(भाग–दो)
भावनात्मक बुद्धिमत्ता का सजीव कोश है भगवद्गीता
(भाग–दो)
आत्म-नियमन या भावनात्मक आत्म-नियंत्रण
आत्म-नियमन किसी भी व्यक्ति की अपनी भावनाओं, विचारों और व्यवहार को इस प्रकार संचालित करने की क्षमता है, जिससे सकारात्मक परिणाम प्राप्त हों। इसमें आवेगपूर्ण अथवा विनाशकारी प्रतिक्रियाओं को पहचानकर उन पर नियंत्रण रखना तथा उनके स्थान पर विवेकपूर्ण और सोच-समझकर कार्य करना सम्मिलित है।
भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के पंद्रहवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण वाणी के संयम का भी उपदेश देते हैं—
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ (गीता 17.15)
अर्थात् जो वाणी किसी को उद्विग्न न करे, सत्य हो, प्रिय एवं हितकारी हो तथा स्वाध्याय का अभ्यास भी हो, वही वाणी का तप कहलाता है।
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं असाधारण आत्म-नियंत्रण के प्रतीक थे। वे अपनी भावनाओं, वाणी और व्यवहार को अपने उद्देश्यों के अनुरूप नियंत्रित रखते थे। वे अर्जुन को भी अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए एक योद्धा के रूप में अपने कर्तव्य पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं—
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥ (गीता 5.12)
अर्थात् कर्मयोगी कर्मफल का त्याग करके परम शांति प्राप्त करता है, जबकि फल की आसक्ति रखने वाला व्यक्ति बंधन में पड़ जाता है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण का आत्म-नियंत्रण ही उन्हें युद्धभूमि जैसी विषम परिस्थितियों में भी शांत, संतुलित और लक्ष्य-केंद्रित बनाए रखता है। यही कारण है कि युद्धभूमि में प्रदत्त होने के बावजूद भगवद्गीता संपूर्ण मानवता को शांति, सद्भाव, समरसता और सकारात्मकता का संदेश देती है।
भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में आत्म-नियमन के अनेक उदाहरण मिलते हैं। महाभारत में राजसूय यज्ञ के अवसर पर शिशुपाल बार-बार सार्वजनिक रूप से उनका अपमान करता है। श्रीकृष्ण जानते हुए भी कि शिशुपाल को सौ अपराधों तक क्षमा करने का वचन दिया गया है, पूर्ण धैर्य और संयम बनाए रखते हैं। जब वह मर्यादा की सीमा पार कर देता है, तभी वे न्यायोचित कार्रवाई करते हैं। यह उनकी भावनात्मक परिपक्वता और आत्म-संयम का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इसी प्रकार, जब अर्जुन विषाद, मोह और भ्रम से व्याकुल हो जाता है, तब श्रीकृष्ण स्वयं विचलित नहीं होते। वे धैर्यपूर्वक उसके प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देते हैं और उसे उसके स्वधर्म, कर्तव्य तथा जीवन के उद्देश्य का बोध कराते हैं। उनका शांत, संतुलित और करुणामय संवाद अर्जुन के भीतर आत्मविश्वास और साहस का संचार करता है।
श्रीकृष्ण का आत्म-नियमन केवल व्यक्तिगत व्यवहार तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व में भी स्पष्ट दिखाई देता है। वे अपनी भावनाओं को समाजहित के अनुरूप संतुलित रखते थे तथा संवाद के माध्यम से विश्वास और सहयोग का वातावरण निर्मित करते थे।
महाभारत युद्ध से पूर्व उन्होंने पांडवों और कौरवों के बीच शांति स्थापित करने का अंतिम प्रयास किया। वे स्वयं हस्तिनापुर की राजसभा में संधि-प्रस्ताव लेकर गए। इस प्रसंग का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ में किया है—
मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को।
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को।
भगवान हस्तिनापुर आए,
पांडव का संदेशा लाए।
दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो।
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रखो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खाएँगे,
परिजन पर असि न उठाएँगे।
किन्तु दुर्योधन ने शांति का यह प्रस्ताव भी अस्वीकार कर दिया। तब कवि लिखते हैं—
दुर्योधन वह भी दे न सका,
आशीष समाज की ले न सका।
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।
जब दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास किया, तब उन्होंने अपना विराट स्वरूप प्रकट कर दिया और उसे चेताया—
हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना।
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अंतिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।
यह प्रसंग दर्शाता है कि श्रीकृष्ण ने पहले संवाद, धैर्य, सहिष्णुता और शांति के सभी मार्ग अपनाए। जब अहंकारवश दुर्योधन ने उन्हें अस्वीकार कर दिया, तभी उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ निर्णय लिया। यही आत्म-नियमन का अनूठा, अनुपम और अद्वितीय उदाहरण है।
इसीलिए कहा जा सकता है कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता का सजीव कोश है भगवद्गीता।
