पृथ्वी को नरक से स्वर्ग बनाना सिखाती है गीता
आज मानव जाति पर्यावरण असंतुलन, आर्थिक संकट, जातिवाद, आतंकवाद, बढ़ती जनसंख्या, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद जैसी अनेक समस्याओं का सामना कर रही है। ताज़ा परिस्थितियों को ही देखें—‘रेमल’ तूफान ने पश्चिम बंगाल से लेकर बांग्लादेश के तटीय इलाकों में भारी तबाही मचा दी। लगभग 135 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चले इस तूफान के बाद हुई मूसलाधार वर्षा से सैकड़ों गाँव जलमग्न हो गए। वर्षा का प्रभाव पूर्वोत्तर भारत में भी व्यापक रूप से देखने को मिला, जहाँ मिजोरम में एक खदान धंसने से लगभग 17 लोगों की मृत्यु हो गई।
यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो मानवता को सामूहिक विनाश की ओर बढ़ने से रोकना कठिन होगा। ये परिस्थितियाँ मानसिक रोगों को भी जन्म दे रही हैं। आधुनिक युग में नैतिकता का तीव्र पतन हो रहा है और मानवीय मूल्यों की गिरावट चिंताजनक स्तर तक पहुँच गई है। हमारी मानसिक प्रवृत्तियाँ जड़ और चेतन—दोनों को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण की प्रक्रिया हमारे कलुषित मन से ही उत्पन्न होती है।
भगवद्गीता हमें सिखाती है कि इस कलुषित चेतना को शुद्ध करना आवश्यक है। जब चेतना शुद्ध होती है, तब हमारे सभी कर्म ईश्वर की इच्छा के अनुरूप होने लगते हैं और हम वास्तविक सुख प्राप्त कर सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें अपने सभी कर्म छोड़ देने चाहिए, बल्कि हमें अपने कर्मों को शुद्ध करना चाहिए। शुद्ध कर्म ही भक्ति कहलाते हैं। भक्ति में कर्म सामान्य दिखाई देते हुए भी कलुषित नहीं होते। इसी बात का वर्णन गीता के तृतीय अध्याय के सातवें श्लोक में किया गया है—
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥ (3.7)
भगवद्गीता का एक महत्वपूर्ण विषय भौतिक प्रकृति और चेतना-ऊर्जा के बीच के अद्वितीय संबंध को स्पष्ट करना है। गीता पदार्थ और आत्मा के बीच स्वस्थ संतुलन स्थापित करने के विभिन्न उपायों की भी चर्चा करती है। इसी क्रम में गीता पर्यावरण विज्ञान के कुछ मूलभूत सिद्धांतों को भी उजागर करती है।
गीता के सातवें अध्याय (7.4–7.7) में बताया गया है कि समस्त प्राणियों की उत्पत्ति ईश्वर की दो प्रकृतियों—अपरा प्रकृति (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन और बुद्धि सहित भौतिक प्रकृति) तथा परा प्रकृति (चेतना-शक्ति, जिसमें समस्त जीवात्माएँ सम्मिलित हैं)—के संयोग से हुई है। सभी प्राणियों की रचना अव्यवस्थित रूप से नहीं हुई, बल्कि वे अत्यंत सुंदर ढंग से व्यवस्थित और परस्पर एकीकृत हैं। यदि इस व्यवस्था का एक छोटा-सा भाग भी प्रभावित हो जाए, तो पूरा तंत्र प्रभावित हो जाता है।
मनुष्य की सकारात्मक भावना प्रकृति को संतुलित बनाए रखने में सहायक होती है। भौतिक पर्यावरण के संरक्षण में मनुष्य की भूमिका का वर्णन गीता के श्लोक 3.10 से 3.16 तक किया गया है। भगवान कहते हैं कि सृष्टि की रचना करते समय मनुष्य को यज्ञभाव—अर्थात् अपने कर्तव्य को निष्ठा और निःस्वार्थ भाव से करने की भावना—भी प्रदान की गई है। जब मनुष्य त्याग और सेवा की भावना से कर्म करता है, तब देवता प्रसन्न होते हैं और जीवन की आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करते हैं।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥ (3.11)
मनुष्य और प्रकृति के बीच ऐसा सहयोग सभी के लिए समृद्धि का कारण बनता है। श्रीकृष्ण वर्षा का उदाहरण देकर इस परस्पर निर्भरता को स्पष्ट करते हैं—
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ (3.14)
सभी प्राणी अन्न पर निर्भर हैं और अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञभाव से किए गए कर्मों से होती है। यहाँ यज्ञ का अर्थ किसी विशेष अनुष्ठान से नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के हित और पर्यावरण के संरक्षण को ध्यान में रखकर अपने कर्तव्यों का पालन करना है।
इस प्रकार प्रकृति ने कर्म और उसके परिणामों का एक सार्वभौमिक चक्र स्थापित किया है। मनुष्य इस चक्र से लाभान्वित होता है, इसलिए उसका परम कर्तव्य है कि वह इस व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने में सहयोग करे। जो लोग प्रकृति के संसाधनों का उपभोग तो करते हैं, परंतु उसके संरक्षण में अपना योगदान नहीं देते, उनकी तुलना श्रीकृष्ण पापियों और चोरों से करते हैं। ऐसे स्वार्थी लोग व्यर्थ जीवन जीते हैं।
वास्तव में जीवन प्रकृति और मानवता का एक संयुक्त उपक्रम है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति मनुष्य को अनुकूल परिस्थितियाँ और संसाधन प्रदान करती है, जबकि मनुष्य का दायित्व है कि वह त्याग और जिम्मेदारी की भावना से पर्यावरण की रक्षा करे।
श्रीकृष्ण केवल मानव जाति की एकता की ही नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत की एकता की भी घोषणा करते हैं। गीता (13.17) में कहा गया है कि ईश्वर विभिन्न प्राणियों में विभाजित प्रतीत होते हुए भी वास्तव में अविभाज्य हैं। अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक विराट पारिस्थितिक तंत्र है, जो एक ही चेतना से निर्मित, व्याप्त और संचालित है। यह शिक्षा जैव-विविधता के संरक्षण का आधार प्रस्तुत करती है।
दसवें अध्याय में भगवान अपने ऐश्वर्यों का वर्णन करते हुए स्वयं को पीपल का वृक्ष, कामधेनु गाय, वासुकि नाग, गंगा नदी और हिमालय पर्वत बताते हैं। वे वसंत ऋतु की पुष्पित शोभा में भी स्वयं को प्रकट मानते हैं। सातवें अध्याय (7.8–7.10) में वे कहते हैं कि वे पृथ्वी की पवित्र गंध, जल का रस, अग्नि का तेज और सूर्य का प्रकाश हैं। इससे स्पष्ट होता है कि प्रकृति ईश्वर की महिमा की अभिव्यक्ति है; अतः उसकी रक्षा करना मनुष्य का परम धर्म है।
गीता (13.8) में ‘शौचम्’—अर्थात् शरीर की स्वच्छता और मन की पवित्रता—को आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति का साधन बताया गया है। व्यापक अर्थ में यह शिक्षा हमें अपने परिवेश और पारिस्थितिकी तंत्र को स्वच्छ और शुद्ध रखने की प्रेरणा देती है।
निष्कर्षतः, भगवद्गीता बताती है कि चेतना-ऊर्जा और प्रकृति के गुणों की परस्पर क्रिया से जीवन और उसका पोषक वातावरण निर्मित होता है। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी के शब्दों में, यदि पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखना है, तो प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर पर्यावरणीय मूल्यों को स्थापित करना होगा और पर्यावरण-अनुकूल जीवन-पद्धति अपनानी होगी।
गीता में लोकसंग्रह—अर्थात् समस्त विश्व की एकता और कल्याण—पर विशेष बल दिया गया है। यह हमसे अपेक्षा करती है कि हम अपने जीवन की पद्धति को बदलें और अपने स्वार्थ से ऊपर उठें। जो व्यक्ति ऐसा कर लेता है, वह न किसी से ईर्ष्या करता है, न किसी वस्तु की लालसा रखता है। वह प्रकृति के बंधनों से मुक्त होकर दिव्य स्वभाव को प्राप्त करता है और इसी जीवन में आध्यात्मिक सुख का अनुभव करता है—
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ (14.20)
इसके विपरीत जो लोग उच्चतर गुणों की ओर उन्नति नहीं करते और निरंतर तमोगुण में ही स्थित रहते हैं, उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है—
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥ (14.18)

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