भगवद्गीता का अत्यंत चर्चित, प्रसिद्ध, चिंतनशील एवं अनुकरणीय श्लोक दूसरे अध्याय का 47वाँ श्लोक है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
लगभग सभी भारतीय तथा गीता का सामान्य परिचय रखने वाले विदेशी भी इस श्लोक से भली-भाँति परिचित हैं। यह श्लोक कर्म को निष्काम भाव से करने की अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
इस श्लोक में कर्मयोग के संबंध में चार महत्वपूर्ण उपदेश दिए गए हैं—
अपना कर्म करो, पर उसके फल की चिंता मत करो।
कर्म का फल केवल तुम्हारे व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है; तुम उसके भोक्ता नहीं हो।
कर्म करते समय कर्ता होने का अहंकार मत करो।
अकर्मण्यता (निष्क्रियता) में आसक्ति मत रखो।
कर्म करो, पर फल की चिंता मत करो
हमें कर्म करने का अधिकार है, पर उसका फल केवल हमारे प्रयासों पर निर्भर नहीं होता। परिणाम के निर्धारण में हमारे प्रयत्न, पूर्वकर्म (भाग्य), भगवान की इच्छा, अन्य लोगों के प्रयास, संबंधित व्यक्तियों के कर्म, स्थान, समय और परिस्थितियों जैसे अनेक तत्त्व कार्य करते हैं।
यदि हम परिणाम को लेकर अत्यधिक चिंतित रहते हैं और परिणाम हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं मिलता, तो हम तनावग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को फल की चिंता छोड़कर शुभ कर्म पर ध्यान केंद्रित करने का उपदेश देते हैं।
वास्तव में जब हम परिणाम की चिंता छोड़ देते हैं, तब हम अपने प्रयासों पर पूर्ण एकाग्रता से ध्यान दे पाते हैं और कार्य की गुणवत्ता पहले से अधिक उत्तम हो जाती है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। जब लोग कबड्डी खेलते हैं, तो वे प्रायः अंक और जीत-हार में उलझ जाते हैं। यदि वे केवल अपनी क्षमता के अनुसार श्रेष्ठ खेल खेलने पर ध्यान दें, तो उन्हें खेल का वास्तविक आनंद और रोमांच अनुभव होगा। साथ ही, प्रत्येक दाँव पर एकाग्रता बढ़ने से उनका खेल भी अधिक उत्कृष्ट होता जाएगा।
कर्मों का फल भगवान के लिए है
कर्म करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। जन्म के साथ ही परिवार, समाज, शिक्षा और व्यवसाय के अनुसार अनेक प्रकार के कर्तव्य हमारे सामने आते हैं। इनका पालन करते समय यह स्मरण रखना चाहिए कि कर्मों के फल के वास्तविक स्वामी भगवान हैं।
गीता के अनुसार मनुष्य भगवान का अंश है और उसका स्वाभाविक धर्म भगवान की सेवा करना है। सांसारिक दृष्टि कहती है—“मैं इन वस्तुओं का स्वामी हूँ; ये सब मेरे सुख के लिए हैं; मुझे अपनी प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य बढ़ाने का अधिकार है।”
इसके विपरीत आध्यात्मिक चेतना कहती है—
भगवान ही समस्त सुख और ऐश्वर्य के स्वामी हैं, और मैं उनका निष्काम सेवक हूँ। मेरे पास जो कुछ भी है, वह उनकी सेवा में समर्पित करने योग्य है।
इसी भाव से श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह स्वयं को कर्मों के फल का भोक्ता न माने।
कर्ता होने का अहंकार न करो
श्रीकृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन कृताभिमान—अर्थात “मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ”—इस अहंकार का त्याग करे। वे उसे समझाते हैं कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने आप में जड़ हैं। जब भगवान इनमें शक्ति का संचार करते हैं, तभी वे कार्य करने में सक्षम होते हैं।
उदाहरण के लिए, रसोईघर में रखा चिमटा स्वयं कुछ नहीं कर सकता। किसी व्यक्ति के हाथ में आने पर ही वह जलते कोयले को उठाने जैसे कार्य करता है। वास्तव में कार्य करने की शक्ति हाथ से आती है, चिमटे से नहीं।
उसी प्रकार यदि भगवान शरीर, मन और बुद्धि को शक्ति न दें, तो मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। अतः हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम केवल निमित्त हैं; वास्तविक शक्ति का स्रोत परमेश्वर ही हैं।
अकर्मण्यता में आसक्ति मत रखो
कर्म करना मनुष्य का स्वभाव है, फिर भी कई बार परिस्थितियाँ ऐसी हो जाती हैं जब कार्य कठिन, बोझिल या उलझनपूर्ण प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में कार्य से भागना समाधान नहीं है।
श्रीकृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी कर्मयोग के सिद्धांत के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं कि निष्क्रियता के प्रति आसक्ति किसी भी समस्या का समाधान नहीं कर सकती, और भगवान श्रीकृष्ण इसकी स्पष्ट निंदा करते हैं।
अंत में वे कहते हैं—
कर्म पर ही तेरा अधिकार है, नहीं जग में तेरा कोई कारोबार है। कर्म वही श्रेष्ठ है जिसमें फल की ख्वाहिश न हो, कर्म वही पवित्र है जिसमें किसी प्रकार की नुमाइश न हो।
