भारत में अभी-अभी चुनाव सम्पन्न हुए हैं। चुनाव लोकतंत्र का मुख्य आधार हैं। वे केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिकों की भागीदारी और उत्तरदायित्व का सबसे सशक्त माध्यम हैं। चुनाव प्रत्येक योग्य नागरिक को अपने प्रतिनिधि का चयन करने का अवसर प्रदान करते हैं। यह अवसर केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में सहभागी बनने का भी माध्यम है।
इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव नागरिकों के कंधों पर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हैं। जब कोई व्यक्ति मतदान का अधिकार प्राप्त करता है, तो उसे अपनी शक्ति और उत्तरदायित्व का भी बोध होता है। वह समझता है कि उसका एक मत देश की दिशा और दशा निर्धारित करने में योगदान दे सकता है। इसलिए यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम बिना किसी बाहरी दबाव, प्रलोभन, भय, जाति, संप्रदाय, धर्म या व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रभावित हुए, अपने विवेक के आधार पर मतदान करें।
संभवतः इसी उद्देश्य से आदर्श चुनाव आचार संहिता के अंतर्गत मतदान से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार बंद कर दिया जाता है। यह समय मतदाताओं को शांत वातावरण में विचार करने का अवसर देता है। इस अवधि में वे सभी प्रत्याशियों की बात सुनने के बाद निष्पक्ष मन से अपने विवेक के अनुसार निर्णय ले सकते हैं। चुनाव प्रक्रिया के निर्माताओं की यह दूरदर्शिता वास्तव में प्रशंसनीय है कि उन्होंने ऐसी व्यवस्था बनाई, जिसमें चुनावी शोर-शराबे और प्रचार से दूर होकर मतदाता अपनी स्वतंत्र इच्छा के अनुसार अपना निर्णय कर सके।
हमारे पूजनीय ग्रंथ रामायण और महाभारत भी स्वतंत्र एवं विवेकपूर्ण निर्णय लेने की प्रेरणा देते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में अर्जुन को परम गुह्य ज्ञान प्रदान करने के पश्चात भी भगवान श्रीकृष्ण अपना निर्णय उस पर नहीं थोपते। वे कहते हैं—
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ (गीता 18.63)
अर्थ— मैंने तुम्हें अत्यंत गूढ़ ज्ञान कह दिया है। अब तुम इस पर भली-भाँति विचार करके, जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो।
भगवान श्रीराम ने भी अयोध्यावासियों को यही संदेश दिया। रामचरितमानस में वर्णन है—
एक बार रघुनाथ बोलाए।
गुरु द्विज पुरबासी सब आए।।
अर्थात् भगवान श्रीराम ने एक बार गुरु वशिष्ठ, ब्राह्मणों तथा अयोध्यावासियों को बुलाकर उन्हें जीवन का उद्देश्य और धर्म का मार्ग समझाया। उपदेश के अंत में उन्होंने कहा—
नहि अनीति नहि कछु प्रभुताई।
सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।
अर्थात् मैंने जो उपदेश दिया है, वह न तो अन्यायपूर्ण है और न ही किसी प्रकार का दबाव है। इसे ध्यानपूर्वक सुनो, इस पर विचार करो और फिर जो तुम्हें उचित लगे, वही करो।
यही भगवान द्वारा जीवात्मा को प्रदान की गई स्वतंत्र इच्छा (Free Will) का स्वरूप है। मनुष्य को विकल्प चुनने की स्वतंत्रता प्राप्त है, यद्यपि यह स्वतंत्रता पूर्णतः असीम नहीं है। कोई व्यक्ति केवल इच्छा करने मात्र से यह निर्णय नहीं कर सकता कि वह संसार का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति बन जाएगा। हमारे वर्तमान और पूर्व जन्मों के संस्कार, कर्म तथा परिस्थितियाँ हमारे विकल्पों की कुछ सीमाएँ निर्धारित करती हैं। फिर भी उन सीमाओं के भीतर मनुष्य स्वतंत्र है, क्योंकि वह भगवान के हाथों की कठपुतली या कोई यंत्र नहीं है।
अनेक लोग प्रश्न करते हैं कि यदि भगवान हमें स्वतंत्र इच्छा न देते, तो हम कोई बुरा कार्य नहीं करते। किंतु तब हम कोई अच्छा कार्य भी नहीं कर पाते। जहाँ अच्छे कर्म की संभावना होती है, वहीं गलत निर्णय का जोखिम भी रहता है।
सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि भगवान चाहते हैं कि जीव उनसे प्रेम करे। किंतु प्रेम कभी बाध्यता से उत्पन्न नहीं होता; प्रेम तभी संभव है, जब चयन का विकल्प हो। कोई मशीन प्रेम नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पास स्वतंत्र इच्छा नहीं होती। सर्वव्यापी भगवान ने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा और अनेक विकल्प इसलिए दिए हैं कि वह अपने विवेक से सत्य, धर्म और अंततः भगवान का चयन करे तथा अपने प्रेम को स्वेच्छा से उन्हें समर्पित करे।
सर्वशक्तिमान भगवान किसी जीवात्मा को अपनी शरण में आने के लिए बाध्य नहीं करते। यह निर्णय प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं लेना होता है। इसी कारण गीता के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान उसकी स्वतंत्र इच्छा की ओर आकर्षित करते हैं और उसे अपने विवेक से उचित विकल्प चुनने की प्रेरणा देते हैं।
