गीता के बहुविध रंग — गीता मनीषी के संग

विश्व कल्याण एवं मानव मात्र के व्यक्तित्व-विकास के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान एक अमूल्य निधि है। यह सम्पूर्ण वेदों का सार है। यह भिन्न-भिन्न उद्भावनाओं एवं आध्यात्मिक प्रवृत्तियों वाले प्राणियों के लिए शुभ, मंगलकारी एवं कल्याणदायक है। केवल सात सौ श्लोकों की लघुकाय गीता को कामधेनु तथा कल्पवृक्ष की उपमा दी गई है।

गीता की लोकप्रियता का एकमात्र कारण यह है कि वह मानव जीवन की लगभग सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती है। जीवन की नश्वरता, उसे सार्थक बनाने का सिद्धान्त, निष्काम कर्म तथा अनासक्त होकर कर्म करना—ये सभी विषय गीता में निहित हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि किसी एक वाद, सम्प्रदाय या सिद्धान्त तक सीमित नहीं है। गीता का प्रमुख लक्ष्य मानव-कल्याण है। मानव किसी भी मत, पंथ, विचार, देश या संस्कृति का हो, उसका कल्याण ही गीता का उद्देश्य है।

गीता का संदेश स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से प्रकट हुआ है। यह संदेश मोहग्रस्त अर्जुन के माध्यम से विश्व के प्रत्येक मानव को दिया गया है और आधुनिक युग में भी पूर्णतः प्रासंगिक एवं सार्थक है। गीता का महत्व सार्वभौमिक और सार्वकालिक है।

पिछले लगभग तीन वर्षों से गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के साथ प्रश्नों और जिज्ञासाओं का क्रम निरन्तर चल रहा है। इस लेख में कुछ ऐसे प्रश्न प्रस्तुत हैं, जिन्हें आज की पीढ़ी पूछना चाहती है।

प्रश्न:

गीता जैसा प्रकाशमय ग्रन्थ एक अंधे व्यक्ति की जिज्ञासा “धृतराष्ट्र उवाच” से क्यों आरम्भ होता है?

उत्तर:

सच्चाई यह है कि यदि मनुष्य अंधा न हो, तो इस संसार के अनेक धार्मिक ग्रन्थों की आवश्यकता ही न पड़े। अंधा व्यक्ति वही देखना चाहता है जो उसे दिखाई नहीं देता। बहरा व्यक्ति वही सुनना चाहता है जो उसे सुनाई नहीं देता। यदि सभी इन्द्रियाँ नष्ट भी हो जाएँ, तब भी मन के भीतर छिपी वृत्तियाँ समाप्त नहीं होतीं।

पहली बात स्मरण रखें—धृतराष्ट्र शारीरिक रूप से अंधे हैं, फिर भी युद्धभूमि में क्या हो रहा है, यह जानने के लिए उनका मन अत्यन्त उत्सुक, व्याकुल और पीड़ित है।

दूसरी बात—धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हैं, परंतु अंधे व्यक्तित्व की संतति भीतर से दृष्टिवान नहीं हो सकती। बाहरी आँखें होने पर भी आंतरिक दृष्टि जागृत होना कठिन है।

तीसरी बात—धृतराष्ट्र से उत्पन्न सभी पुत्रों का व्यवहार भी अंधत्व से ग्रस्त था। नेत्र-चिकित्सक के रूप में आँखों के अंधों का उपचार करते-करते यह समझ में आया कि संसार में आँख से अंधे लोग कम हैं, पर आँखें होते हुए भी जो सत्य को नहीं देख पाते, वे अधिक हैं। यही भेद जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

प्रश्न:

हम कहते हैं कि इन्द्रियों को वश में करो। धृतराष्ट्र तो आँखों से अंधे थे। क्या आँखों के न होने से वासना और कामना समाप्त हो जाती है?

उत्तर:

नहीं। कामना और वासना आँखों से उत्पन्न नहीं होतीं; वे मन से उत्पन्न होती हैं। आँखें नष्ट हो जाएँ, तब भी वासना का अंत नहीं होता। इसलिए वास्तविक साधना मन को शुद्ध करने की है।

प्रश्न:

“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः”—अर्थात धर्मभूमि में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए। यह कैसी विडम्बना है? यदि धर्मक्षेत्र में भी युद्ध हो सकता है, तो अधर्म के क्षेत्रों में क्या होता होगा?

उत्तर:

मेरा मानना है कि पृथ्वी पर अभी तक पूर्ण अर्थों में धर्मक्षेत्र बना ही नहीं है। यदि धर्मक्षेत्र वास्तव में स्थापित हो जाए, तो युद्ध की संभावना समाप्त हो जानी चाहिए। जब युद्ध की संभावना बनी हुई है, तब धर्मक्षेत्र भी युद्धरत हो जाता है; ऐसे में अधर्म की निन्दा मात्र से क्या लाभ?

हजारों वर्ष पहले, जब पृथ्वी पर भगवान श्रीकृष्ण जैसा अद्वितीय और सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व विद्यमान था, तब भी लोग कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्र हुए थे।

मनुष्य के भीतर गहराई में युद्ध की पिपासा, पशुत्व और विनाश की आकांक्षा छिपी रहती है। केवल धर्म का नाम ले लेने से वह समाप्त नहीं हो जाती। बल्कि जब लड़ने के लिए धर्म का आवरण मिल जाता है, तब संघर्ष और भी खतरनाक हो जाता है, क्योंकि तब हिंसा भी न्यायोचित प्रतीत होने लगती है।

प्रश्न:

युद्धभूमि में दुर्योधन, युधिष्ठिर, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और अनेक पराक्रमी योद्धा उपस्थित थे। उनके भी स्वजन थे। फिर स्वजनों, गुरुजनों और मित्रों को देखकर विषाद केवल अर्जुन को ही क्यों हुआ?

उत्तर:

निश्चय ही अनेक योद्धाओं के स्वजन सामने खड़े थे, परंतु विषाद केवल अर्जुन को हुआ, क्योंकि हिंसा भी अंधी हो सकती है और ममत्व भी अंधा हो सकता है। कोई प्रतिज्ञा निभा रहा था, कोई मित्रता, कोई प्रतिशोध, कोई कृतज्ञता—पर अर्जुन विचार कर पा रहा था, देख पा रहा था, अपने भीतर के द्वंद्व को पहचान पा रहा था।

सबसे बड़े प्रश्न वे नहीं हैं जो हम संसार के बारे में पूछते हैं; सबसे बड़े प्रश्न वे हैं जो हमारे अपने मन के द्वंद्व से जन्म लेते हैं। इन द्वंद्वों को देखने के लिए चिंतन, मनन और विवेक चाहिए—और यही अर्जुन के पास था।

अर्जुन मानव-चेतना का प्रतीक है। वह पशु नहीं बनना चाहता, पर परिस्थितियाँ उसे पशुत्व की ओर धकेल रही हैं। परमात्मा का पूर्ण बोध उसे अभी नहीं हुआ है, इसलिए वह प्रश्न करता है, जिज्ञासा करता है। जिसके जीवन में प्रश्न और जिज्ञासा जीवित हैं, उसके जीवन में धर्म प्रवेश कर सकता है।

दुर्योधन बीज की तरह बंद और निश्चिंत है; अर्जुन अंकुरित चेतना है—चिंतित, व्याकुल, बेचैन और सत्य की खोज में तत्पर। यही बेचैनी उसे विषाद में ले जाती है, और भगवान श्रीकृष्ण इसी विषाद को गीता के माध्यम से योग में रूपांतरित कर देते हैं।

प्रश्न:

दुनिया में अनेक महान ग्रन्थ हैं, फिर भी गीता को विशिष्ट क्यों माना जाता है?

उत्तर:

क्योंकि गीता केवल धर्मशास्त्र नहीं, बल्कि मनुष्य के मन का शास्त्र है। उसमें केवल दार्शनिक घोषणाएँ नहीं हैं कि आत्मा है, ईश्वर है; बल्कि वह मनुष्य के दुःख, दुविधा, भय, मोह और आंतरिक संघर्ष का सूक्ष्म विश्लेषण करती है।

गीता को मानव-जाति का प्रथम मनोवैज्ञानिक ग्रन्थ कहा जा सकता है। इस दृष्टि से श्रीकृष्ण मनोविज्ञान के आदि आचार्य प्रतीत होते हैं। वे संतप्त, दुविधाग्रस्त, टूटे हुए और खंडित मन को पुनः अखंड और समन्वित बनाते हैं।

वे केवल मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) ही नहीं करते, बल्कि मनोसंश्लेषण (Psychosynthesis) भी करते हैं। यही भगवान श्रीकृष्ण और भगवद्गीता की अद्वितीय विशेषता है।

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