गीता के समभाव में मन कभी विचलित नहीं होगा
भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 48वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ (2.48)
अर्थात्, हे धनंजय! आसक्ति का त्याग कर योग में स्थित होकर अपना कर्तव्य करो। सफलता और असफलता दोनों में समभाव बनाए रखो, क्योंकि यही समत्व योग कहलाता है।
समता का भाव मनुष्य को जीवन की प्रत्येक परिस्थिति को शांतिपूर्वक स्वीकार करने की क्षमता प्रदान करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस समभाव को ही ‘योग’ कहा है, अर्थात् वह अवस्था जिसमें मनुष्य परमात्मा से जुड़ जाता है। यह श्लोक जीवन की समस्त उथल-पुथल का अत्यंत व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है।
यदि हम समुद्र में नौका चलाते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि समुद्र की लहरें उसे डगमगाएँगी। यदि हम हर समय इस चिंता में डूबे रहें कि लहरें नाव से टकराएँगी, तो हमारा जीवन भय और दुःख से भर जाएगा। और यदि हम यह अपेक्षा करें कि समुद्र में लहरें ही न उठें, तो यह उसकी स्वाभाविक प्रकृति के विरुद्ध होगा। लहरों का समुद्र से वही संबंध है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि और सफलता-असफलता का जीवन से है।
इसी प्रकार जब हम जीवन-रूपी समुद्र की यात्रा करते हैं, तब अनेक प्रकार की बाधाएँ और चुनौतियाँ हमारे सामने आती हैं। इनमें से अधिकांश हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं। यदि हम हर परिस्थिति से संघर्ष करके उसे अपनी इच्छा के अनुसार बदलना चाहेंगे, तो दुःख कभी समाप्त नहीं होगा। किंतु यदि हम कठिनाइयों का धैर्यपूर्वक सामना करना सीख लें और परिणाम भगवान की इच्छा पर छोड़ दें, तो यही वास्तविक योग है।
भगवान श्रीकृष्ण बारहवें अध्याय के 18वें श्लोक में कहते हैं—
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥ (12.18)
अर्थात् जो व्यक्ति मित्र और शत्रु, मान और अपमान, शीत और उष्णता, सुख और दुःख में समान भाव रखता है तथा आसक्ति से मुक्त रहता है, वह मुझे अत्यंत प्रिय है।
इसी प्रकार तेरहवें अध्याय (13.8–12) में भगवान समभाव को ज्ञान के महत्वपूर्ण अंगों में सम्मिलित करते हैं।
गौतम बुद्ध और राजा श्रोण की कथा
समभाव का महत्व समझाने के लिए गौतम बुद्ध के जीवन का एक प्रसिद्ध प्रसंग उल्लेखनीय है।
एक बार गौतम बुद्ध श्रावस्ती पहुँचे। उस समय वहाँ के राजा श्रोण अत्यंत विलासी और अहंकारी थे। वे दिनभर विश्राम करते और रातभर भोग-विलास, नृत्य, संगीत और मनोरंजन में समय व्यतीत करते थे। अनेक लोगों ने उन्हें बुद्ध का प्रवचन सुनने की सलाह दी। अंततः वे एक दिन बुद्ध के पास पहुँचे।
बुद्ध के वचनों से वे इतने प्रभावित हुए कि उसी समय बोले—”भगवन्! मुझे दीक्षा दीजिए, मैं भिक्षु बनना चाहता हूँ।”
बुद्ध ने कहा, “तुमने मुझे केवल एक बार सुना है। कुछ समय विचार कर लो।”
किन्तु श्रोण का स्वभाव अत्यधिक अतिवादी था। उन्होंने तत्काल राजपाट त्याग दिया और भिक्षु बन गए। परंतु उन्होंने संयम के स्थान पर कठोर तपस्या का ऐसा मार्ग अपनाया कि वे सामान्य भिक्षुओं से भी अधिक कठोर जीवन जीने लगे। वे भोजन भी कई-कई दिन बाद करते, काँटों और पत्थरों पर चलते और अपने शरीर को अत्यधिक कष्ट देते।
कुछ ही महीनों में उनका स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया। तब गौतम बुद्ध स्वयं उन्हें देखने पहुँचे।
उन्होंने पूछा, “श्रोण! जब तुम राजा थे, तब क्या सितार बजाते थे?”
श्रोण ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं अच्छा सितार वादक था।”
बुद्ध ने पूछा, “यदि सितार के तार बहुत अधिक कस दिए जाएँ, तो क्या मधुर संगीत निकलेगा?”
श्रोण ने कहा, “नहीं, वे टूट जाएँगे।”
बुद्ध ने फिर पूछा, “और यदि तार बहुत ढीले हों?”
श्रोण ने उत्तर दिया, “तब भी संगीत उत्पन्न नहीं होगा।”
बुद्ध मुस्कुराए और बोले—
“फिर मधुर संगीत कब निकलता है?”
श्रोण ने कहा, “जब तार न अधिक ढीले हों और न अधिक कसे हुए—अर्थात् बिल्कुल संतुलित हों।”
तब बुद्ध ने कहा—
“जीवन भी सितार की भाँति है। अत्यधिक भोग भी उचित नहीं और अत्यधिक तप भी नहीं। प्रत्येक अति विनाश का कारण बनती है। जीवन की कला संतुलन और मध्य मार्ग में है।”
समभाव का वास्तविक अर्थ
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति सदैव मध्य मार्ग का अनुसरण करता है। वह किसी भी प्रकार की अति से बचता है।
मनुष्य का मन निरंतर द्वंद्व में डोलता रहता है। जिसे आज प्रेम करता है, कल उसी से घृणा करने लगता है। जिसे आज अच्छा मानता है, कल वही बुरा प्रतीत होने लगता है। मन घड़ी के पेंडुलम की भाँति एक छोर से दूसरे छोर तक झूलता रहता है। यही विषमता मनुष्य को अशांत बनाती है।
समभाव का अर्थ है—ऐसी मानसिक स्थिति जिसमें बाहरी परिस्थितियाँ मन को विचलित न कर सकें। सुख आए तो अहंकार न हो, दुःख आए तो निराशा न हो। मान मिले तो गर्व न हो, अपमान मिले तो मन न टूटे। मित्र मिले तो आसक्ति न हो, शत्रु मिले तो द्वेष न हो।
ऐसा व्यक्ति जीवन की प्रत्येक घटना को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करता है और साक्षी भाव से सब कुछ देखता रहता है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा समभाव रखने वाला व्यक्ति उन्हें अत्यंत प्रिय होता है।
अंततः जीवन का सत्य यही है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। न सुख स्थायी है और न दुःख। न बसंत सदा रहता है और न पतझड़। इसलिए समभाव ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है।
कुछ पंक्तियाँ इसी भाव को व्यक्त करती हैं—
कोई सदा सुखी नहीं दुनिया में, जीवन सुख-दुःख का पहिया है।
गीता की दृष्टि में सब समान हैं, सबके लिए एक-सा रवैया है।।
ऐसा कभी नहीं हो सकता, केवल सुख या केवल दुःख ही आता जाए।
बसंत यदि आता है जीवन में, तो पतझड़ भी अवश्य आए।।
