गीता में समस्याओं का पूर्वानुमान और समाधान

 

गीता की प्रेरणाएँ शाश्वत हैं : जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी

हाल ही में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने “Brain Rot” को वर्ष 2024 का “Word of the Year” घोषित किया। इसका आशय उस मानसिक स्थिति से है, जिसमें अत्यधिक और निम्न-गुणवत्ता वाली डिजिटल सामग्री के निरंतर उपभोग के कारण सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होने लगती है।

पिछले लगभग बीस वर्षों में मनुष्य की ध्यान केंद्रित रखने की क्षमता (Attention Span) पर हुए शोध बताते हैं कि केवल लगभग पंद्रह वर्षों में यह क्षमता 45 मिनट से घटकर लगभग 8 सेकंड रह गई है। इसकी तुलना गोल्डफिश से की जाती है, जिसके बारे में लोकप्रिय रूप से कहा जाता है कि वह लगभग 8 सेकंड तक ही एक विषय पर ध्यान बनाए रखती है।

बार-बार ध्यान भटकने की इस स्थिति को “पॉपकॉर्न ब्रेन” कहा जाता है। वैज्ञानिक इसका प्रमुख कारण डिजिटल एडिक्शन (Digital Addiction) को मानते हैं। आज सूचनाओं की बाढ़ हर डिजिटल मंच पर उपलब्ध है। मोबाइल स्क्रीन पर आने वाले प्रत्येक नोटिफिकेशन की जाँच करने पर मस्तिष्क में डोपामीन (खुशी का अनुभव कराने वाला न्यूरोट्रांसमीटर) का स्राव होता है, जिससे पुरस्कार मिलने जैसी अनुभूति होती है। यही अनुभव व्यक्ति को बार-बार स्क्रीन की ओर खींचता है। परिणामस्वरूप मन एकाग्र नहीं रह पाता और धीरे-धीरे यह अल्पकालिक चंचलता विषाद, अवसाद, तनाव और मानसिक भटकाव का रूप ले सकती है।

जिस समस्या की चर्चा आज आधुनिक विज्ञान कर रहा है, उसका उल्लेख भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व भगवद्गीता में कर दिया था। जब अर्जुन छठे अध्याय के 34वें श्लोक में कहते हैं—

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
(गीता 6.34)

अर्थात्— हे कृष्ण! यह मन अत्यंत चंचल, उद्वेग उत्पन्न करने वाला, बलवान और हठी है। इसे वश में करना मुझे वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन प्रतीत होता है।

इस श्लोक में प्रयुक्त चार विशेषण—चंचल, प्रमाथी, बलवान और दृढ़—आज के मानसिक विचलन का सटीक चित्र प्रस्तुत करते हैं।

जब अर्जुन अशांत मन का वर्णन करते हैं, तब वे केवल अपनी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की ओर से बोल रहे होते हैं। मन चंचल है क्योंकि वह निरंतर एक विषय से दूसरे विषय की ओर भागता रहता है। वह अशांत है क्योंकि घृणा, क्रोध, वासना, लोभ, ईर्ष्या, चिंता, भय और आसक्ति के माध्यम से व्यक्ति की चेतना में निरंतर उथल-पुथल मचाता है। वह बलवान है क्योंकि अपनी प्रबल प्रवृत्तियों से बुद्धि पर अधिकार कर लेता है और विवेक को कमजोर कर देता है। वह हठी भी है, क्योंकि जब किसी विचार को पकड़ लेता है, तब उसे छोड़ने से इंकार कर देता है और बुद्धि के थक जाने तक उसी पर विचार करता रहता है।

इसीलिए अर्जुन कहते हैं कि मन को नियंत्रित करना वायु को नियंत्रित करने से भी अधिक कठिन है।

किन्तु भगवान श्रीकृष्ण अगले ही श्लोक में इसका समाधान भी बताते हैं—

श्रीभगवानुवाच—
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
(गीता 6.35)

श्रीकृष्ण अर्जुन को “महाबाहो” कहकर संबोधित करते हैं, जिसका अर्थ है—शक्तिशाली भुजाओं वाला वीर। उनका आशय है—“हे अर्जुन! तुमने युद्धभूमि में महान योद्धाओं को पराजित किया है; क्या तुम अपने मन को नहीं जीत सकते?” यह संदेश हम सभी पर समान रूप से लागू होता है।

विशेष बात यह है कि श्रीकृष्ण समस्या से इनकार नहीं करते। वे यह नहीं कहते कि मन को नियंत्रित करना आसान है। वे अर्जुन की बात से सहमत होते हुए स्वीकार करते हैं कि मन वास्तव में अत्यंत कठिनाई से वश में आता है। किंतु वे यह भी बताते हैं कि संसार की अनेक महान उपलब्धियाँ कठिन होने पर भी असंभव नहीं होतीं।

जैसे नाविक जानते हैं कि समुद्र में भयंकर तूफान आ सकते हैं, फिर भी वे समुद्र-यात्रा छोड़ नहीं देते; उसी प्रकार मन की कठिनाई से घबराकर आध्यात्मिक साधना का त्याग नहीं करना चाहिए।

भगवान बताते हैं कि मन पर विजय के दो साधन हैं—अभ्यास और वैराग्य

वैराग्य का अर्थ है—अनासक्ति। मन जिन विषयों में आसक्त रहता है, उसी दिशा में बार-बार भागता है। जब आसक्ति समाप्त होती है, तब मन की अनावश्यक भटकन भी समाप्त होने लगती है।

अभ्यास का अर्थ है—सतत, नियमित और दृढ़ प्रयास। नई श्रेष्ठ आदतों का निर्माण तथा पुरानी हानिकारक आदतों का परित्याग अभ्यास से ही संभव है। मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता का आधार अभ्यास ही है।

उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति पहली बार कंप्यूटर पर टाइप करना प्रारंभ करता है, तो वह एक-एक उंगली से बहुत धीमी गति से टाइप करता है। किंतु निरंतर अभ्यास के बाद वही व्यक्ति दोनों हाथों से सहजता और तीव्र गति से टाइप करने लगता है। यह दक्षता केवल अभ्यास का परिणाम है।

इसी प्रकार चंचल, बलवान और हठी मन को भी अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से भगवान के चरणों में स्थिर किया जा सकता है।

मन को संसार से हटाना—वैराग्य है।
मन को भगवान में स्थिर करना—अभ्यास है।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी भी अपने प्रवचनों में यही संदेश देते हैं—

“मन की अशांति को निरंतर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।”

इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने हजारों वर्ष पहले ही मानव जीवन में आने वाली मानसिक समस्याओं का पूर्वानुमान कर उनके समाधान भी भगवद्गीता के माध्यम से प्रदान कर दिए थे।

इसीलिए जिओ गीता का ध्येय-वाक्य है—

“समस्याओं का समाधान है गीता,
मानवता की मुस्कान है गीता।”

आइए, इस गीता जयंती पर संकल्प लें कि हम स्वयं गीता पढ़ेंगे और दूसरों को भी गीता पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे, क्योंकि—

“गीता के वचन चलते हैं—जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी।”

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