दैवीय संपदा है विनम्रता: गीता

विनम्रता मनुष्य के व्यक्तित्व का आभूषण है। इसके माध्यम से हमारा व्यक्तित्व सुंदर और प्रभावशाली बनता है, क्योंकि विनम्र होकर ही हम पात्रता अर्जित कर सकते हैं। विनम्रता हमें ग्रहण करना सिखाती है और दूसरों से आत्मीय रूप से जोड़ती है। भारतीय संस्कृति में इसी विनम्रता को व्यक्त करने के लिए प्रणाम और अभिवादन की परंपरा है। हमारे जीवन में विनम्रता बनी रहे, इसलिए प्रार्थना, स्तुतियाँ, सेवा, सहायता और दान जैसे सत्कर्मों का विधान किया गया है। इन सबके माध्यम से हमारे मन का अहंकार गलता है, मन निर्मल होता है और हम अधिक विनम्र होने के साथ-साथ कृतज्ञ भी बनते हैं।

भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय के दूसरे और तीसरे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण दैवीय संपदाओं का वर्णन करते हुए कहते हैं—

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2।।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।16.3।।

अर्थात् अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शांति, चुगली न करना, सभी प्राणियों पर दया, अलोलुपता, मार्दव (विनम्रता), लज्जा, चंचलता का अभाव, तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धता, किसी के प्रति द्वेष न रखना तथा अतिमानिता (अहंकार) का अभाव—ये सभी दैवीय संपदाएँ हैं।

यद्यपि इन श्लोकों का प्रत्येक शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य दो शब्द हैं—मार्दव, अर्थात् विनम्रता, और नातिमानिता, अर्थात् अहंकार का अभाव।

महाभारत में जब यह निश्चित हो गया कि कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध होगा, तब अर्जुन और दुर्योधन दोनों श्रीकृष्ण से सहायता माँगने द्वारका पहुँचे। पहले दुर्योधन पहुँचा और उसके बाद अर्जुन। उस समय श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे, इसलिए दोनों उनके जागने की प्रतीक्षा करने लगे। दुर्योधन श्रीकृष्ण के सिरहाने बैठ गया, जबकि अर्जुन उनके चरणों के पास विनम्र भाव से खड़े रहे।

जब श्रीकृष्ण की आँख खुली, तो उनकी दृष्टि सबसे पहले अर्जुन पर पड़ी, क्योंकि वे चरणों के समीप थे। दुर्योधन दिखाई नहीं दिया, क्योंकि वह सिरहाने बैठा था। यह दृश्य दोनों के स्वभाव का प्रतीक था—एक ओर अर्जुन की विनम्रता, दूसरी ओर दुर्योधन का अहंकार।

अर्जुन ने कहा, “वासुदेव! मैं आपसे युद्ध के लिए सहायता माँगने आया हूँ।” तभी दुर्योधन ने भी कहा, “मैं भी सहायता लेने आया हूँ और मैं अर्जुन से पहले आया था, इसलिए पहले मेरी सहायता की जानी चाहिए।”

श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, “यद्यपि तुम पहले आए हो, किंतु मैंने पहले अर्जुन को देखा है। इसलिए मैं दोनों की सहायता करूँगा। मेरे पास दो विकल्प हैं—एक ओर मैं स्वयं रहूँगा, किंतु युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊँगा; दूसरी ओर मेरी संपूर्ण नारायणी सेना होगी। तुम दोनों अपनी-अपनी पसंद चुन लो।”

अर्जुन ने बिना किसी संकोच के कहा, “मुझे आपका साथ चाहिए।”

यह सुनकर दुर्योधन अत्यंत प्रसन्न हुआ, क्योंकि उसे विशाल नारायणी सेना मिल गई। उस समय नारायणी सेना को संसार की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में गिना जाता था। श्रीकृष्ण ने दोनों की इच्छानुसार सहायता प्रदान की।

यहीं दुर्योधन से सबसे बड़ी भूल हुई। अहंकारवश उसने श्रीकृष्ण को छोड़कर केवल सेना को चुना, जबकि अर्जुन ने विनम्रता और श्रद्धा के कारण स्वयं श्रीकृष्ण का साथ चुना। अर्जुन जानता था कि जहाँ भगवान हैं, वहीं विजय है। दुर्योधन अहंकार के कारण इस सत्य को समझ नहीं सका। युद्ध के दौरान अनेक अवसरों पर श्रीकृष्ण ने अपनी बुद्धि, नीति और मार्गदर्शन से पांडवों की रक्षा की। अंततः दुर्योधन के अहंकार और अर्जुन की विनम्रता का परिणाम सबके सामने आया—कौरवों की पराजय हुई और पांडव विजयी बने।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी कहते हैं कि हमारे धर्मग्रंथों का एक मूल मंत्र है—जो नम्र होकर झुकते हैं, वही जीवन में ऊँचे उठते हैं। विनम्रता केवल व्यक्तित्व को आकर्षक नहीं बनाती, बल्कि अनेक बार सफलता का भी प्रमुख कारण बनती है। विनम्रता से मिलने वाला सम्मान स्थायी और सार्थक होता है। मन की कोमलता और व्यवहार की विनम्रता एक महान शक्ति है। यही शक्ति हमें पहले स्वयं पर नियंत्रण करना सिखाती है, और जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही दूसरों का विश्वास और प्रेम भी सहज रूप से प्राप्त कर लेता है।

गुरु नानक देव जी ने भी विनम्रता का महत्व बताते हुए कहा है—

नानक नन्हे बने रहो, जैसे नन्ही दूब।
बड़े-बड़े बहि जात हैं, दूब खूब की खूब।।

अर्थात् जो व्यक्ति विनम्र होकर झुकना जानता है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जैसे बाढ़ आने पर दूब घास झुक जाती है और जल उसके ऊपर से निकल जाता है, जबकि अकड़कर खड़े रहने वाले बड़े-बड़े वृक्ष उखड़कर बह जाते हैं।

इसी सत्य को एक पंजाबी पंक्ति अत्यंत सरलता से व्यक्त करती है—

“तू झुक के चल बंदेया, झुकियाँ नूँ रब्ब मिलदा।”

अर्थात् जो विनम्र होकर चलता है, वही अंततः ईश्वर की कृपा और जीवन की सच्ची सफलता का अधिकारी बनता है।

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