भाग–3 : सहानुभूति (Empathy)
सहानुभूति
सहानुभूति दूसरों की भावनाओं को समझने और उन्हें अनुभव करने की क्षमता है। इसमें दूसरे व्यक्ति की भावनाओं और अनुभवों को समझना, उनसे तादात्म्य स्थापित करना तथा इस प्रकार प्रतिक्रिया देना शामिल है, जिससे उसके प्रति संवेदना, देखभाल और चिंता का भाव प्रकट हो।
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में दूसरों के प्रति उच्चतम स्तर की सहानुभूति का परिचय दिया। वे प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियों, मनःस्थिति और दृष्टिकोण को गहराई से समझते थे। महाभारत में वे कर्ण के प्रति भी गहरी सहानुभूति रखते हैं। कर्ण जन्म के समय परित्यक्त हुआ, सामाजिक उपेक्षा और जातिगत भेदभाव का सामना करता रहा, फिर भी वह अद्वितीय पराक्रम का धनी था। श्रीकृष्ण उसकी वीरता और प्रतिभा का सम्मान करते हैं तथा उसे उचित मार्ग अपनाने का आग्रह करते हैं, जबकि वह पांडवों के विरोध में युद्ध कर रहा होता है।
कौरवों की सभा में शांति-प्रस्ताव अस्वीकार होने और स्वयं अपमानित होने के बाद श्रीकृष्ण तथा कर्ण के बीच जो संवाद होता है, वह भावनात्मक बुद्धिमत्ता की पराकाष्ठा का उदाहरण है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने रश्मिरथी में इस प्रसंग का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है—
भगवान सभा को छोड़ चले,
करके रण-गर्जन घोर चले।
सामने कर्ण सकुचाया-सा,
आ मिला चकित, भरमाया-सा।
हरि बड़े प्रेम से कर धरकर,
ले चढ़े उसे अपने रथ पर।
रथ चला, परस्पर बात चली,
शम-दम की टेढ़ी घात चली।
शीतल हो हरि ने कहा—
“हाय! अब शेष नहीं कोई उपाय।”
विचार कीजिए, जिस व्यक्ति का अभी-अभी सार्वजनिक रूप से अपमान हुआ हो, वही व्यक्ति अपमान करने वालों के पक्ष के एक प्रमुख योद्धा को प्रेमपूर्वक अपने रथ पर बैठाकर उससे आत्मीय संवाद करे—यह केवल भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य व्यक्तित्व में ही संभव है। यही उनकी सहानुभूति और भावनात्मक परिपक्वता का सर्वोच्च उदाहरण है।
भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रति इसी सहानुभूति का परिचय देते हैं। जब अर्जुन युद्धभूमि में अपने कर्तव्य को लेकर मोह, विषाद और भ्रम से व्याकुल हो जाता है, तब श्रीकृष्ण उसकी भावनाओं को न तो तुच्छ समझते हैं और न ही उन्हें अनदेखा करते हैं। वे धैर्यपूर्वक उसकी प्रत्येक जिज्ञासा सुनते हैं और उसे आत्मबोध की ओर अग्रसर करते हैं। परिणामस्वरूप अर्जुन की यात्रा—
“सीदन्ति मम गात्राणि, मुखं च परिशुष्यति…” (गीता 1.29)
से प्रारम्भ होकर अंततः—
“नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥” (गीता 18.73)
तक पहुँचती है। यह परिवर्तन केवल उपदेश से नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की गहन सहानुभूति, धैर्य और करुणा से संभव हुआ।
श्रीकृष्ण अपने व्यक्तिगत संबंधों में भी सहानुभूति का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जब उनके बालसखा सुदामा अत्यंत निर्धन अवस्था में उनसे मिलने द्वारका पहुँचते हैं, तब श्रीकृष्ण राजसी वैभव का त्याग कर उन्हें स्नेहपूर्वक गले लगाते हैं, अपने समीप आसन देते हैं और उनके चरण धोते हैं। कवि ने इस प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया है—
सुनते ही दौड़े चले आए मोहन,
लगाया गले से सुदामा को मोहन।
और बराबर पे अपने सुदामा बिठाए,
चरण आँसुओं से श्याम ने धुलाए।
न घबराओ प्यारे ज़रा तुम सुदामा,
खुशी का समाँ तेरे करीब आ गया है।
एक सम्राट का अपने निर्धन मित्र को गले लगाना, अपने समान आसन देना और उसके चरणों को अपने आँसुओं से धोना केवल उस युग के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मित्रता, विनम्रता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का अनुपम संदेश है।
इसी प्रकार, जब पांडवों को राज्य से वनवास दिया जाता है, तब श्रीकृष्ण हर परिस्थिति में उनके साथ खड़े रहते हैं। वे उन्हें मार्गदर्शन, संरक्षण और नैतिक बल प्रदान करते हैं तथा कौरवों के साथ उनके संघर्ष में निरंतर मध्यस्थता और शांति-स्थापना का प्रयास करते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण की सहानुभूति केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं थी, बल्कि समस्त प्राणी-जगत तक विस्तृत थी। वे गौ-सेवा, पशु-प्रेम और प्रकृति के संरक्षण के लिए भी विख्यात हैं। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज कहते हैं कि गौओं के प्रति उनके विशेष स्नेह के कारण ही उन्हें “गोविन्द” कहा गया। गोवर्धन पर्वत धारण करके उन्होंने गोपों, गोपियों और गौधन की रक्षा की। इन्द्र का अभिमान भंग होने के पश्चात् इन्द्र और कामधेनु ने ही उन्हें “गोविन्द” की उपाधि से विभूषित किया।
‘गो’ शब्द के तीन प्रमुख अर्थ बताए गए हैं—इन्द्रियाँ, गाय और पृथ्वी। श्रीकृष्ण इन तीनों को आनंद प्रदान करते हैं; इसलिए वे गोविन्द कहलाते हैं।
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥
श्रीरामचरितमानस में भी भगवान के अवतार का उद्देश्य स्पष्ट किया गया है—
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥
भगवान श्रीकृष्ण “सर्वभूतहिते रताः” और समदर्शी हैं। वे समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए मानव रूप में अवतरित होते हैं और अपनी दिव्य लीलाओं के माध्यम से मानवता को करुणा, सहानुभूति और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का अमूल्य संदेश प्रदान करते हैं। इसी कारण भगवद्गीता केवल आध्यात्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता का भी सजीव कोश है।
