थ है—दूसरों को धोखा देना और अंततः उसी धोखे में स्वयं भी फँस जाना। झूठ का स्वभाव है कि एक झूठ को बचाने के लिए अनेक झूठ बोलने पड़ते हैं। फिर झूठों की ऐसी अनंत श्रृंखला बन जाती है कि स्वयं भी याद नहीं रहता कि पहला झूठ क्या था।
झूठ का दूसरा स्वभाव यह है कि यदि उसे बार-बार दोहराया जाए, तो निरंतर पुनरावृत्ति के कारण वह स्वयं को भी सत्य प्रतीत होने लगता है। एक व्यक्ति पर हत्या का मुकदमा चल रहा था। वर्षों तक सुनवाई चली। गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे। अंततः न्यायाधीश ने थककर आरोपी से ही पूछा, “तुम स्वयं बता दो कि सच्चाई क्या है?” उसने उत्तर दिया, “जब मुकदमा शुरू हुआ था, तब मुझे सब स्पष्ट याद था। अब इतने वर्षों तक अलग-अलग बातें सुनते-सुनते मैं स्वयं भ्रमित हो गया हूँ। अब मैं निश्चित रूप से यह भी नहीं कह सकता कि मैंने हत्या की थी या नहीं।”
यही झूठ की प्रकृति है। यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक झूठ बोलता रहे, तो एक समय ऐसा आता है जब उसे स्वयं भी भ्रम होने लगता है कि जो वह कह रहा है, वही सत्य है। हर झूठ को बचाने के लिए नए झूठ गढ़ने पड़ते हैं और धीरे-धीरे मनुष्य का पूरा चित्त उसी में उलझ जाता है।
पाखंड का अर्थ है—कुछ और होना और कुछ और दिखाई देने का प्रयास करना। किंतु जो आप वास्तव में हैं, वह आपके सभी प्रयासों के बीच से भी झलकता रहता है। उसे पूरी तरह छिपाया नहीं जा सकता। इसलिए भले ही आपको अपना वास्तविक स्वरूप दिखाई न दे, दूसरों को उसका आभास हो जाता है। कई बार हमारे बारे में दूसरे लोग जो कहते हैं, वह हमारे अपने आकलन से अधिक सही होता है।
पाखंडी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर अनेक परतें चढ़ जाती हैं। जितना अधिक पाखंड, उतनी अधिक परतें। हर परत को बचाने के लिए नई परतें बनानी पड़ती हैं। यही सबसे बड़ा मानसिक बोझ है।
सत्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसे याद रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। सत्य सहज होता है। परंतु झूठ को हमेशा याद रखना पड़ता है। झूठ बोलने के लिए तीव्र स्मरण शक्ति, चतुराई और निरंतर मानसिक प्रयास की आवश्यकता होती है। जितना व्यक्ति अधिक शिक्षित, तार्किक और बौद्धिक रूप से कुशल होता है, उतना ही वह झूठ को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने में सक्षम हो सकता है। इसलिए केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं है; उसके साथ सत्यनिष्ठा भी आवश्यक है।
पाखंड का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि मनुष्य अपनी पहचान खो देता है। वह स्वयं को पहचानने में असमर्थ हो जाता है। यही रावणी प्रवृत्ति का पहला लक्षण है।
आइए, इस विजयदशमी के पावन पर्व पर हम अपने भीतर के पाखंड की परतों को उतारें और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानें। यदि हम स्वयं को ही नहीं पहचानेंगे, तो परमात्मा से हमारा साक्षात्कार कैसे होगा?
इस विजयदशमी पर संकल्प लें कि हम दिखावे के मुखौटे छोड़कर सत्य, प्रामाणिकता और आत्मपहचान के मार्ग पर चलेंगे।
