गीता का नवनीत है अनासक्ति योग।

अनासक्त भाव से करें मतदान

योगीराज श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि वे उदासीन की भाँति स्थित रहते हुए भी कर्मों में अनासक्त हैं, इसलिए कर्म उन्हें बाँध नहीं सकते। यही अनासक्ति योग का मूल संदेश है। इसे एक छोटी-सी कहानी के माध्यम से समझा जा सकता है।

एक मालिन और एक मछुआरिन में गहरी मित्रता थी। मालिन प्रतिदिन शाम को बगीचे से फूल चुनती और अगले दिन उन्हें शहर में बेचती थी। दूसरी ओर, मछुआरिन प्रतिदिन नदी से मछलियाँ पकड़कर शहर में बेचती थी।

एक दिन मछुआरिन को शहर में अधिक देर हो गई। रात होने के कारण वह अपने घर नहीं लौट सकी। मालिन के आग्रह पर वह उसी के घर रुक गई। घर में चारों ओर फूलों से भरी टोकरियाँ रखी थीं। दोनों ने भोजन किया और बातचीत करते हुए सोने चली गईं।

कुछ देर बाद मछुआरिन बेचैन होकर करवटें बदलने लगी। मालिन ने पूछा, “क्या बात है? नींद क्यों नहीं आ रही?”

मछुआरिन बोली, “तेरे कमरे में फूलों की इतनी तेज़ सुगंध है कि मुझे नींद ही नहीं आ रही।”

मालिन उसकी समस्या समझ गई। वह बाहर गई, मछुआरिन की मछलियों वाली टोकरी लाकर उसके सिरहाने रख दी। मछुआरिन मुस्कुराई और बोली, “अब ठीक है।” थोड़ी ही देर में वह गहरी नींद में सो गई।

इस कहानी का संदेश स्पष्ट है—मनुष्य जिस वातावरण का अभ्यस्त हो जाता है, उसे वही स्वाभाविक और सुखद प्रतीत होने लगता है। यही स्थिति समाज और राजनीति में भी देखने को मिलती है। जो लोग भ्रष्टाचार, अपराध, झूठ और अनैतिक आचरण के अभ्यस्त हो जाते हैं, उन्हें ईमानदारी, पारदर्शिता और नियमबद्ध व्यवस्था असहज लगती है।

भ्रष्ट, बेईमान और दलाली की मानसिकता वाले लोगों को स्वच्छ और पारदर्शी कार्यप्रणाली कभी पसंद नहीं आती। जिस प्रकार कीटनाशक का छिड़काव होने पर कीड़े-मकोड़े तड़पने लगते हैं, उसी प्रकार सत्य, ईमानदारी और नैतिकता का वातावरण भी अनैतिक लोगों को बेचैन कर देता है। जो लोग नफरत के वातावरण में पले-बढ़े हों, उनके लिए प्रेम, समरसता और सौहार्द को स्वीकार करना कठिन होता है।

आज चुनाव का समय है। विभिन्न राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। ऐसे वातावरण में सामान्य मतदाता के लिए सही और गलत का निर्णय करना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में श्रीमद्भगवद्गीता का अनासक्त भाव हमारा सर्वोत्तम मार्गदर्शन कर सकता है।

मतदान करते समय हमें किसी व्यक्ति, दल, जाति, धर्म, प्रचार, प्रलोभन या भावनात्मक उकसावे से प्रभावित नहीं होना चाहिए। निष्पक्ष, विवेकपूर्ण और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर मतदान करना ही गीता के अनासक्ति योग की वास्तविक भावना है। आज केवल नीति का नहीं, बल्कि नीयत, राष्ट्र और श्रेष्ठ नेतृत्व का प्रश्न है।

इसी संदर्भ में फिराक़ जलालपुरी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ स्मरणीय हैं—

तू इधर-उधर की न बात कर,
ये बता कि काफ़िला क्यों लुटा।
मुझे रहज़नों से गिला नहीं,
तेरी रहबरी का सवाल है।

अंत में सभी नागरिकों से विनम्र आग्रह है कि मतदान अवश्य करें। लोकतंत्र का यह अमूल्य अवसर हमें पाँच वर्ष में केवल एक बार मिलता है। अपने संविधान प्रदत्त मताधिकार का अवश्य प्रयोग करें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए जागरूक नागरिक होने का दायित्व निभाएँ।

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