जीवन के बेसुरेपन को सुरीला बनाते हैं गीता के सप्त स्वर।

जिज्ञासा के प्रथम स्वर की ध्वनि के गूँजायमान होते ही भीतर और बाहर का स्वर स्पष्ट, सात्त्विक और पवित्र हो जाता है। जिज्ञासा का स्वर जितना ऊँचा उठता है, आत्मसमर्पण का राग उतना ही अधिक प्रतिध्वनित होने लगता है। पवित्र और अविचल जिज्ञासा का फल श्रद्धा है। श्रद्धा ज्ञान का द्वार है, ज्ञान की जननी है। यही श्रद्धा और प्रेम की वह डोर है जो परमेश्वर को भी बाँध लेती है। इसी डोर से शबरी, मीरा, चैतन्य महाप्रभु, भक्त धन्ना, तुकाराम, एकनाथ और रविदास जैसे भक्तों ने भगवान को प्रेमवश विवश कर दिया और वे उनके पास चले आए।

अर्जुन भी गीता संदेश का पात्र इसी डोर के कारण बना। निष्कपट भाव से अर्जुन ने श्रीकृष्ण को गुरु रूप में स्वीकार किया और श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना शिष्य स्वीकार किया। शरणागत अर्जुन की जिज्ञासा देखकर श्रीकृष्ण ने उसे आत्मा का दिव्य ज्ञान प्रदान किया।

“अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥” (गीता 2.11)

अर्थात् जिसका शोक नहीं करना चाहिए, उसका तू शोक करता है और पण्डितों जैसी बातें करता है। जिनके प्राण चले गए हैं और जिनके प्राण नहीं गए हैं, उनके लिए ज्ञानीजन शोक नहीं करते।

हे पार्थ! तुम ज्ञान और अज्ञान दोनों का साथ-साथ प्रदर्शन कर रहे हो। तुम शिष्य भी बनना चाहते हो, शरण में भी आते हो, पर साथ ही अपना निर्णय भी स्वयं सुनाते हो और अपनी बात का आग्रह भी नहीं छोड़ते। यही मोहित मनुष्य का स्वरूप है। इसी अज्ञान से दुःख उत्पन्न होता है।

“अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्”—जिसका शोक नहीं करना चाहिए, उसका शोक करने के कारण ही तुम्हारी इन्द्रियाँ दुःख की अग्नि में जल रही हैं। तुम स्वयं को कर्ता मानकर ऐसे व्यवहार कर रहे हो मानो संसार तुम्हारे ही बल पर चल रहा हो; मानो तुम्हारे मारने से लोग मरेंगे और तुम्हारे युद्ध न करने से बच जाएँगे। ऐसी व्यर्थ उधेड़बुन करने वाला व्यक्ति स्वयं को ज्ञानी समझता है, जबकि वास्तव में वह अज्ञानी होता है।

अहंकार मनुष्य को अज्ञान से बाँध देता है। तब वह परमेश्वर की इच्छा से ऊपर उठकर स्वयं नियंत्रण करना चाहता है, और यही उसके शोक का कारण बनता है। व्यर्थ का शोक जीवन को भीतर ही भीतर खा जाता है।

“प्रज्ञावादांश्च भाषसे”—प्रज्ञावादी लोग अपने को ज्ञानी मानते हैं, ज्ञान का अभिमान करते हैं और ज्ञान की बातें तो करते हैं, किन्तु कर्महीन ज्ञान के कारण अज्ञान से मुक्त नहीं हो पाते। आचरणहीन ज्ञान सदैव शोक को बढ़ाता है। भगवान कहते हैं—इस मिथ्या प्रज्ञावाद के जाल को तोड़ो और ज्ञान की अखण्ड धारा से स्वयं को जोड़ो, क्योंकि ज्ञानीजन शोक से मुक्त रहते हैं।

“गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः”—ज्ञानीजन सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और प्रलय के रहस्य को भलीभाँति जानते हैं। वे काल के खेल, प्रकृति और गुणों के प्रभाव तथा जीवन की गति और वृद्धि को समझते हैं। इसलिए वे व्यर्थ दुःख, संताप और चिंताओं में नहीं डूबते। विधि का विधान अटल है। जन्म, वृद्धि और मृत्यु जैसे परिवर्तन प्रत्येक देह में होते हैं; फिर शोक करने से क्या लाभ?

आत्मा अमर है और शरीर नश्वर। आत्मा के लिए भी शोक व्यर्थ है और शरीर के लिए भी। मनुष्य को वास्तव में जीवित रखने वाला उसका धर्म, चरित्र, आत्मज्ञान और ब्रह्मबोध है। जिसमें धर्म है, चरित्र है, आत्मज्ञान है और ब्रह्मदर्शन है, वही वास्तव में जीवित, सुखी, समृद्ध, समर्थ और मुक्त है।

ज्ञानयुक्त और शोकमुक्त होने के लिए मनुष्य को परमेश्वर की असीम कृपा का पात्र बनना चाहिए। ज्ञान के गंभीर आनन्द और मुक्ति के फल को प्राप्त करने के लिए तन, मन और वचन की प्रत्येक चेष्टा और संकल्प को साधनामय बनाना आवश्यक है। साधना से परमेश्वर का प्रकाश प्राप्त होता है, आत्मबल की वृद्धि होती है और उस सत्य की झाँकी मिलती है जो ज्ञान की पराकाष्ठा है।

साधनाहीन प्राणी मोह, माया और ममता की कीचड़ से बाहर नहीं निकल पाता और अज्ञान के अंधकार में उसकी जीवन-यात्रा सफल नहीं हो पाती। साधना में मन और बुद्धि के योग से अटूट श्रद्धा और दृढ़ निष्ठा विकसित होती है। उच्चतर ज्ञान के कोष खुलते हैं, महान शक्ति प्राप्त होती है, व्यापक आनन्द का अनुभव होता है और जीवन मुक्त होने लगता है।

ज्ञान ही हमें जीवन जीने की कला और सलीका सिखाता है। ज्ञानार्जन की यात्रा संसार में आते ही प्रारम्भ हो जाती है। नवजात शिशु सबसे पहले अपनी इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करता है। उसका पहला स्वाभाविक प्रयास माँ के स्तनों की ओर होता है। प्रश्न यह है कि उस नवजात शिशु को यह कौन सिखाता है कि माँ के स्तन कहाँ हैं और उनका क्या उपयोग है?

ऐसे ही असंख्य प्रश्न उठते हैं—अमीबा को विभाजन की प्रक्रिया कौन सिखाता है? सिंह को अपने क्षेत्र का बोध कौन कराता है? साइबेरिया से हजारों मील उड़कर भारत आने वाले सारस पक्षियों को कौन दिशा देता है और फिर वापस ले जाता है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर गीता के सिद्धान्तों में निहित हैं।

गीता कहती है कि ज्ञान अंतर्निहित है। विश्व के सभी आविष्कार सृष्टि में पहले से ही विद्यमान थे; वैज्ञानिकों ने केवल उन्हें खोजा और प्रकट किया। इसी प्रकार ज्ञान हम सबके भीतर समाहित है। शिक्षा का उद्देश्य उस अंतर्निहित ज्ञान को उद्भासित करना है।

जब हम शिक्षा नीति का निर्माण भारतीय मनीषा के इन सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर करेंगे, तब हम केवल डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या अन्य पेशेवर ही नहीं, बल्कि श्रेष्ठ मनुष्य भी तैयार करेंगे—ऐसे मनुष्य जिनकी कमी आज पूरा विश्व अनुभव कर रहा है।

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