भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। भगवान विष्णु ने ही त्रेतायुग में श्रीराम के रूप में तथा द्वापरयुग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियाँ थीं। उनमें से रानी सत्यभामा को अपने सौंदर्य और महारानी होने का बड़ा अभिमान था। दूसरी ओर सुदर्शन चक्र स्वयं को संसार का सबसे शक्तिशाली अस्त्र मानता था और भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को अपनी तीव्र गति पर गर्व था।
एक दिन श्रीकृष्ण द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समीप गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी सेवा में उपस्थित थे। बातचीत के दौरान रानी सत्यभामा ने व्यंग्यपूर्ण स्वर में पूछा, “हे प्रभु! आपने त्रेतायुग में श्रीराम के रूप में अवतार लिया था और माता सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी अधिक सुंदर थीं?”
भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा के प्रश्न का उत्तर देते, उससे पहले ही गरुड़ बोल उठे, “प्रभु! क्या संसार में मुझसे भी अधिक वेग से उड़ने वाला कोई है?” तभी सुदर्शन चक्र भी अपने अभिमान को रोक न सका। उसने कहा, “भगवान! मैंने अनेक युद्धों में आपको विजय दिलाई है। क्या संसार में मुझसे अधिक शक्तिशाली कोई और भी है?”
द्वारकाधीश समझ गए कि तीनों के मन में अहंकार उत्पन्न हो गया है। वे मंद-मंद मुस्कुराने लगे और सोचने लगे कि इनके अभिमान का निवारण कैसे किया जाए। तभी उन्हें एक युक्ति सूझी। वे जानते थे कि अब इनके अहंकार को दूर करने का समय आ गया है।
उन्होंने गरुड़ से कहा, “हे गरुड़! तुम हनुमानजी के पास जाओ और उनसे कहना कि भगवान श्रीराम माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
भगवान की आज्ञा पाकर गरुड़ तत्काल हनुमानजी को बुलाने चल पड़े।
इधर श्रीकृष्ण ने रानी सत्यभामा से कहा, “देवी! आप माता सीता का रूप धारण कर लीजिए।” स्वयं श्रीकृष्ण ने भगवान श्रीराम का स्वरूप धारण कर लिया।
इसके बाद उन्होंने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया, “तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो। ध्यान रहे, मेरी अनुमति के बिना कोई भी भीतर प्रवेश न करे।”
सुदर्शन चक्र ने कहा, “जैसी आज्ञा, प्रभु।” और वह महल के प्रवेश द्वार पर पहरा देने के लिए तैनात हो गया।
उधर गरुड़ हनुमानजी के पास पहुँचे और बोले, “हे वानरश्रेष्ठ! भगवान श्रीराम माता सीता के साथ द्वारका में आपका इंतजार कर रहे हैं। मुझे आपको वहाँ ले जाने की आज्ञा मिली है। आइए, मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहाँ पहुँचा देता हूँ।”
हनुमानजी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “बंधु! आप चलिए, मैं अभी आता हूँ।”
गरुड़ ने मन ही मन सोचा, “यह वृद्ध वानर न जाने कब पहुँचेगा। मेरा कार्य तो पूरा हो गया।” ऐसा सोचकर वे तीव्र गति से द्वारका लौट आए।
किन्तु महल पहुँचकर वे आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने देखा कि हनुमानजी तो उनसे पहले ही वहाँ पहुँचकर भगवान के समक्ष विराजमान हैं। यह देखकर गरुड़ का सिर लज्जा से झुक गया।
तभी श्रीराम के रूप में विराजमान श्रीकृष्ण ने हनुमानजी से पूछा, “पवनपुत्र! तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें प्रवेश द्वार पर किसी ने रोका नहीं?”
हनुमानजी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और अपने मुख से सुदर्शन चक्र को निकालकर भगवान के चरणों में रख दिया। उन्होंने विनम्रता से कहा, “प्रभु! आपसे मिलने से मुझे कौन रोक सकता है? इस चक्र ने मुझे रोकने का थोड़ा-सा प्रयास किया था, इसलिए इसे अपने मुख में रखकर मैं आपके दर्शन के लिए चला आया। यदि मुझसे कोई अपराध हुआ हो तो मुझे क्षमा करें।”
भगवान श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुराने लगे।
कुछ देर बाद हनुमानजी ने श्रीराम से कहा, “प्रभु! मैं आपको भली-भाँति पहचानता हूँ। आप ही श्रीकृष्ण के रूप में मेरे आराध्य श्रीराम हैं। किन्तु आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को अपने साथ सिंहासन पर बैठने का सम्मान दे दिया है?”
हनुमानजी के ये वचन सुनते ही रानी सत्यभामा का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया। उन्हें अपने सौंदर्य का जो गर्व था, वह एक क्षण में समाप्त हो गया। सुदर्शन चक्र और गरुड़ का अहंकार भी पूरी तरह नष्ट हो गया। तीनों भगवान की लीला को समझ चुके थे। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में नतमस्तक हो गए।
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम भक्त हनुमानजी के माध्यम से सत्यभामा, गरुड़ और सुदर्शन चक्र—तीनों का अहंकार दूर कर उन्हें विनम्रता का अमूल्य पाठ पढ़ाया।
दूसरा प्रसंग अर्जुन से जुड़ा है। आनंद रामायण में वर्णन मिलता है कि अर्जुन के रथ पर हनुमानजी के विराजमान होने के पीछे भी एक विशेष कारण था।
एक बार रामेश्वरम् तीर्थ में अर्जुन का हनुमानजी से मिलन हुआ। बातचीत के दौरान अर्जुन ने पूछा, “आप तो श्रीराम और रावण के युद्ध के समय उपस्थित थे?”
हनुमानजी ने उत्तर दिया, “हाँ।”
तब अर्जुन ने कहा, “आपके स्वामी श्रीराम महान धनुर्धर थे। फिर उन्हें समुद्र पार करने के लिए पत्थरों का सेतु बनवाने की क्या आवश्यकता थी? यदि मैं उस समय वहाँ होता, तो बाणों का ऐसा सेतु बना देता जिस पर आपका पूरा वानर दल आसानी से समुद्र पार कर लेता।”
हनुमानजी मुस्कुराकर बोले, “यह असंभव है। बाणों का सेतु हमारे वानर दल का भार नहीं सह सकता था। यदि एक भी वानर उस पर चढ़ता, तो वह तत्काल टूट जाता।”
अर्जुन ने आत्मविश्वास से कहा, “नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। सामने जो सरोवर है, मैं उस पर बाणों का सेतु बनाता हूँ। आप उस पर चलकर इसे पार कर लीजिए।”
हनुमानजी ने फिर कहा, “यह संभव नहीं है।”
तब अर्जुन ने प्रतिज्ञा की, “यदि आपके चलने से मेरा बनाया हुआ सेतु टूट गया, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दूँगा। और यदि सेतु नहीं टूटा, तो आपको अग्नि में प्रवेश करना होगा।”
हनुमानजी ने शांत भाव से कहा, “मुझे यह शर्त स्वीकार है। यदि मेरा भार यह सेतु सहन कर लेगा, तो मैं अपनी पराजय स्वीकार कर लूँगा।”
इसके बाद अर्जुन ने अपने दिव्य बाणों से एक सुदृढ़ सेतु का निर्माण किया। जब तक सेतु बन रहा था, तब तक हनुमानजी अपने लघु रूप में रहे। किंतु जैसे ही सेतु तैयार हुआ, उन्होंने अपना विराट स्वरूप धारण कर लिया।
श्रीराम का स्मरण करते हुए हनुमानजी उस बाणों के सेतु पर चढ़े। पहला चरण रखते ही सेतु डगमगाने लगा। दूसरा चरण रखते ही वह चरमराने लगा और जैसे ही तीसरा चरण रखा, सरोवर का जल रक्त से लाल हो गया।
यह देखकर हनुमानजी तुरंत सेतु से नीचे उतर आए और अर्जुन से बोले, “अब अग्नि की व्यवस्था करो।”
अग्नि प्रज्वलित की गई। जैसे ही हनुमानजी अग्नि में प्रवेश करने लगे, उसी समय भगवान श्रीकृष्ण वहाँ प्रकट हो गए और बोले, “ठहरो!”
अर्जुन और हनुमानजी ने भगवान को प्रणाम किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त घटना का रहस्य बताते हुए कहा, “हे हनुमान! जब आपने तीसरा चरण सेतु पर रखा, तब मैं कच्छप (कछुए) का रूप धारण करके सेतु के नीचे लेटा हुआ था। आपके चरणों के भार से मेरे उस कच्छप रूप से रक्त निकलने लगा। यदि मैं सेतु के नीचे न होता, तो वह पहले ही चरण में टूट जाता।”
यह सुनकर हनुमानजी अत्यंत व्यथित हो गए। उन्होंने भगवान से क्षमा माँगते हुए कहा, “प्रभु! मुझसे तो बड़ा अपराध हो गया। मैंने आपकी पीठ पर ही पैर रख दिया। इस अपराध का प्रायश्चित कैसे होगा?”
भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “हनुमान! यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है। तुम मन को खिन्न मत करो। मेरी इच्छा है कि आगामी महाभारत युद्ध में तुम अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान होकर उसकी रक्षा करो।”
इसी कारण द्वापर युग में महाभारत युद्ध के समय हनुमानजी अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान रहे। श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के बीसवें श्लोक में अर्जुन को ‘कपिध्वज’ कहा गया है—
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥ (गीता 1.20)
अर्थात् हनुमान-चिह्न वाली ध्वजा से सुशोभित रथ पर आरूढ़ पाण्डुपुत्र अर्जुन युद्ध के लिए अपना धनुष उठाते हैं।
महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथि बनकर उसका मार्गदर्शन किया, जबकि हनुमानजी उसके अदृश्य रक्षक बने रहे। मान्यता है कि युद्ध के दौरान अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रभाव हनुमानजी ने अपनी उपस्थिति से निष्फल कर दिया।
युद्ध समाप्त होने पर भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन को रथ से उतरने के लिए कहा। उसके बाद स्वयं रथ से उतरे और हनुमानजी को भी ध्वजा से प्रस्थान करने का संकेत दिया। जैसे ही हनुमानजी ध्वजा से प्रस्थान कर गए और श्रीकृष्ण रथ से उतरे, उसी क्षण वह रथ दिव्य अस्त्रों के प्रभाव से जलकर भस्म हो गया।
आश्चर्यचकित अर्जुन से भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “युद्ध के दौरान यह रथ अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रहार सह चुका था। हनुमानजी की उपस्थिति और मेरी कृपा के कारण ही यह अब तक सुरक्षित था।”
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान अपने भक्तों से किया हुआ वचन अवश्य निभाते हैं। अर्जुन तो केवल माध्यम थे; वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण को अपने परम भक्त हनुमानजी से किया हुआ वचन निभाना था।
अंत में हनुमानजी से यही प्रार्थना है—
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल, बुद्धि, विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥
