जैसे दूध में मक्खन है, उसी प्रकार भगवान भी सर्वत्र हैं
गीता के नौवें अध्याय के तीसरे श्लोक में भगवान कहते हैं—
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥ (भगवद्गीता 9.3)
अर्थात्— हे परंतप अर्जुन! जो लोग इस दिव्य धर्म में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे प्राप्त नहीं कर पाते और जन्म-मृत्यु के चक्र में बार-बार संसार में लौटते रहते हैं।
भगवान की प्रत्यक्ष अनुभूति तत्काल नहीं होती—यह बात हम सभी जानते हैं। इसलिए आध्यात्मिक यात्रा के प्रारंभ में अगाध श्रद्धा की आवश्यकता होती है। भक्ति-रसामृत-सिंधु में कहा गया है— “भगवान की अनुभूति का प्रथम पग श्रद्धा है।” श्रद्धा के बाद मनुष्य सत्संग की ओर अग्रसर होता है और फिर भक्ति के नियमित अभ्यास में प्रवृत्त होता है।
प्रायः लोग कहते हैं कि वे केवल उसी वस्तु पर विश्वास करेंगे जिसकी उन्हें प्रत्यक्ष अनुभूति हो। चूँकि भगवान की तत्काल प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं होती, इसलिए वे उन पर विश्वास नहीं करते। किंतु वास्तविकता यह है कि संसार में हम अनेक ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं, जिनका प्रत्यक्ष अनुभव हमें नहीं होता।
एक न्यायाधीश कई वर्ष पूर्व घटित घटना से संबंधित साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर निर्णय देता है। यदि वह केवल प्रत्यक्ष अनुभव को ही सत्य माने, तो पूरी न्याय-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाएगी। इसी प्रकार, किसी राष्ट्र का प्रमुख पूरे देश का शासन विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर चलाता है। उसके लिए प्रत्येक गाँव और नगर का स्वयं जाकर निरीक्षण करना संभव नहीं होता। यदि वह यह कहकर सभी सूचनाओं को अस्वीकार कर दे कि उसे उनका प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है, तो वह शासन ही नहीं कर सकेगा। स्पष्ट है कि सांसारिक जीवन में भी प्रत्येक कदम पर विश्वास आवश्यक है। बाइबिल में भी कहा गया है— “हम दृष्टि से नहीं, विश्वास से चलते हैं।”
भगवान की अनुभूति से संबंधित एक प्रसिद्ध कथा है। एक बार एक राजा ने एक साधु से कहा— “मैं भगवान में विश्वास नहीं करता, क्योंकि मैंने उन्हें देखा नहीं है।”
साधु ने राजा से दरबार में एक गाय मँगाने को कहा। गाय लाई गई और उसका दूध दुहा गया। तब साधु ने पूछा— “हे राजन्! क्या इस ताज़े दूध में मक्खन है?”
राजा ने उत्तर दिया— “निश्चय ही है।”
साधु ने पूछा— “जब तुमने मक्खन को देखा नहीं, तब तुम्हें यह विश्वास कैसे है कि वह इसमें है?”
राजा ने कहा— “यद्यपि अभी मक्खन दिखाई नहीं दे रहा, पर वह दूध में विद्यमान है। उसे प्राप्त करने की एक प्रक्रिया है। पहले दूध को दही बनाया जाता है, फिर दही का मंथन करने पर मक्खन प्रकट हो जाता है।”
तब साधु मुस्कराए और बोले— “जैसे दूध में मक्खन विद्यमान रहता है, उसी प्रकार भगवान भी समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं। यदि उनकी तत्काल अनुभूति नहीं होती, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे नहीं हैं। उनकी अनुभूति की भी एक निश्चित प्रक्रिया है। यदि श्रद्धा के साथ उस प्रक्रिया का पालन किया जाए, तो भगवान का प्रत्यक्ष अनुभव संभव है और मनुष्य भगवद्प्राप्ति कर सकता है।”
भगवान में विश्वास करना मनुष्य के लिए सहज नहीं होता। इसके लिए अपनी स्वतंत्र इच्छा का सदुपयोग करते हुए सचेत रूप से श्रद्धा का निर्णय लेना पड़ता है।
महाभारत में जब कौरव सभा में दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी साड़ी को अनंत कर उसकी लाज की रक्षा की। उस समय समस्त कौरव इस चमत्कार के साक्षी थे, फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण की सर्वशक्तिमत्ता को स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप उनकी चेतना जागृत नहीं हुई।
इसीलिए भगवान इस श्लोक में स्पष्ट कहते हैं कि जो लोग आध्यात्मिक मार्ग में श्रद्धा नहीं रखते, वे दिव्य ज्ञान से वंचित रह जाते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकते रहते हैं।
कहा भी गया है— “श्रद्धा विष को भी अमृत बना देती है।”
संत मीराबाई का जीवन इसका अद्भुत उदाहरण है। पति के निधन के बाद जब उनके ससुराल वालों ने उन्हें सती होने के लिए कहा, तब मीरा ने उत्तर दिया— “मेरे पति तो श्रीकृष्ण हैं।” वे पहले की तरह मंदिर जाती रहीं, भजन गाती रहीं और कृष्ण-भक्ति में नृत्य करती रहीं। इससे क्रोधित होकर उनके विरोधियों ने उन पर अनेक आरोप लगाए और अंततः उन्हें विष का प्याला पीने के लिए दिया।
मीरा ने पूर्ण श्रद्धा के साथ श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए विषपान कर लिया। सबको लगा कि अब उनका जीवन समाप्त हो जाएगा, किंतु भगवान की कृपा और उनकी अटूट श्रद्धा के कारण वह विष अमृत बन गया। विष उनका कुछ भी बिगाड़ न सका।
पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे।
मैं तो मेरे नारायण की, आप ही हो गई दासी रे॥
लोग कहें मीरा भई बावरी, न्यात कहे कुलनाशी रे।
विष का प्याला राणाजी भेज्या, पीवत मीरा हाँसी रे॥
‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, सहज मिले अविनाशी रे॥
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि श्रद्धा केवल विश्वास नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो साधक को भगवान की अनुभूति तक पहुँचा देती है।
