अनासक्ति से कार्य में आती है अत्यधिक कुशलता।

जब मनुष्य बिना आसक्ति के कार्य करता है, तब वह आकुलता, भय, आशंका और अधीरता से मुक्त होकर अत्यधिक कुशलता के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है।

भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के 50वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥ (2.50)

अर्थ— समत्व-बुद्धि से युक्त मनुष्य इस जीवन में ही शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्मफलों से मुक्त हो जाता है। इसलिए योग में स्थित होकर कर्म करो, क्योंकि योग ही कर्मों में कुशलता है।

कर्मयोग के इस सिद्धांत को सुनकर अनेक लोगों को आश्चर्य होता है। वे सोचते हैं कि यदि मनुष्य फल या परिणाम के प्रति आसक्ति छोड़ देगा, तो उसकी कार्यकुशलता कम हो जाएगी। किंतु भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि निजी स्वार्थ का त्याग कार्य की गुणवत्ता को कम नहीं करता, बल्कि उसे और अधिक उत्कृष्ट बना देता है।

इसे एक कुशल नेत्र-शल्य चिकित्सक (सर्जन) के उदाहरण से समझा जा सकता है। जब वह किसी रोगी का ऑपरेशन करता है, तब पूरी एकाग्रता, दक्षता और निःस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाता है। उसका पूरा ध्यान केवल शल्यक्रिया को सफलतापूर्वक करने पर होता है। यदि सभी प्रयासों के बाद भी रोगी को बचाया न जा सके, तो उसे हत्या का अपराध-बोध नहीं होता, क्योंकि उसने अपनी संपूर्ण योग्यता और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया होता है।

किन्तु यदि उसी सर्जन को अपने इकलौते पुत्र का ऑपरेशन करना पड़े, तो अक्सर वह स्वयं शल्यक्रिया करने का साहस नहीं जुटा पाता। इसका कारण उसकी तकनीकी क्षमता का अभाव नहीं, बल्कि परिणाम के प्रति उत्पन्न आसक्ति है। यह आसक्ति भय, चिंता और मानसिक दबाव उत्पन्न करती है, जिससे कार्यकुशलता प्रभावित हो सकती है। इसलिए वह किसी अन्य सर्जन की सहायता लेना अधिक उचित समझता है।

यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि आसक्ति कार्यकुशलता नहीं बढ़ाती, बल्कि उसे कम कर देती है। इसके विपरीत, जब मनुष्य अनासक्त होकर कार्य करता है, तब वह बिना घबराहट, आशंका और मानसिक तनाव के अधिक दक्षता से अपना कार्य कर पाता है।

मेरे अपने नेत्र-शल्य चिकित्सा (Ophthalmic Surgery) के लगभग 35 वर्षों के अनुभव में प्रतिदिन लगभग 50 शल्यक्रियाएँ करने का अवसर मिला। अनेक बार एक साथ तीन-तीन ऑपरेशन टेबलों पर कार्य करना पड़ता था। इस अवधि में अनेक निकट संबंधियों तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों का भी ऑपरेशन किया, किंतु मैंने एक नियम का सदैव पालन किया। ऑपरेशन प्रारंभ होने से पहले मेरे सहयोगी रोगी के चेहरे को ऑपरेशन-ड्रेप (Eye Sheet) से ढँक देते थे और मुझे केवल उसकी आँख दिखाई देती थी, चेहरा नहीं।

न चेहरा दिखे, न आसक्ति उत्पन्न हो।

इस सरल अभ्यास ने मुझे प्रत्येक रोगी के साथ समान भाव से कार्य करने और अपनी कार्यकुशलता बनाए रखने में सहायता की।

अर्जुन का जीवन भी इसी सत्य का प्रमाण है। गीता का उपदेश सुनने से पहले वह राज्य प्राप्ति की इच्छा से युद्ध करना चाहता था। किंतु श्रीकृष्ण का उपदेश सुनने के बाद उसकी प्रेरणा बदल गई। अब वह युद्ध विजय या राज्य के लिए नहीं, बल्कि भगवान की इच्छा और धर्म की स्थापना के लिए लड़ रहा था। उसका बाहरी कर्म वही रहा, लेकिन उसकी भीतरी भावना पूर्णतः बदल गई। परिणामस्वरूप उसकी वीरता और कार्यकुशलता में कोई कमी नहीं आई, बल्कि वह और अधिक उत्साह, समर्पण और निपुणता से युद्ध कर सका।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज कहा करते थे कि प्रत्येक आसक्त कर्म का मूल कारण स्वयं कर्म नहीं, बल्कि मनुष्य का अशांत चित्त है। यदि कोई व्यक्ति बाहरी रूप से अनासक्त दिखने का प्रयास करे, परंतु भीतर मोक्ष, सिद्धि, प्रतिष्ठा, सफलता अथवा किसी फल की इच्छा बनी रहे, तो उसका कर्म वास्तव में अनासक्त नहीं कहा जा सकता।

उदाहरण के लिए, यदि किसी साधु का चित्त अशांत है और वह तप, उपवास, सेवा या साधना केवल किसी उपलब्धि की कामना से कर रहा है, तो उसके कर्मों के पीछे भी वासनाएँ और लालसाएँ विद्यमान हैं। ऐसी स्थिति में उसके कर्म अनासक्त नहीं कहे जा सकते।

इसलिए अनासक्त कर्म करने का उपाय केवल कर्म बदलना नहीं है, बल्कि चित्त को शांत करना है। वास्तव में शांत चित्त से ही स्वाभाविक रूप से अनासक्त कर्म उत्पन्न होते हैं। जब तक मन अशांत रहेगा, तब तक किसी-न-किसी रूप में आसक्ति बनी रहेगी।

संत इसलिए कर्म बदलने की अपेक्षा चित्त परिवर्तन पर अधिक बल देते हैं। कर्म तो केवल अभिव्यक्ति है; उसका मूल स्रोत मन की अवस्था है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि किसी घर की छत से धुआँ निकल रहा हो और हम केवल छत पर बैठकर धुएँ को रोकने का प्रयास करें, जबकि भीतर जल रही आग को न बुझाएँ, तो धुआँ किसी न किसी दिशा से निकलता ही रहेगा। धुएँ को रोकने का वास्तविक उपाय छत पर नहीं, बल्कि भीतर की आग को बुझाने में है।

इसी प्रकार आसक्ति रूपी धुएँ को समाप्त करने का उपाय बाहरी कर्मों को बदलना नहीं, बल्कि चित्त की अशांति रूपी आग को शांत करना है। जब चित्त शांत हो जाता है, तब अनासक्ति सहज रूप से प्रकट होती है, और उसी अनासक्ति से कर्म में वास्तविक कुशलता, उत्कृष्टता और योग का उदय होता है।

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