अभय निर्भयता नहीं है, क्योंकि निर्भय तो आसुरी संपदा वाले लोग भी होते हैं
अभय शब्द सुनते ही हमें जो ख्याल उठता है, वह है निर्भयता का। लेकिन अभय निर्भयता नहीं है, क्योंकि निर्भय तो आसुरी संपदा वाले लोग भी होते हैं; अक्सर ज्यादा निर्भय होते हैं। अपराधी हैं, निर्भय हैं, तभी तो अपराध करना संभव था। बहुत से लोग इसीलिए अपराधी नहीं हैं, क्योंकि उनमें निर्भयता की कमी है; और कोई कारण नहीं है। अपराध तो वे भी करना चाहते हैं, लेकिन भयभीत हैं।
चोरी आप भी करना चाहते हैं, लेकिन भयभीत हैं। चोरी के लोभ से ज्यादा चोरी का जो परिणाम हो सकता है—कारागृह हो सकता है, प्रतिष्ठा खो जाएगी, पकड़े जाएँगे—उसका भय ज्यादा मजबूत है। लोभ से भय बड़ा है; वही आप पर अंकुश है।
हत्या आप भी करना चाहते हैं, कई बार सोचते हैं, सपने देखते हैं; कई बार तो हत्या मन में कर ही देते हैं। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जिसने जीवन में दो-चार बार मन में किसी की हत्या न कर दी हो। करते नहीं हैं आप, उसका कारण यह नहीं है कि आप करना नहीं चाहते हैं। उसका कारण सिर्फ इतना है कि उतना निर्भय भाव नहीं जुटा पाते हैं।
मैंने सुना है कि एक पति अपनी पत्नी से बड़ा नाराज था और कलह कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। आधी रात को उठा और उसने कहा, “बहुत हो चुका; जितना सह सकता था, सह लिया। मैं मरने जा रहा हूँ, इसी समय झील में डूबकर।”
पत्नी ने कहा, “सुनो जी! तैरना तो तुम जानते ही नहीं!”
तो वह वापस लौट आया। उदास होकर कहा, “तो फिर मुझे कोई और उपाय सोचना पड़ेगा।”
करना आप भी वही चाहते हैं, जो अपराधी करता है, लेकिन फर्क शायद निर्भयता का है।
कृष्ण अभय को दैवी संपदा का पहला लक्षण गिनाते हैं। और सिर्फ कृष्ण ही नहीं, बुद्ध और महावीर भी अभय को बुनियादी आधार बनाते हैं। महावीर ने कहा है कि अहिंसक तो कोई हो ही नहीं सकता, जब तक अभय न हो, क्योंकि भय से हिंसा पैदा होती है।
जितने भी लोगों ने इस दुनिया में हिंसा की है, यदि गौर से देखेंगे तो भीतर से सब भयभीत थे। ध्यान रहे, हिंसक निर्भय हो सकता है, होता है। आखिर युद्ध के मैदान में जाता हुआ सैनिक निर्भय तो होता ही है, लेकिन हिंसक होता है। और महावीर कहते हैं कि अभय का अंतिम परिणाम अहिंसा है।
तो हमें निर्भयता और अभय में थोड़ा फर्क समझ लेना चाहिए।
निर्भयता और अभय में अंतर
निर्भय का अर्थ है कि जिसके भीतर भय तो है, लेकिन वह उस भय से भयभीत नहीं होता और टिका रहता है। कायर वह है, जिसके भीतर भी भय है, लेकिन वह भय से प्रभावित होकर भाग खड़ा होता है।
कायर और बहादुर में फर्क भय का नहीं है; भय दोनों में है। लेकिन कायर भय को स्वीकार कर लेता है और जिसे हम बहादुर कहते हैं, वह भय को अस्वीकार करता है।
निर्भयता का अर्थ है—भय तो भीतर है, लेकिन हम उसे स्वीकार नहीं करते; हम उसके विपरीत खड़े हैं।
अभय का अर्थ है—जिसके भीतर भय ही नहीं है।
इसलिए अभय को उपलब्ध व्यक्ति न तो कायर होता है और न बहादुर। वह दोनों नहीं हो सकता। भय न हो, तो आप अभय को उपलब्ध होते हैं।
भय किस बात का है?
भय किस बात का है? और जब आप निर्भयता भी दिखाते हैं, तो किस बात की दिखाते हैं?
थोड़ा-सा ही सोचेंगे तो पता चल जाएगा कि मृत्यु का भय है। बहाना कोई भी हो, ऊपर से कुछ भी हो, लेकिन भीतर मृत्यु का भय है—मैं मिट न जाऊँ, मैं समाप्त न हो जाऊँ।
दूसरी चीजों में भी, जिनमें मृत्यु प्रत्यक्ष नहीं है, वहाँ भी गहरे में मृत्यु ही होती है। आपका धन कोई छीन ले, तो भय पकड़ता है। मकान जल जाए, तो भय पकड़ता है। पद छिन जाए, तो भय पकड़ता है।
लेकिन वह भय भी मृत्यु के कारण है, क्योंकि पद के कारण जीवित होने में सुविधा थी; पद सहारा था। धन पास में था, तो सुरक्षा थी। धन पास में नहीं, तो असुरक्षा हो गई। मकान था, तो साया था; मकान जल गया, तो खुले आकाश के नीचे खड़े हो गए।
जिन-जिन चीजों के छिनने से भय होता है, उन-उन चीजों के छिनने से मौत करीब मालूम पड़ती है। और जिन-जिन चीजों को हम पकड़े रखना चाहते हैं, वे ही चीजें हैं, जिनके कारण मौत और हमारे बीच में परदा हो जाता है।
धन का ढेर लगा हो, तो हमारी आँखों में धन दिखाई पड़ता है, मौत उस पार छूट जाती है। प्रतिष्ठा हो, पद हो, तो शक्ति होती है पास में, हम लड़ सकते हैं। बीमारी आए, मौत आए, तो कुछ उपाय किया जा सकता है।
भय तो मृत्यु का है। सभी भय मृत्यु से उद्भूत होते हैं।
इसीलिए हम उसे बहादुर कहते हैं, जो मौत के सामने भी अकड़कर खड़ा रहता है। कोई बंदूक लेकर आपकी छाती पर खड़ा हो और आप भाग खड़े हों, तो लोग कायर कहते हैं—पीठ दिखा दी!
कायर और बहादुर दोनों के भीतर भय
पश्चिम में युवकों का एक आंदोलन था—हिप्पी। ‘हिप्पी’ शब्द का अर्थ ही ऐसा व्यक्ति लिया गया, जिसने पीठ दिखा दी, जो भाग खड़ा हुआ। वे कहते हैं, लड़ना फिजूल है। और लड़ना किसलिए? लड़ने से मिलता क्या है? इसलिए उन्होंने जान-बूझकर पीठ दिखाई।
ये जो बहादुर और कायर हैं, इन दोनों की समस्या एक है। कायर पीठ दिखाकर भाग जाता है। बहादुर पीठ नहीं दिखाता, खड़ा रहता है, चाहे मिट जाए। लेकिन दोनों के भीतर भय है।
अभय उस व्यक्ति को हम कहेंगे, जिसके भीतर भय नहीं है।
लेकिन यह तभी हो सकता है, जब मृत्यु के संबंध में हमारी समस्या हल हो गई हो। जब हमें किसी भाँति यह प्रतीति हो गई हो कि मृत्यु है ही नहीं; जब हमने किसी अनुभव से यह रस पहचान लिया हो कि भीतर अमृत छिपा है, कि मैं मरणधर्मा नहीं हूँ।
जब आत्मभाव जागा हो, तो अभय पैदा होगा।
इसलिए अभय आत्मा का नाम है।
जिसने आत्मा को जरा-सा भी पहचाना, उसके जीवन में अभय हो जाएगा।
दैवीय यात्रा का पहला आधार है अभय
कृष्ण अभय को पहला आधार क्यों बनाते हैं? सत्य की यात्रा पर, ब्रह्म की यात्रा पर, दिव्यता के आरोहण में अभय पहला आधार क्यों है?
अभय की संभावना तभी बनती है, जब अमृत की थोड़ी-सी प्रतीति हो। तभी आदमी ब्रह्म में छलांग लगा सकता है; नहीं तो छलांग नहीं ले सकता।
अगर भीतर डर समाया हो कि मैं मिट तो नहीं जाऊँगा, तो ब्रह्म तो मृत्यु से भी ज्यादा भयानक है। क्योंकि मृत्यु में तो शायद शरीर ही मिटता होगा, आत्मा बच जाती होगी। ब्रह्म में आत्मा भी नहीं बचेगी। यह महामृत्यु है।
उस विराट में तो मैं ऐसे खो जाऊँगा, जैसे बूंद सागर में खो जाती है। कोई नाम-रूप नहीं बचेगा।
तो जिसको हम मृत्यु कहते हैं, यह तो अधूरी मृत्यु है। आत्मा बच जाएगी, नए शरीर ग्रहण करेगी, नई यात्राओं पर निकलेगी। लेकिन जो व्यक्ति ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हुआ, फिर उसकी कोई यात्रा नहीं है; फिर वह महाशून्य में खो गया।
इसलिए हम कहते हैं—महामृत्यु को प्राप्त हुआ।
स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि कृष्ण अभय को दैवी संपदा का पहला आधार बनाते हैं, क्योंकि दिव्यता में जिसे भी प्रवेश करना हो, उसे अपने को पूरी तरह मिटाने का साहस चाहिए।
कौन अपने को पूरा मिटा सकता है?
वही, जिसका पूरा भरोसा है कि मिटने का कोई उपाय नहीं।
यह बात विपरीत मालूम पड़ेगी, विरोधाभासी लगेगी। लेकिन जिसके भीतर यह विश्वास है, वह सहजता से छलांग ले सकता है। वह अग्नि में उतर सकता है, क्योंकि वह जानता है कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। वह शस्त्रों से छिद सकता है, क्योंकि वह जानता है कि शस्त्र उसे छेद नहीं सकते।
इसी आस्था पर अभय विकसित होगा।
भयभीत हम भी हैं रास्ते के सन्नाटे से,
अभय के सफर पर ऐ दिल, जाना ही होगा।
