गीता भारत के प्राचीन योग और ज्ञान का निचोड़ तथा समन्वय है : स्वामी ज्ञानानंद
17 जून 2024 को स्वामी ज्ञानानंद जी के गीता चिंतन शिविर के एक सत्र में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस दिन भगवद्गीता के आठवें अध्याय का चिंतन, जप, मनन और जिज्ञासा-समाधान का कार्यक्रम था। महाराज श्री का प्रवचन आरंभ हुआ और कब समाप्त हो गया, इसका आभास ही नहीं हुआ। दो घंटे की वह अविरल गीता-धारा ऐसी थी मानो समय भी अपने सभी नियम तोड़कर ठहर गया हो। उनके प्रवचनों का प्रभाव इतना गहरा होता है कि पत्थर जैसा कठोर हृदय भी द्रवित हो उठे। उस दिन का वातावरण ऐसा था कि मानो शब्द कानों में अमृत घोल रहे हों, हृदय को शांति दे रहे हों, श्रोताओं में उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा भर रहे हों तथा नकारात्मकता के प्रत्येक आवरण को भंग कर रहे हों।
उसी क्षण कश्मीर की अनुपम सुंदरता का वर्णन करने वाली प्रसिद्ध पंक्तियाँ स्मरण हो आईं—
“अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त,
हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त।”
अर्थात यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।
इसके पश्चात् स्वामी जी ने मेरे अत्यंत प्रिय श्लोक की व्याख्या आरंभ की—
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥ (गीता 8.7)
स्वामी जी ने बताया कि इस श्लोक की पहली पंक्ति ही भगवद्गीता के संपूर्ण उपदेश का सार है। इसमें मानव जीवन को दिव्य बनाने की शक्ति निहित है और यही कर्मयोग की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा भी है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— “अपने मन और बुद्धि को मुझमें समर्पित रखो तथा शरीर से अपने सांसारिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते रहो।”
यह संदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति—चाहे वह चिकित्सक हो, अभियंता, अधिवक्ता, शिक्षक, व्यापारी, कर्मचारी अथवा गृहिणी—सभी पर समान रूप से लागू होता है। अर्जुन एक योद्धा था और युद्ध करना उसका स्वधर्म था। इसलिए भगवान ने उसे मन को परमात्मा में स्थिर रखते हुए अपने कर्तव्य का पालन करने का उपदेश दिया।
स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि कुछ लोग आध्यात्मिकता के नाम पर अपने लौकिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं, जबकि कुछ लोग सांसारिक व्यस्तताओं का बहाना बनाकर आध्यात्मिक साधना से दूर रहते हैं। वास्तव में यह दोनों ही दृष्टिकोण अधूरे हैं। भगवान श्रीकृष्ण अध्यात्म और कर्म के बीच कोई विरोध नहीं मानते। वे जीवन में संतुलन का संदेश देते हैं।
जब मनुष्य कर्मयोग का अभ्यास करता है, तब शरीर संसार के कार्यों में सक्रिय रहता है, किन्तु मन भगवान में अनुरक्त रहता है। ऐसी स्थिति में कर्म बंधन का कारण नहीं बनते, क्योंकि कर्मों को बंधन में बदलने वाली शक्ति आसक्ति है। जब कर्म निस्वार्थ भाव से और ईश्वरार्पण बुद्धि से किए जाते हैं, तब वे मनुष्य को कर्मबंधन से मुक्त कर देते हैं।
महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार अपना कर्तव्य निभाया। युद्ध समाप्त होने पर भी उसके ऊपर पाप का लेशमात्र आरोप नहीं लगा, क्योंकि उसका उद्देश्य व्यक्तिगत यश, सुख अथवा स्वार्थ नहीं था। उसका मन पूर्णतः भगवान में स्थित था।
स्वामी जी ने इसे अत्यंत सरल उदाहरण से समझाया। यदि किसी भी संख्या को शून्य से गुणा किया जाए तो परिणाम शून्य ही आता है। उसी प्रकार जब मनुष्य अपने समस्त कर्मों को भगवान को समर्पित कर देता है, तब कर्मों का अहंकार समाप्त हो जाता है और वे कर्मबंधन का कारण नहीं बनते।
उन्होंने कहा कि कर्मयोग का वास्तविक अर्थ केवल कर्म करना और कुछ समय साधना करना नहीं है। आज अनेक लोग स्वयं को कर्मयोगी इसलिए कहते हैं क्योंकि वे अधिकांश समय कार्य करते हैं और थोड़ी देर पूजा या ध्यान कर लेते हैं। परंतु श्रीकृष्ण की दृष्टि में यह कर्मयोग नहीं है।
कर्मयोग का वास्तविक स्वरूप यह है कि कार्य करते समय भी मन निरंतर भगवान के स्मरण में स्थित रहे। भगवान का स्मरण रुक-रुककर नहीं, बल्कि निरंतर होना चाहिए।
इसी सत्य को संत कबीर ने अपने प्रसिद्ध दोहे में व्यक्त किया है—
सुमिरन की सुधि यों करो, ज्यों गागर पनिहार।
बोलत-डोलत सुरति में, कहे कबीर विचार।।
अर्थात जैसे गाँव की स्त्रियाँ सिर पर रखा हुआ घड़ा संभालते हुए आपस में बातें भी करती रहती हैं और मार्ग भी तय करती हैं, फिर भी उनका ध्यान निरंतर घड़े पर ही रहता है; उसी प्रकार मनुष्य को संसार के समस्त कार्य करते हुए भी भगवान का स्मरण बनाए रखना चाहिए।
स्वामी जी ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता भारत की समस्त प्राचीन योग परंपराओं और ज्ञान परंपराओं का निचोड़ तथा समन्वय है। गीता का उद्देश्य परमात्मा, आत्मा और सृष्टि के रहस्यों का स्पष्ट ज्ञान कराना है।
उन्होंने कहा कि गीता वास्तव में चरित्र निर्माण का सर्वोत्तम ग्रंथ है। भगवान श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि मनुष्य संसार में रहते हुए, कमल के समान निर्लिप्त रहकर श्रेष्ठ कर्म करे। केवल गृहत्याग या बाह्य संन्यास से नहीं, बल्कि निष्काम कर्म और शुद्ध आचरण से चरित्र का निर्माण होता है।
स्वामी जी ने वर्तमान समय की चुनौतियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि आने वाले समय में तनाव, दबाव और मानसिक अशांति बढ़ेगी। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में संतुलन स्थापित करना सीखना होगा—कर्म और योग में संतुलन, साधना और साधनों में संतुलन तथा भावना और विवेक में संतुलन। यही संतुलन सफलता और आंतरिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
उन्होंने कुछ अत्यंत व्यावहारिक सूत्र भी दिए—
एक समय में एक ही समस्या का समाधान करें।
दृष्टिकोण बदलें, परिस्थितियाँ बदलती हुई प्रतीत होंगी।
प्रत्येक कर्म को परमात्मा को समर्पित करके करें।
सुख-दुःख में समभाव बनाए रखें।
सत्र में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा अनुभव हुआ मानो आज का मनुष्य स्वयं अर्जुन है और उसका मन ही कुरुक्षेत्र बन गया है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर रामायण और महाभारत का संघर्ष निरंतर चल रहा है। गीता इसी आंतरिक युद्ध का समाधान प्रस्तुत करती है।
भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि कामना से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से मोह, मोह से स्मृति का भ्रम और अंततः बुद्धि का नाश हो जाता है। इसलिए वास्तविक युद्ध बाहरी शत्रुओं से नहीं, बल्कि अपने भीतर के विकारों से है।
स्वामी जी ने कहा कि खोया हुआ मनोबल पुनः प्राप्त करने के लिए भगवान ने योग का मार्ग बताया है। योग के अभ्यास से पूर्व संचित विकर्मों का प्रभाव क्षीण होता है, शुद्ध संस्कार विकसित होते हैं और कर्मों में कुशलता आती है।
अंत में उन्होंने सभी को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुभकामनाएँ देते हुए भविष्य में आयोजित होने वाले गीता चिंतन सत्रों में सहभागी बनने का निमंत्रण दिया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि ये केवल गीता चिंतन शिविर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्ममूल्यांकन, आत्मजागरण, आत्मविरक्ति, आत्मोन्नति, आत्मोत्सर्ग और आत्मक्रांति के दिव्य एवं आलौकिक साधना-शिविर हैं।
