नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए महत्त्वपूर्ण गीता-दर्शन

भारतीय विचार में शिक्षा का उद्देश्य

भारतीय विचार में शिक्षा का उद्देश्य सदैव कल्याणकारी समाज के लिए संवेदनशील, बुद्धिमान, तार्किक, सक्षम एवं प्रशिक्षित नागरिकों का निर्माण करना रहा है। यह शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने हेतु आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहने वाले हाड़-मांस के पुतले तैयार करने की प्रक्रिया नहीं थी। ज्ञान, प्रज्ञा और सत्य की खोज को भारतीय चिंतन-परंपरा एवं दर्शन ने सदैव सर्वोच्च मानवीय लक्ष्य माना है।

प्राचीन भारत में शिक्षा का लक्ष्य केवल सांसारिक जीवन या गुरुकुलोत्तर जीवन की तैयारी के लिए ज्ञानार्जन नहीं था, बल्कि पूर्ण आत्मज्ञान और मुक्ति की प्राप्ति था। इसी कारण कहा गया है—“सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात् वही विद्या है जो मुक्ति प्रदान करे।

इस व्यापक दृष्टिकोण के कारण तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविख्यात शिक्षा-केंद्रों में अध्ययन के विविध क्षेत्रों में शिक्षण और अनुसंधान के उच्चतम प्रतिमान स्थापित हुए। विभिन्न देशों और पृष्ठभूमियों से आने वाले विद्यार्थियों तथा विद्वानों को इन संस्थानों में उच्चकोटि के अनुसंधान और ज्ञानार्जन के अवसर प्राप्त होते थे।

इसी प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था ने विश्व को चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त, चाणक्य, चक्रपाणि दत्त, माधव, पाणिनि, पतंजलि, नागार्जुन, गौतम, पिंगल, मैत्रेयी, गार्गी और तिरुवल्लुवर जैसे महान विद्वान प्रदान किए। गणित, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, चिकित्सा, शल्यचिकित्सा, स्थापत्य, नौकानिर्माण, दिशा-ज्ञान, योग, संगीत, ललित कला तथा शतरंज जैसे विषयों में भारत ने मौलिक और प्रमाणिक योगदान दिया।

भारतीय मनीषा ने मानवता को अनेक अमूल्य ग्रंथ भी दिए—महाभारत, रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता, पाणिनि का व्याकरण, अर्थशास्त्र तथा अन्य दार्शनिक और वैज्ञानिक ग्रंथ। गीता विशेष रूप से धर्माधारित कर्म, आत्मबोध और जीवन-प्रबंधन का अद्वितीय संवाद है।

दुर्भाग्यवश लगभग एक हजार वर्षों के विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक प्रभुत्व के कारण भारतीय समाज अपनी ज्ञान-परंपरा से दूर होता चला गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यह दूरी पूर्णतः समाप्त नहीं हो सकी। ऐसे में यह विश्वास किया जाना चाहिए कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 भारतीय ज्ञान-परंपरा और भारतीय समाज के बीच उत्पन्न इस अनावश्यक विच्छेद को समाप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी।

यह कहना उचित नहीं होगा कि इससे पहले स्वतंत्र भारत में शिक्षा सुधार के प्रयास नहीं हुए। 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1992 का संशोधन तथा 2009 का शिक्षा का अधिकार अधिनियम महत्त्वपूर्ण पड़ाव थे। किंतु इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य प्रचलित शिक्षा व्यवस्था तक नागरिकों की पहुँच सुनिश्चित करना था; शिक्षा की मूल भारतीय आत्मा को पुनर्स्थापित करना नहीं।

इसी संदर्भ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 एक युगांतकारी दस्तावेज के रूप में सामने आती है। इसकी प्रस्तावना की पहली पंक्ति में कहा गया है—

“शिक्षा पूर्ण मानव क्षमता के विकास, एक न्यायसंगत और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण तथा राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए मूलभूत आवश्यकता है।”

यह उद्घोषणा इस नीति के व्यापक और मानवीय दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है। भारतीय चिंतन में शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन नहीं, बल्कि जीवन के लिए मनुष्य को तैयार करना है।

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में उन गुणों का वर्णन किया गया है, जिनसे युक्त मनुष्य दैवी संपदा का अधिकारी बनता है—

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ 16.1॥

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ 16.2॥

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ 16.3॥

इन श्लोकों में निर्भयता, आत्मशुद्धि, ज्ञानयोग, दान, आत्मसंयम, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, निंदा से दूर रहना, प्राणिमात्र पर दया, लोभ का अभाव, कोमलता, लज्जा, धैर्य, क्षमा, पवित्रता और अहंकार-रहित जीवन जैसे गुणों का उल्लेख है। यही वे गुण हैं जो वास्तविक मनुष्य का निर्माण करते हैं।

मैकाले-प्रदत्त शिक्षा प्रणाली ज्ञान को खंड-खंड में विभाजित कर केवल शैक्षिक योग्यता को महत्त्व देती है, जबकि भारतीय दृष्टि समग्रता की पक्षधर है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए नई शिक्षा नीति में विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला, मानविकी और खेल के बीच बहुविषयक एवं समग्र शिक्षा (Multidisciplinary and Holistic Education) के विकास का लक्ष्य रखा गया है।

गीता के पाँचवें अध्याय में इसी समग्र ज्ञान की महिमा बताई गई है—

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥ 5.16॥

अर्थात जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो जाता है, उनके लिए वह ज्ञान सूर्य के समान परम सत्य को प्रकाशित कर देता है।

भारतीय आध्यात्मिक दर्शन ने अद्वैत के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि समस्त सृष्टि में एक ही तत्व विद्यमान है। इसी आधार पर सत्त्व, रजस और तमस का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया, जिनमें सत्त्व को सर्वोच्च प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत माना गया। ज्ञान को कृत्रिम रूप से अलग-अलग विभागों में बाँटकर उसकी पूर्णता प्राप्त नहीं की जा सकती; समग्र दृष्टि से ही वास्तविक ज्ञान संभव है।

पाश्चात्य शिक्षा ने अनेक बार विज्ञान और अध्यात्म को परस्पर विरोधी रूप में प्रस्तुत किया, जिसके कारण शिक्षा मानव-कल्याण के व्यापक लक्ष्य से दूर हो गई। दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत ने भी लंबे समय तक इसी विखंडित शिक्षा प्रणाली को अपनाए रखा। नई शिक्षा नीति इस विखंडन को समाप्त कर समग्र दृष्टि के माध्यम से मानव-कल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करती है।

इस नीति में रटंत स्मृति-आधारित ज्ञान के स्थान पर अवधारणात्मक समझ (Conceptual Understanding) के विकास पर बल दिया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता का संपूर्ण दर्शन इसी समझ को विकसित करने का प्रयास है। जब अर्जुन ज्ञान और सामर्थ्य से संपन्न होते हुए भी विषाद और दिशाहीनता का शिकार हो जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण तार्किक संवाद के माध्यम से उनका मार्गदर्शन करते हैं। यही संवाद आगे चलकर गीता के रूप में प्रकट होता है।

गीता मनुष्य को यह क्षमता प्रदान करती है कि वह जीवन की प्रत्येक परिस्थिति का विवेकपूर्ण विश्लेषण कर उचित समाधान तक पहुँच सके। इसलिए निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि नई शिक्षा नीति जिन पवित्र उद्देश्यों—पूर्ण मानव क्षमता, न्यायपूर्ण समाज, नैतिक नागरिकता और समग्र विकास—की प्राप्ति का लक्ष्य लेकर आई है, उनकी सिद्धि में गीता-दर्शन अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रेरणास्रोत सिद्ध होगा।

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