भारत का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास का एक अद्वितीय अध्याय है। यह केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का आंदोलन नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान, धर्म, सत्य, त्याग और मानव गरिमा की पुनर्स्थापना का महान यज्ञ था। इस यज्ञ में असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
जब हम इन स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन का अध्ययन करते हैं, तो एक रोचक तथ्य सामने आता है—इनमें से अनेक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता से प्रेरित थे। किसी ने गीता को अपना दैनिक पथप्रदर्शक बनाया, किसी ने संकट के समय उससे साहस पाया, किसी ने कर्मयोग को जीवन का आधार बनाया, तो किसी ने आत्मा की अमरता के संदेश से निर्भय होकर बलिदान स्वीकार किया।
गीता ने उन्हें केवल आध्यात्मिक सांत्वना नहीं दी, बल्कि उन्हें निर्णय लेने की बुद्धि, कर्तव्य निभाने का साहस, कठिनाइयों में धैर्य और राष्ट्र के लिए सर्वस्व समर्पित करने की प्रेरणा दी।
यह पुस्तक अठारह ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन का परिचय कराती है, जिनके व्यक्तित्व में गीता के अठारह जीवन-सूत्र प्रतिबिंबित होते हैं। यहाँ उद्देश्य इतिहास को धार्मिक रंग देना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि गीता के सार्वकालिक सिद्धांत, जैसे निष्काम कर्म, स्वधर्म, अभय, समत्व, लोकसंग्रह, आत्मसंयम, श्रद्धा और समर्पण, कैसे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी प्रेरणा के स्रोत बने।
इस पुस्तक में प्रत्येक अध्याय एक स्वतंत्रता सेनानी को समर्पित है। प्रत्येक अध्याय में उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय, गीता से उनका संबंध, प्रेरक प्रसंग, प्रासंगिक श्लोक तथा आधुनिक जीवन के लिए संदेश प्रस्तुत किया गया है।
यह पुस्तक न तो केवल जीवनी है और न ही केवल गीता की व्याख्या; यह दोनों के मध्य एक प्रेरणासेतु है।
यदि इस पुस्तक को पढ़कर कोई युवा अपने कर्तव्य के प्रति अधिक सजग हो, कोई विद्यार्थी गीता को नए दृष्टिकोण से पढ़े, कोई नागरिक राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखना सीखे, या कोई पाठक अपने जीवन में निष्काम कर्म का एक छोटा-सा संकल्प ले, तो यही इस प्रयास की सबसे बड़ी सफलता होगी।
गीता का संदेश कालातीत है। स्वतंत्रता सेनानियों का जीवन उसका मूर्त रूप है। यही इस पुस्तक की आत्मा है।
