विजय की घोषणा से पहले उत्कृष्ट प्रदर्शन को ही विजय मान लेना कई बार निराशा का कारण बनता है
कर्मयोग का ज्ञान देने वाली श्रीमद्भगवद्गीता और उस ज्ञान का उपदेश देने वाले भगवान श्रीकृष्ण ही वास्तविक योगेश्वर हैं। महाभारत का महाभयंकर और महाविनाशकारी युद्ध भले ही कौरवों और पांडवों के बीच लड़ा गया हो, किंतु उसके वास्तविक महानायक श्रीकृष्ण ही हैं।
वास्तव में यह युद्ध किसी व्यक्ति-विशेष के विरोध का नहीं था, बल्कि धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य तथा नीति और कुटिलता के मध्य होने वाला महासंग्राम था। कौरव पक्ष की समस्त रणनीति का संचालन दुर्योधन का मामा शकुनि कर रहा था। श्रीकृष्ण उचित समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। समय आने पर उन्होंने गीता के दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया और अज्ञान, अंधकार, असत्य तथा अधर्म के बादल छँटने लगे।
गीता केवल कर्मयोग का सिद्धांत ही नहीं देती, बल्कि धैर्य और संयम का भी अनुपम संदेश देती है। महाभारत में अनेक ऐसे प्रसंग हैं जो इस सत्य को प्रमाणित करते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग यह सिखाता है कि विजय की औपचारिक पुष्टि से पहले केवल अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन को ही विजय मान लेना कई बार निराशा का कारण बन जाता है।
महाभारत युद्ध का अठारहवाँ दिन था। दुर्योधन की जाँघें टूट चुकी थीं और भीम की प्रतिज्ञा पूर्ण हो गई थी। कौरव सेना की अधिकांश शक्ति नष्ट हो चुकी थी। अठारह दिनों के भीषण युद्ध के बाद पांडव अत्यंत थक चुके थे। दुर्योधन को युद्ध करने में असमर्थ देखकर उन्होंने इसे अपनी विजय मान लिया और धीरे-धीरे अपने शिविर की ओर लौटने लगे।
कुछ ही दूरी पर पांडवों का शिविर दिखाई देने लगा। वहाँ सात्यकि ने उनका स्वागत किया, प्रणाम किया, विजय की बधाई दी और उनके अत्यधिक थके होने के कारण वहीं विश्राम करने का आग्रह किया।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण की ओर देखा। उन्हें लगा कि मानो भगवान कुछ कहना चाहते हैं, किंतु तब तक सभी अपने-अपने कक्षों की ओर बढ़ चुके थे।
रात्रिभोज के समय भी श्रीकृष्ण मौन रहे। उनके इस मौन ने युधिष्ठिर और अर्जुन दोनों को चिंतित कर दिया। अर्जुन ने कहा—
“मधुसूदन! आपने अभी तक हमारे ज्येष्ठ भ्राता को विजय की शुभकामनाएँ नहीं दीं। क्या अभी कुछ शेष है?”
भगवान मुस्कराए और बोले—
“हाँ पार्थ, अभी अठारहवें दिन के कुछ पहर शेष हैं।”
यह सुनकर भीम बोले—
“लेकिन शत्रुओं का सेनापति तो तालाब के किनारे पराजित पड़ा है। अब शेष ही क्या है?”
भीम के शब्दों में विजय का उत्साह ही नहीं, थोड़ा-सा अहंकार भी झलक रहा था।
श्रीकृष्ण ने गंभीर स्वर में कहा—
“हे गदाधारी! जब तक पूर्ण रूप से आश्वस्त न हो जाओ, विजय की घोषणा मत करो। स्मरण रखो, अभी तुम महाराज धृतराष्ट्र से नहीं मिले हो और उन्होंने अभी तक सिंहासन रिक्त नहीं किया है।”
अर्जुन ने पूछा—
“तो क्या हमें अभी इसी समय हस्तिनापुर जाना होगा?”
श्रीकृष्ण बोले—
“नहीं पार्थ। अभी तुम सब अपने शिविर में चलो।”
इस पर सात्यकि ने निवेदन किया—
“वासुदेव! युद्ध में अंतिम पड़ाव का भी अपना महत्व होता है। यदि पांडव बिना यहाँ विश्राम किए लौटते हैं तो यह उनके पीछे हटने जैसा प्रतीत होगा।”
सात्यकि का तर्क शास्त्रसम्मत था। सभी ने उसका समर्थन किया और अंततः श्रीकृष्ण की बात पर ध्यान नहीं दिया। सभी उसी शिविर में विश्राम करने चले गए।
रात्रि का प्रथम प्रहर बीतते ही द्रौपदी और सुभद्रा के करुण क्रंदन से समस्त कुरुक्षेत्र गूँज उठा। पांडव दौड़कर शिविर पहुँचे तो उनके पैरों तले भूमि खिसक गई। वहाँ पाँचों उपपांडवों तथा पांडव सेनापति धृष्टद्युम्न के सिर-कटे शव पड़े थे।
अब सबकी दृष्टि श्रीकृष्ण की ओर थी। वे मौन खड़े थे, मानो कह रहे हों—
“मैंने कहा था कि आज की रात अपने शिविर में मत ठहरो।”
पांडव दुर्योधन की पराजय को ही अंतिम विजय मान बैठे थे। उसी आत्मसंतोष का लाभ उठाकर अश्वत्थामा ने रात्रि में यह जघन्य कृत्य कर दिया।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन और अन्य पांडवों को संभाला। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा—
“विलाप मत कीजिए, भ्राताश्री। आइए, अब अश्वत्थामा को उसके कर्म का दंड देना होगा।”
इसके साथ ही उन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण शिक्षा दी—
“किसी भी कार्य या उद्देश्य की अंतिम परिणति तक धैर्य बनाए रखना चाहिए। वही धैर्य आपकी वास्तविक विजय का अंतिम प्रमाण होता है।”
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के 15वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण धैर्यवान पुरुष की महिमा बताते हैं—
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ (2.15)
अर्थात्—हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन! जिसे सुख और दुःख विचलित नहीं करते तथा जो दोनों परिस्थितियों में समभाव और धैर्य बनाए रखता है, वही अमृतत्व अर्थात् मोक्ष का अधिकारी बनता है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह, भारतीय कोकिला लता मंगेशकर तथा इस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन—इन सभी ने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, संयम और निरंतर कर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। यही धैर्य उन्हें अमरत्व के समान स्थायी सम्मान और यश का अधिकारी बनाता है।
